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बैंगन की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

बैंगन की खेती सब्जी फसल के रूप में की जाती है. चीन के बाद भारत इसका दूसरा बड़ा उत्पादक देश बना हुआ है. बैंगन के इस्तेमाल से पेट संबंधित बीमारियों से छुटकारा मिलता है. बैंगन का पौधा दो से ढाई फिट लम्बा होता है. जिसमें बहुत सारी शाखाएं निकली होती हैं, जिन पर इसका फल लगता है. बैंगन के फल का आकार लम्बा, गोल, अंडाकार और सेब के जैसा होता है.

बैंगन की खेती

बैंगन का फल एक फिट लम्बाई का और फुटबाल के समान मोटाई का हो सकता है. जिसका रंग हरा, पीला, बैंगनी और सफ़ेद होता है. भारत में इसकी पैदावार पूरे साल की जाती है. इसके पौधे को विकास करने के लिए गर्म मौसम की आवश्यकता होती है. इसकी खेती सबसे ज्यादा उत्तर भारत के राज्यों में की जाती है. इसकी खेती अधिक ऊंचाई वाली जगहों को छोड़कर बाकी पूरे भारतवर्ष में की जाती है.

अगर आप भी बैंगन की खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

बैंगन की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन जल भराव वाली भूमि में जल निकासी की व्यवस्था कर इसकी खेत की जा सकती है. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 5 से 7 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

बैंगन के अच्छे उत्पादन के लिए शुष्क और आद्र जलवायु की जरूरत होती है. सर्दियों के मौसम में पड़ने वाले पाले का असर इसके पौधों पर देखने को मिलता है. जिससे इसकी पैदावार कम होती है. इसके पौधे को बारिश की काफी कम आवश्यकता होती है.

बैंगन के पौधों की रोपाई के वक्त तापमान 20 डिग्री के आसपास होना चाहिए. जबकि इसके पौधे को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान की जरूरत होती है. बैंगन का पौधा सर्दियों में न्यूनतम 13 और गर्मियों में अधिकतम 35 डिग्री तापमान को सहन कर सकता है.

उन्नत किस्में

बैंगन की खेती के लिए कई तरह की किस्मों का निर्माण किया गया है. इन सभी किस्मों को उनके रंग, आकार और पैदावार के आधार पर तैयार किया गया है.

स्वर्ण शक्ति

बैंगन की ये एक संकर किस्म है. जिसके पौधे की लम्बाई दो से तीन फिट के बीच पाई जाती है. इस किस्म के पौधे पर लगने वाले फल लम्बे चमकदार और बैंगनी रंग के होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 700 से 750 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

स्वर्ण श्री

इस किस्म के पौधों की लम्बाई दो से ढाई फिट तक पाई जाती है. जिस पर बहुत सारी शाखाएं होती है. इस किस्म के पौधे पर बड़े आकार वाले पत्ते बनते हैं. इसके पौधे पर लगने वाले फल अंडाकार और सफ़ेद रंग के होते हैं. इस किस्म के फलों का इस्तेमाल भुनकर बनाई जाने वाली सब्जी में अधिक किया जाता है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 500 से 600 क्विंटल तक पाया जाता है.

पूसा हाईब्रिड – 5

इस किस्म के पौधे भी अधिक पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 650 क्विंटल तक पाई जाती है. इस किस्म की खेती ज्यादातर दक्षिण भारत में की जाती है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 80 दिन बाद फल देना शुरू कर देते हैं. जिसके फल सामान्य लम्बाई वाले और गहरे बैंगनी रंग के होते हैं.

पूसा उपकार

इस किस्म में पौधों की लम्बाई दो फिट के आसपास पाई जाती है. जिसको मैदानी भाग में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे पर लगने वाले फलों का आकार गोल और रंग गहरा बैंगनी होता है. इस किस्म के फल रोपाई के 80 से 85 दिन बाद पकना शुरू कर देते हैं.

स्वर्ण श्यामली

बैंगन की उन्नत किस्म

बैंगन की इस किस्म को जीवाणु जनित मुरझा रोग नही लगता. इस किस्म में पौधों की पत्तियों पर हलके कांटे बने होते हैं. इसके पौधे रोपाई के लगभग 40 दिन बाद फल देना शुरू कर देते हैं. इसके फल बड़े और गोल आकार के होते हैं. जिनका रंग सफ़ेद धारियों युक्त हरा होता है. जिनका स्वाद बड़ा अच्छा आता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 600 क्विंटल के आसपास पाई जाती है.

काशी संदेश

बैंगन की ये एक संकर किस्म है, जिसको अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 60 टन के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे सामान्य ऊचाई वाले होते हैं. जिनकी शाखाएं फैली हुई होती हैं. इसकी पत्तियों का रंग हलका बैंगनी होता है. इस किस्म के पौधों पर लगने वाले फल गोल चमकदार और बैंगनी रंग के होते हैं.

अर्का नवनीत

बैंगन की इस किस्म का निर्माण अधिक पैदावार देने के लिए किया गया है. इस किस्म के पौधों पर लगने वाले फल गोल, चमकीले बैंगनी रंग के होते हैं. इसके फलों में बीज की मात्रा कम पाई जाती है. इसके फलों की सब्जी अधिक स्वादिष्ट बनती है. इसके फलों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 60 टन के आसपास पाया जाता है.

पंजाब सदाबहार

पंजाब सदाबहार का उत्पादन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में किया जाता है. इस किस्म के पौधे दो फिट की ऊंचाई वाले होते है. इसके पौधों पर लगने वाले फलों का रंग बैगनी होता है. लेकिन सामान्य रूप से काला दिखाई देता हैं. इसके फल लम्बे और चमकदार होते हैं. इसके फलों की समय पर तुड़ाई करते रहने पर फल छेदक का प्रकोप दिखाई नही देता. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 30 टन के आसपास पाई जाती है.

इनके अलावा और भी कई सारी किस्में मौजूद हैं. जिन्हें किसान भाई अलग अलग जगहों पर पैदावार के हिसाब से उगाते हैं. इनमें पूसा अनमोल, पन्त, ऋतुराज, पूसा बिन्दु, पूसा उत्तम- 31 और पूसा परपल लाँग जैसी बहुत सारी किस्में मौजूद हैं.

खेत की तैयारी

बैंगन की खेती के लिए खेत की मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए. इसके लिए शुरुआत में खेत की जुताई से पहले उसमें मौजूद पुरानी फसल के सभी तरह के अवशेषों को नष्ट कर खेत की पलाऊ के माध्यम से गहरी जुताई कर खेत को कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें. खेत की जुताई के कुछ दिन बाद उसमें पुरानी गोबर की खाद को डालकर कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन तिरछी जुताई कर खाद को मिट्टी में मिला दें. उसके बाद खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. पलेव करने के लगभग 5 से 6 दिन बाद खेत की फिर से जुताई कर उसमें मौजूद सभी तरह के ढेलों को नष्ट कर दें. और खेत में पाटा लगाकर भूमि को समतल बना लें.

पौध तैयार करना

बैंगन की खेती में बीज को सीधा खेतों में नही लगाया जाता, इसके लिए पहले नर्सरी में बीज से पौध तैयारी की जाती है. बैंगन की खेती साल में तीनों ऋतुओं में की जा सकती है. इसके लिए नर्सरी में बीज की रोपाई पौध लगाने के एक से डेढ़ महीने पहले की जाती है. शरदकालीन फसल की रोपाई के लिए नर्सरी में बीज की रोपाई मई महीने में की जाती है. जबकि ग्रीष्मकालीन और वर्षा ऋतू की फसलों के लिए बीज की रोपाई नवम्बर और फरवरी, मार्च महीने में की जाती है. एक हेक्टेयर खेती के लिए सामान्य किस्म का 400 ग्राम और संकर किस्म का 250 ग्राम बीज काफी होता है.

इसकी पौध तैयार करने के लिए पहले 3 गुना 5 फिट की क्यारियाँ तैयार की जाती है. इन क्यारियों में उचित मात्रा में उर्वरक मिलाकर उनमें बीज रोपण किया जाता है. क्यारियों में बीज का रोपण करने से पहले उसे थिरम या कैप्टन की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए. बीज को उपचारित करने के बाद उसे तैयार की गई क्यारियों में पंक्ति में लगाते हैं. प्रत्येक पंक्तियों के बीच 5 से 7 सेंटीमीटर की दूरी रखते हुए बीजों की रोपाई करें. उसके बाद हजारे के माध्यम से क्यारियों की सिंचाई करें.

पौध रोपण का तरीका और टाइम

बेंगान की मेड पर रोपाई

नर्सरी में तैयार की गई बैंगन की पौध को खेत में समतल और मेड दोनों पर लगा सकते हैं. समतल में पौध लगाते वक्त खेत में 1 गुना 3 मीटर की क्यारी तैयार कर उनमें लगाया जाता है. क्यारियों में लगाए गए सभी पौधों के बीच लगभग 2 फिट की दूरी रखी जाती है. जबकि मेड पर इसकी रोपाई करते वक्त मेड से मेड की दूरी दो से ढाई फिट रखी जाती है. और मेड पर प्रत्येक पौधों के बीच की दूरी डेढ़ फिट रखी जाती है. दोनों तरह की रोपाई के दौरान पौधों की जड़ों की रोपाई जमीन में 5 से 6 सेंटीमीटर नीचे करनी चाहिए. और पौध की रोपाई हमेशा शाम के वक्त करनी चाहिए.

बैंगन के पौधों की रोपाई पूरे साल तीनों ऋतुओं में की जाती है. शरदकालीन फसल के लिए इसकी पौध मध्य जून से मध्य जुलाई तक लगानी चाहिए. इस दौरान बारिश का मौसम होने की वजह से पौधा आसानी से विकास करता है. और गर्मी के मौसम में पैदावार लेने के लिए इसके पौधों की रोपाई जनवरी माह के आखिर तक कर देनी चाहिए. वर्षा काल की फसल के लिए इसके पौधों की रोपाई मार्च या अप्रैल माह में की जानी चाहिए.

पौधों की सिंचाई

बैंगन के पौधों की रोपाई के तुरंत बाद उनकी पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इसके पौधों को गर्मी के मौसम में अधिक सिंचाई की जरूरत होती है. गर्मियों के मौसम में इसके पौधों की तीन से चार दिन के अन्तराल में सिंचाई करते रहना चाहिए. और सर्दी के मौसम में इसके पौधे को 10 से 15 दिन के अंतराल में पानी देना चाहिए. सर्दियों के मौसम में तेज़ पाला पड़ने के दौरान पौधों की हलकी हलकी सिंचाई सप्ताह में दो बार करनी चाहिए. इससे पौधों पर पाले का प्रभाव कम होता है. वहीँ बारिश के मौसम में इसके पौधे को सिंचाई की काफी कम आवश्यकता होती है. इस कारण बारिश के मौसम में इसके पौधे की सिंचाई आवश्यकता के अनुसार ही करनी चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

बैंगन के पौधों को उर्वरक की ज्यादा जरूरत होती है. इसके लिए खेत की जुताई के वक्त लगभग 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को खेत में डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. गोबर की खाद की जगह वर्मी कम्पोस्ट खाद का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

इसकी खेती में जैविक खाद के साथ साथ रासायनिक खाद का भी इस्तेमाल किया जाता है. इसके लिए तीन बोरे एन.पी.के. की मात्रा को प्रति  हेक्टेयर के हिसाब से खेत में आखिरी जुताई के वक्त देना चाहिए. इसके अलावा जब पौधे पर फूल बने शुरू हो तब 20 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सिंचाई के साथ देना चाहिए. इससे पैदावार जल्दी और अधिक मात्रा में प्राप्त होती है.

पौधों की कटींग

बैंगन के पौधों की 3G कटिंग की जाती है. इसके करने से पौधों से अधिक मात्रा में पैदावार प्राप्त की जा सकती हैं. इसके लिए पौधे के मुख्य तने को एक से डेढ़ फिट की ऊंचाई तक जाने के बाद उपर से काटकर पौधे की बढ़वार को रोक देते हैं. जिससे पौधा शखाओं में फैलने लगता है. जब पौधे की शाखायें अधिक लम्बाई की हो जाए तो उनकी भी बढ़वार को रोक दिया जाता है. जिससे पौधा में और शाखाओं का जन्म होता है. जिन पर अधिक मात्रा में फल लगने लगते हैं.

खरपतवार नियंत्रण

बैंगन की खेती में खरपतवार नियंत्रण करना जरूरी होता है. क्योंकि इसके फल जमीन से बहुत कम ऊंचाई पर लगते हैं. ऐसे में खरपतवार में जन्म लेने वाले कीट इसके फलों को अधिक प्रभावित करते हैं. इसकी खेती में खरपतवार नियंत्रण पौधों की तीन से चार गुड़ाई कर करना चाहिए. बैंगन के पौधों की पहली गुड़ाई पौध रोपाई के लगभग 15 से 20 दिन बाद हल्की हल्की करनी चाहिए. और अगर हो सके तो पौधों की गुड़ाई ना कर हाथ के माध्यम से ही खरपतवार निकाल देनी चाहिए. उसके बाद बाकी की गुड़ाई 15 दिन के अंतराल में कर देनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

बैंगन के पौधे में कई ऐसे रोग देखने को मिलते हैं, जिनकी वजह से पैदावार काफी ज्यादा प्रभावित होती है. जिनकी रोकथाम टाइम पर की जानी चाहिए.

हरा तेला

बैंगन के पौधों पर दिखाई देने वाला हरा तेला का रोग उसकी पत्तियों को अधिक नुक्सान पहुँचाता है. इस रोग के किट पौधों की पत्तियों से रस चूसकर उन्हें नष्ट कर देते हैं. इस रोग के लगने पर शुरुआत में पौधा भूरा दिखाई देने लगता है. पौधों पर इस रोग के लगने पर पैदावार कम प्राप्त होती है. इस रोग की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास, फोस्फेमिडोन या कार्बेरिल की उचित मात्रा छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

फल छेदक

बैंगन की फसल में फल छेदक रोग की वजह से पैदावार को अधिक नुक्सान पहुँचता है. इस रोग का लार्वा बैंगन के फलों में जाकर उन्हें अंदर से खाकर नष्ट कर देता है. जिससे फल पूरी तरह खराब हो जाता है. इस रोग के लार्वा का रंग सफ़ेद दिखाई देता है. जो पौधे के तने को खाकर पौधे को भी नुक्सान पहुँचाता है. तने के खाने पर रोग ग्रस्त पौधे की शाखाएं सूखकर मुरझाने लगती है. इस रोग की रोकथाम के लिए साइपरमेथ्रिन या इंडोसल्फान की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

झुलसा रोग

बैंगन के पौधे पर झुलसा रोग मौसम परिवर्तन के वक्त देखने को मिलता है. इस रोग की वजह से शुरुआत में पत्तियों पर पीले भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. इस रोग के बढ़ने पर धीरे धीरे पौधे की पत्तियां सिकुड़कर सूखने लगती है. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देता है. जिससे पौधे का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए मैन्कोजेब या जाईनेब की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

आद्रगलन

आद्रगलन रोग पौधों पर शुरुआत में देखने को मिलता है. जिसे उखठा रोग के नाम से भी जाना जाता है. इस रोग के लगने पर पौधे का जमीन के पास वाला भाग काला पड़ने लगता है. जिसके कुछ दिन बाद पौधा सड़कर गिर जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए बीज और पौधे की जड़ों को रोपाई से पहले कैप्टन से उपचारित कर लेना चाहिए.

फोमोप्सिस ब्लाइट

रोग लगा पौधा

बैंगन के पौधों में फोमोप्सिस ब्लाइट रोग फफूंद की वजह से देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर भूरे काले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. जो धीरे धीरे बढ़कर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं. जिससे पत्ती पीली पड़कर सुख जाती है. अगर इसकी रोकथाम ना की जाए तो इस रोग के लक्ष्ण धीरे धीरे फलों पर भी दिखाई देने लगते हैं. जिससे फल भी सड़कर नष्ट हो जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर 10 दिन के अंतराल में बाविस्टिन का छिडकाव दो से तीन बार करना चाहिए.

छोटी पत्ती रोग

बैंगन के पौधे पर छोटी पत्ती का रोग बहुत ही हानिकारक होता है. इस रोग के लगने पर पौधे पर फल नही बनते. और पौधे की पत्तियों का आकर भी बहुत छोटा दिखाई देने लगता है. रोग लगी पत्तियां पौधे के तने पर गुच्छे के रूप में दिखाई देने लगती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर डाईमेथोएट 30 ई सी की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फलों की तुड़ाई

बैंगन की अलग अलग किस्मों के पौधों पर फल पौध रोपाई के लगभग 50 से 70 दिन के समय अंतराल में लगने शुरू हो जाते हैं. बैंगन के फल लगने के बाद जब फलों का आकार और रंग आकर्षक दिखाई दे, तब उसके बीजों के पकने से पहले उन्हें तोड़ लेना चाहिए. इसके फलों की तुड़ाई शाम के वक्त करनी चाहिए. जिससे फल दूसरे दिन भी ताज़े दिखाई देते हैं.

पैदावार और लाभ

बैंगन की विभिन्न किस्मों की पैदावार 200 से लेकर 600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पाई जाती है. जिनका बाज़ार में थोक भाव 10 रूपये के आसपास पाया जाता है. जिससे किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से 2 लाख तक की कमाई आसानी से कर लेता है.

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