सब्ज़ी

बीन्स ( फलियों ) की खेती कैसे करें

बीन्स का पौधा लता के रूप में होता है. जिस पर लगने वाली फलियों को सेम और बीन्स के नाम से जाना जाता है. इसकी फलियों का इस्तेमाल सब्जी के रूप में किया जाता है. इसकी फलियों का रंग हरा, पीला और सफ़ेद होता है. जो विभिन्न आकार में पाई जाती हैं. इसकी फलियों के खाने से मनुष्य को कई रोगों से छुटकारा मिलता है. इसके पौधों का इस्तेमाल किसान भाई हरी खाद बनाने के रूप में भी करते हैं. इसके अलावा इसकी पतियों का इस्तेमाल पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है.

बीन्स की खेती कैसे करें

बीन्स की खेती के लिए समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. भारत के लगभग हर प्रदेशों में इसे उगाया जा सकता है. इसकी खेती के लिए अधिक बारिश की भी जरूरत नही होती. इसके लतादार पौधों को बढ़ने के लिए सहारे की जरूरत होती है. मध्य और दक्षिण भारत में इसकी खेती अधिक होती है. भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से रबी की फसल के साथ की जाती है. वर्तमान में इसकी पैदावार कर किसान भाई अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

बीन्स की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक पैदावार लेने के लिए इसे काली चिकनी मिट्टी में उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

बीन्स की खेती के लिए जलवायु और तापमान मुख्य कारक के रूप में काम करते हैं. इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए ठंड की जरूरत होती है. और सर्दियों में पड़ने वाले पाले को इसके पौधे सहन कर सकते हैं. लेकिन पाला अधिक टाइम तक ज्यादा मात्रा में गिरता है तो इसकी पैदावार प्रभावित होती है. अधिक गर्मी इसके पौधे के लिए उपयुक्त नही होती. और इसके पौधे को बारिश की भी ज्यादा जरूरत नही होती.

इसकी खेती के लिए 15 से 25 डिग्री तक तापमान उपयुक्त होता है. इसके बीजों को अंकुरित होने के लिए शुरुआत में 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. गर्मियों में इसका पौधा 30 डिग्री तापमान पर आसानी से विकास कर लेता है. लेकिन इससे ज्यादा तापमान होने पर पौधे की फलियों में बीज नही बनते और इसके फूल गिरने लगते हैं.

उन्नत किस्में

बीन्स की कई तरह की किस्में मौजूद हैं. जिन्हें उनकी पैदावार, आदर्श वातावरण और पौधों के आधार पर अलग अलग प्रजातियों में बाँटा गया है.

झाड़ीदार किस्में

इस तरह के पौधे झाडी के रूप में उगते हैं. जिनको ज्यादातर पर्वतीय भागों में उगाया जाता है.

स्वर्ण प्रिया

इस किस्म के पौधों पर पाई जाने वाली फली सीधी, लम्बी, चपटी और मुलायम रेशेरहित होती है. जिनका रंग हरा दिखाई देता है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 50 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 11 टन के आसपास पाया जाता है.

अर्का संपूर्णा

इस किस्म का निर्माण भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा किया गया है. इस किस्म के पौधों पर रतुआ और चूर्णिल फफूंद का रोग नही लगता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 50 से 60 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर कुल उत्पादन 8 से 10 टन के आसपास पाया जाता है.

आर्क समृद्धि

इस किस्म का निर्माण भी भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा किया गया है. इस किस्म की फलियों का रंग हरा होता है. जो गोल, लम्बी, और मोटे छिलके वाली होती है. इसके फलों की गुणवत्ता अच्छी होती है. जिनका प्रति हेक्टेयर कुल उत्पादन 19 टन तक पाया जाता है.

अर्का जय

झाड़ीदार उन्नत किस्म

इस किस्म के पौधे बौने आकार के होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 टन के आसपास पाया जाता है. इस किस्म की फलियाँ सब्जी के लिए ज्यादा उत्तम होती हैं. इसके अलावा इसके पौधे को कम सिंचाई वाली जगहों पर भी उगा सकते हैं. इसकी फलियाँ लम्बी और हल्की मुड़ी हुई होती हैं. जिनका रंग हरा होता है.

पन्त अनुपमा

इस किस्म के पौधों पर लगने वाली फली लम्बी, चिकनी और हरे रंग की होती है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 9 से 10 टन तक पाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग दो महीने बाद ही पैदावार देना शुरू कर देते हैं. इसके पौधों पर मोजेक विषाणु रोग नही लगता.

पूसा पार्वती

इस किस्म के पौधों पर लगने वाली फलियाँ मुलायम, गोल, लम्बी और रेशेरहित होती हैं. जिनका रंग हरा दिखाई देता हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 50 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 18 से 20 टन तक पाया जाता है.

एच.ए.एफ.बी. – 2

इस किस्म को उटी 2 के नाम से भी जाना जाता है. इसके पौधों पर लगने वाले फल लम्बे, चिकने और मोटे आकार के होते हैं. जिनका रंग हरा पाया जाता है. इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 15 से 20 टन तक पाई जाती है.

बेलदार किस्मे

बेलदार किस्मों के पौधे बेल के रूप में बढ़ते हैं. जिनकी खेती ज्यादातर मैदानी भागों में की जाती है.

स्वर्ण लता

इस किस्म के पौधों पर लगने वाली फलियां लम्बी, मोटी और गूदेदार होती है. जिनका रंग हरा दिखाई देता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग दो महीने बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 से 14 टन के बीच पाया जाता हैं.

अर्का कृष्णा

इस किस्म को अगेती फसल के रूप में उगाया जाता है. जिसके पौधे तेज़ सूर्य के प्रकाश को सहन नही कर पाते. इसके पौधे पर फल गुच्छों में लगते हैं. जिनका रंग गहरा हरा दिखाई देता है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 टन तक पाया जाता हैं.

अर्का प्रसिद्धि

इस किस्म के ज्यादातर खेती दक्षिण भारत में की जाती है. जिसके पौधे पर लगने वाली फली लम्बी, चपटी और मुड़ी हुई होती हैं. जिनका रंग गहरा हरा होता है. इस किस्म के पौधे पर गेरुए रोग का प्रभाव देखने को नही मिलता. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 टन से भी ज्यादा पाया जाता है.

पूसा हिमलता

उन्नत किस्म

इस किस्म के पौधों की फलियाँ लम्बी, पतली, गूदेदार हरे रंग की होती हैं. जिनके अंदर रेशे की मात्रा नही पाई जाती. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 50 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 13 से 16 टन तक पाया जाता है.

सी. एच. पी. बी. – 1820

इस किस्म के पौधों पर लगने वाली फलियाँ मुलायम, लम्बी और रेशेरहित होती हैं. जिनका रंग हरा दिखाई देता हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग दो महीने बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 18 से 20 टन तक पाया जाता है.

इसके अलावा और भी कई किस्में हैं. जिनको उनकी उपज के आधार पर कई जगह उगाया जाता है. जिनमें वाईसीडी 1,  प्रीमियर, अर्का सुमन,  दीपाली, कंकन बुशन, दसारा और फुले गौरी जैसी कई किस्में मौजूद हैं.

खेत की तैयारी

बीन्स की खेती के लिए शुरुआत में खेत में मौजूद अन्य फसलों के अवशेषों को हटाकर खेत की गहरी जुताई कर कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें. उसके बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत का पलेव कर दें. पलेव करने के तीन से चार दिन बाद खेत में रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लें. उसके बाद खेत को पाटा लगाकर समतल बना दें.

बीज रोपण का तरीका और टाइम

बीन्स के बीजों का रोपण हाथ और ड्रिल के माध्यम से किया जाता है. ड्रिल के माध्यम से इसकी रोपाई अधिक पैदावार करने पर की जाती है. इसके बीज को खेत में लगाने से पहले उन्हें उपचारित कर लेना चाहिए. बीज को उपचारित करने के लिए कार्बेन्डाजिम, थीरम या गोमूत्र का इस्तेमाल करना चाहिए. एक हेक्टेयर में इसके बीजों की रोपाई के लिए 80 से 100 किलो बीज काफी होता है.

बीन्स की खेती

बीन्स की खेती के लिए बीज की रोपाई समतल में की जाती है. समतल में इसके बीजों को पंक्तियों में ड्रिल के माध्यम से उगाया जाता है. बीज की रोपाई के दौरान प्रत्येक पंक्तियों के बीच की दूरी एक से डेढ़ फिट रखनी चाहिए. जबकि पंक्तियों में बीज की रोपाई आपस में 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी पर करनी चाहिए. बारिश के मौसम में की जाने वाली इसकी खेती के लिए इसके बीज को खेत में मेड बनाकर उगाना चाहिए.

इसके बीजों की रोपाई अलग अलग जगहों के आधार पर की जाती है. उत्तर पश्चिमी राज्यों में इसके बीजों की रोपाई सितम्बर माह के मध्य तक की जाती है तो उत्तर पूर्वी राज्यों में अक्टूबर के लास्ट से नवम्बर के प्रथम सप्ताह में इसकी रोपाई करना उत्तम होता है. वहीँ पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी रोपाई जून और जुलाई के महीने में की जाती है. और दक्षिण भारत में इसे सर्दियों के मौसम की फसल के रूप में उगाया जाता है.

पौधों की सिंचाई

इसके पौधों को पानी की सामान्य जरूरत होती है. इसके बीजों को अगर सुखी भूमि में उगाते हैं तो सिंचाई तुरंत कर देनी चाहिए. उसके बाद बीज के अंकुरित होने तक खेत में नमी बनाए रखने के लिए तीन से चार दिन के अंतराल में हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए. पौधे के विकास के दौरान इसके पौधों को सिंचाई की अधिक जरूरत नही होती है. इसलिए पौधों की 20 से 25 दिन के अंतराल में सिंचाई करते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

बीन्स की खेती के लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त 10 से 12 गाड़ी सड़ी हुई पुरानी गोबर की खाद को खेत में डालकर मिला दें. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में डी.ए.पी. की लगभग 60 किलो मात्रा को एक एकड़ में खेत की आखिरी जुताई के वक्त देना चाहिए. और बीज रोपाई के बाद जब पौधे पर फूल बनने लगे तब 25 किलो यूरिया की मात्रा को पौधों को सिंचाई के साथ देना चाहिए. इससे पैदावार अच्छी प्राप्त होती है.

खरपतवार नियंत्रण

बीन्स की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक तरीके से किया जाता है. रासयनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथलीन की उचित मात्रा का छिडकाव बीज रोपाई के तुरंत बाद कर देना चाहिए. जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए पौधों की नीलाई गुड़ाई की जाती है. इसके लिए पौधों की शुरुआत में पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 20 दिन बाद हल्के रूप में करनी चाहिए. बीन्स की खेती में दो गुड़ाई काफी होती है. दूसरी गुड़ाई, पहली गुड़ाई के लगभग 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

बीन्स के पौधों में कई तरह के रोग पाए जाते हैं. जिनकी उचित टाइम रहते देखभाल ना की जाए तो इसका असर पैदावार पर देखने को मिलता है.

तना गलन

तना गलन का रोग पौधों पर जल भराव और वायरस की वजह से लगता है. जिसका प्रभाव पौधे के अंकुरण के वक्त अधिक दिखाई देता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर भूरे पीले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. रोग के बढ़ने पर इन धब्बों का आकार बढ़ जाता है. और पत्तियां सूखकर गिरने लगती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों की जड़ों में कार्बेन्डाजिम का छिडकाव करना चाहिए.

मोजेक

इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं. जिन पर हरे पीले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. इस रोग के लगने पर पौधे की वृद्धि रुक जाती है. इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर पौधे को उखाड़कर नष्ट कर दे या रोगोर की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करनी चाहिए.

एन्थ्रेक्नोज

इस रोग का असर पौधे की फलियों और पत्तियों पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर और फलियों पर काले पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. रोग का प्रभाव बढ़ने पर पत्तियां सिकुड़कर सूखने लगती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर डाइथेन एम-45 की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फली छेदक

फली छेदक रोग

फली छेदक रोग की वजह से पैदावार को ज्यादा नुकसान पहुँचता है, इस रोग के लार्वा फलियों में छेद कर कच्चे बीजों को खा जाते हैं. जिससे पैदावार ख़राब हो जाती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के काढ़े का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा पौधों पर नुवाक्रान का छिडकाव करने से भी लाभ मिलता है.

फलियों की तुड़ाई

बीन्स की फलियों को पकने से पहले तोड़ लिया जाता है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 50 से 60 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. इनकी फलियों की तुड़ाई बाज़ार की मांग के आधार पर करनी चाहिए. फलियों की तुड़ाई के बाद उन्हें पानी से साफ़ कर बाज़ार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए.

पैदावार और लाभ

बीन्स की खेती लगभग तीन महीने की होती है. और इसकी पैदावार भी काफी अच्छी होती है. जिससे किसान भाइयों की अच्छी कमाई हो जाती है. इसकी औसतन पैदावार 15 टन के आसपास पाई जाती है. जिनका बाज़ार भाव 30 रूपये प्रति किलो तक पाया जाता है. जिससे किसान भाइयों की एक बार में एक हेक्टेयर से तीन लाख तक की कमाई हो जाती है.

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