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मछली पालन कैसे करें? मछली पालन व्यवसाय की सम्पूर्ण जानकारी

भारत सरकार लगातार किसानों की आय को बढ़ाने का प्रयास कर रही है. इसके लिए सरकार कृषि के साथ साथ कुछ छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने में लगी है. ताकि किसान भाई खेती के साथ साथ अन्य स्रोतों से अपनी आजीविका आसानी से चला सके और कमाई भी कर सके. इन्ही छोटे उद्योगों बढ़ावा देने के लिए सरकार की तरफ से सब्सिडी भी दी जाती है. जिससे किसान भाइयों को इनको लगाने में सहायता प्राप्त होती है. इन्ही छोटे उद्योगों में शामिल मछली पालन का उद्योग है. जो वर्तमान में किसान भाइयों के बीच काफी फेमस होता जा रहा हैं.  इसकी आपार संभावनाओं को देखते हुए किसान भाइयों का झुकाव इसकी तरफ अधिक होने लगा है. जिसके बारें में आज हम आपको सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

Table of Contents

मछली पालन

मछली पालन क्यों करें?

वर्तमान में मछली की मांग बाजार में काफी ज्यादा है. जिसको देखते हुए इनको बेचने में भी अधिक दिक़्क़तों का सामना नही करना पड़ता. इसके अलावा मछली पालन उद्योग की शुरुआत करने में अधिक पूंजी की भी जरूरत नही होती. यह उद्योग कम खर्च में अधिक उत्पादन देने वाला है. इसकी शुरुआत छोटे और बड़े दोनों पैमाने पर की जा सकती है. इसके लिए सरकार की तरफ से भी सहायता प्रदान की जाती है. इस उद्योग से प्राप्त होने वाला लाभ इसमें होने वाले खर्च से लगभग 5 से 10 गुना अधिक प्राप्त होता हैं. जिससे किसान भाई की अच्छीखासी कमाई हो जाती है.

मछली पालन के तरीके

मछली पालन कई तरह से किया जा सकता है. लेकिन मुख्य रूप से इसे तीन तरीकों से ही किया जाता है.

सामान्य विधि (जाल विधि)

सामान्य विधि से मछली का पालन पूरी तरह बिना खर्च के किया जाता है. जिसमें सिर्फ मेहनत की आवश्यकता होती हैं. इस विधि से मछली का पालन नहर, नदी, बांध और समुद्र में किया जाता है. इसमें प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली मछलियों को पकड़कर बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है. जिसे सिर्क छोटे पैमाने पर ही कर सकते हैं. इस विधि से मछली पालन सिर्फ नदी, नहर या समुद्र तटीय भागों में ही किया जा सकता है. इसको करने में काफी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है.

घर पर मछली पालन

घर पर मछली पालन के लिए कम भूमि की जरूरत होती है. इस विधि से मछली पालन छोटे पैमाने पर उन जगहों पर किया जाता है, जहां पास में कोई प्राकृतिक या उचित स्थान नही होता. इस विधि में मछली पालन घर पर प्लास्टिक टैंक लगाकर या घर पर जमीन में छोटे तालाब बनाकर उसमें इसका व्यापार शुरू किया जाता है. जिसे खुद एक व्यक्ति आसानी से चला सकता है. इसको शुरू करने में लगभग 30 से 40 हजार का खर्च आता है. जबकि उत्पादन से प्राप्त होने वाला लाभ काफी अच्छा होता है. इस विधि से किसान भाई एक हजार के आसपास मछली पालना कर एक लाख तक की कमाई कर सकता है.

कृत्रिम रूप से बड़े तालाब बनाकर

कृत्रिम रूप से तालाब बनवाकर इसका व्यवसाय बड़े पैमाने पर किया जाता है. बड़े पैमाने पर इसको शुरू करने के तरीके को सबसे बेहतर माना जाता है. क्योंकि इस तरीके से इसका व्यावसाय करने पर बहुत ही कम खर्च में बार बार अधिक उत्पादन प्राप्त हो जाता है. इस तरीके से व्यवसाय करने में शुरुआत में रखरखाव की चीजों पर एक बार ही खर्च किया जाता हैं उसके बाद इससे लगातार मुनाफा ही कमाया जाता है. और इस तरीके से मछलियों की देखभाल उचित तरीके से की जा सकती है. जिससे मछलियों में नुक्सान भी काफी कम देखने को मिलता है.

वर्तमान में इन के अलावा एक और तकनिकी आ गई है. जिसे बाईफ्लोक के नाम से जाना जाता है. जो कुछ हद तक कृत्रिम रूप से ही की जाती हैं. जिसमें मछली को तैयार करने में और भी कम खर्च होता है. और प्राप्त होने वाले उत्पादन से लाभ अधिक मिलता है.

मछली पालन शुरू करने के लिए आवश्यक चीजें

छोटे पैमाने पर मछली पालन सामान्य रूप से एक लाख तक की पूंजी लगाकर शुरू कर सकते हैं. लेकिन बड़े पैमाने पर करने के लिए पहले इसे सरकार द्वारा रजिस्टर्ड करवाना पड़ता हैं. जिसके बाद इसे शुरू किया जाता है. इसको शुरू करने के लिए काफी चीजों की आवश्यकता होती है.

जमीन

इसको शुरू करने के लिए सबसे पहले जमीन की जरूरत होती है. जमीन किसान भाइयों के पास अगर खुद की है तो इसको शुरू करने में काफी आसानी होती है. लेकिन जिन किसान भाइयों के पास खुद की जमीन ना हो वो जमीन रेंट पर लेकर भी शुरू कर सकते हैं.

टैंक का निर्माण

मछली पालन को शुरू करने के लिए सबसे पहले टैंक का होना जरूरी होता है. जिसे पक्के रूप में सीमेंट और कंक्रीट के माध्यम से बनवाया जाता हैं. जिसे एक बार बनवाने के बाद कई सालों तक काम में लिया जा सकता है. वर्तमान में काफी अलग अलग तरह के टैंक बाजार में मौजूद है, जिनके उपकरणों को किसान भाई बाजार से आसानी से खरीद कर उन्हें घर में छोटे पैमाने पर लगा सकते हैं. टैंक की स्थापना ऐसी जगह की जानी चाहिए , जहां पानी की दिक्कत ना हो. इसके अलावा जल निकासी का प्रबंधन अच्छे से किया गया हो. ताकि बाद में टैंको में पानी आसानी से बदला जा सके.

अगर आप मछली पालन का काम करना शुरू कर रहे हैं तो टैंकों का निर्माण हमेशा सर्दी के मौसम में करें. क्योंकि सर्दी के मौसम में मछलियों का विकास रुक जाता है. इस कारण सर्दियों में टैंको का निर्माण करने पर वो सही समय पर तैयार हो जाते है. जिससे गर्मियों के मौसम में मछलियों का उत्पादन बहुत जल्द मिल जाता हैं.

मोटर पम्प

मछली उत्पादन में मोटर पम्प की जरूरत पानी को भरने और बदलने के लिए होती है. क्योंकि एक टैंक में कई हजार लीटर पानी भरा जाता है. जिसे भरने में के लिए बड़े मोटर पम्प की आवश्यकता होती है.

मछलियों का चारा और दवाई

मछलियों को जिन्दा रहने और अच्छे से विकास करने के लिए खाने की जरूरत होती है. जिसकी जरूरत सामान्य रूप से सभी प्राणियों को होती है. लेकिन मछलियों की अलग अलग प्रजातियों के लिए खाने की जरूरत अलग अलग होती है. जो बाजार में मुर्गी के दाने की तरह मिलता हैं जिसे आसानी से बाजार से खरीदकर मछलियों को दिया जा सकता हैं. और बिमारियों की देखभाल के लिए बिमारियों के बारें में जानकारी होनी चाहिए.

पानी और वातावरण जांच के यंत्र

मछली पालन के दौरान वातावरण की अनुकूलता को जाँचने के लिए थर्मामीटर और पानी में ऑक्सीजन की सांद्रता और पी.एच. मान को जाँचने के लिए उचित उपकरणों की जरूरत होती है. ये सभी उपकरण बाजार में आसानी से मिल जाते हैं.

अनुकूल वातावरण तैयार करना

मछली पालन के दौरान वातावरण का अनुकूल होना काफी जरूरी होता है. इसके लिए जिस जगह टैंक बनाए जाते हैं, वहां मछलियों की सर्दी और गर्मी से सुरक्षा के लिए टैंको को ढककर रखा जाता है. इसके लिए टैंको को ऊपर से बड़े पर्दों से ढका जाता हैं. जिसे लगाने के लिए लोहे के पाइप या पक्की दीवारों के पोल बनांये जाते हैं

ऑक्सीजन की आपूर्ति के उपकरण

मछलियाँ पानी में रहकर ही अपना विकास करती हैं, इसके लिए पानी मछलियों के लिए उपयोगी होना चाहिए. जिसमें ऑक्सीजन की मात्रा एक सामान बनी रहनी चाहिए. पानी में ऑक्सीजन की कमी होने पर उसमें ऑक्सीजन की उचित मात्रा करने के लिए उसमें ऑक्सीजन का प्रवाह मशीनों के माध्यम से किया जाता है. या पानी को बदल दिया जाता है.

मछलियों का चयन

मछली पालन में सबसे प्रमुख काम मछलियों के चयन का होता हैं. मछलियों के चयन कई प्रक्रियाओं के माध्यम से की जाती हैं.

वातावरण के आधार पर

मछलियों के विकास में वातावरण का काफी अहम योगदान होता है. अलग अलग वातावरण में अलग अलग तरह की मछली का उत्पादन किया जाता है. मछली उत्पादन में वातावरण की बात करें तो उत्तर भारत के हरियाणा में मछली की कतला, राहू, मिर्गल और कामन कार्प जैसी किस्मों का पालन आसानी से किया जा सकता है. वहीं बात करें उष्ण प्रदेशो के लिए तो इसके लिए कामन कार्प सबसे उत्तम प्रजाति मानी जाती है.

मछली के बाजार भाव के आधार पर

वातावरण के आधार पर चयन करने के बाद इसके बाजार भाव का नम्बर आता है. जो मछली पालन का मुख्य उद्देश्य होता है. क्योंकि कोई भी व्यक्ति अगर इसका व्यापार करता है, तो सबसे पहले अधिक मुनाफा लेने के बारें में सोचता है. इस कारण हमेशा बाजार में अधिक महंगी बिकने वाली और कम खर्च में तैयार होने वाली मछली का चयन करना चाहिए.

प्रजाति के आधार पर

प्रजाति के आधार पर मछली का चयन करने के दौरान इसकी सबसे उन्नत प्रजातियों का ही चयन करना चाहिए. वैसे तो मछली की बहुत सारी प्रजाति हैं. लेकिन खाने योग्य कुछ प्रजाति हैं जिन्हें सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है.

देशी प्रजाति

कतला

कतला मछली सबसे तेजी से विकास करने वाली मछली है. जिसका पालन उत्तर भारत में अधिक किया जाता है. यह अपने भोजन के रूप में सूक्ष्म शैवाल, कीड़ों के लार्वा, जलीय घास पात और सड़ी गली वनस्पति को खाती है. जिससे इसके पालन में खर्च कम आता है. जबकि बाजार में इसका भाव काफी अच्छा मिलता है. और यह एक साल में ही डेढ़ किलो से ज्यादा वजन की हो जाती है. इसका वजन अधिकतम 60 किलो तक पाया जा सकता है.

राहू

इस प्रजाति की मछली भी काफी जल्दी बड़ी हो जाती हैं. इसके जीव अपने भोजन के रूप में मुख्य रूप से पानी में जमने वाली खाई को खाते हैं. इसके अलावा ये पानी के पौधों की सड़ी हुई पत्तियों और अन्य घास पात को खाती हैं. इसके जीव एक साल में ही एक फिट से अधिक लम्बाई के हो जाते हैं. जिनका वजन एक किलो से ज्यादा पाया जाता है. इसका बाजार भाव काफी अच्छा मिलता है.

मिर्गल

राहू और कतला के बाद ये काफी तेजी से बढ़ने वाली मछली हैं. जो एक साल में 800 ग्राम के आसपास भर वाली हो जाती है. इसके जीव चलते पानी में अपने अंडे छोड़ते हैं. भोजन के रूप में इस प्रजाति की मछली सड़ी गली पत्तियों और मलबे को खाती है. जिससे इसके भोजन पर अधिक खर्च करना नही पड़ता और उत्पादन से अधिक लाभ मिलता हैं.

विदेशी प्रजाति

कॉमन कार्प

कॉमन कार्प मछली की ये एक विदेशी प्रजाति है. जो  समशीतोष्ण प्रदेश की मछली होने के बाद भी निम्न तापमान वाली जगहों में आसानी से विकास कर लेती है. मछली की इस प्रजाति के जीव सर्वभक्षी होते हैं जो आसानी से कृत्रिम खाने को भी खा लेते हैं. इसके जीव एक साल में एक दे दो किलो तक वजन बना लेते हैं. इसके जीव पानी में कम ऑक्सीजन और अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड की सांद्रता को अन्य मछलियों से ज्यादा झेल सकते है.

ग्रास कार्प

ग्रास कार्प भी मछली अपने भोजन के रूप में मुख्य रूप से पानी में पाए जाने वाले पौधों को खाती है. इसके अलावा यह स्थलीय वनस्पतियां, अनाज, आलू, चावल की भूसी, सब्जियों के पत्ते और उनके तने को भी खाती है. अगर टैंक या तालाब के पानी में जलीय पौधे कम हो तो इसके जीवों का विकास रुक जाता है. इस प्रजाति की मछली एक साल में ही दो किलो से ज्यादा वजन बना लेती है. जो बहुत अधिक मात्रा में भोजन ग्रहण करती है.

सिल्वर कार्प

मछली की यह प्रजाति सबसे तेजी से बढ़ने वाली है. इसके जीव एक साल में ही तीन किलो के आसपास वजन वाले बन जाते हैं. इसके जीव भोजन के रूप में वनस्पति प्लवक को खाते हैं. इसके जीवों को ऑक्सीजन की जरूरत अधिक होती है. पानी में ऑक्सीजन की कमी होने से इसके जीव बहुत जल्द नष्ट हो जाते हैं. इसलिए इन्हें अधिक देखभाल की जरूरत होती है.

मछलियों को टैंकों में डालना

मछलियों के चयन के बाद उन्हें खरीदकर टैंकों में डाला जाता है. मछलियों को टैंक में डालने के दौरान कभी भी एक ही प्रजाति की मछलियों को एक टैंक में नही डालना चाहिए. एक टैंक में कम से कम पांच से सात प्रजाति की मछलियों को एक साथ डालना चाहिए. क्योंकि इससे उत्पादन सामान रूप से मिलता रहता है. क्योंकि अलग अलग प्रजाति की मछलियों का वजन अलग होता हैं. अलग अलग प्रजाति की मछलियों को टैंक में डालने से पहले उनके एक दुसरे के साथ रहने की स्थिति के बारें में जांच कर लें. एक एकड़ टैंक में लगभग चार हजार के आसपास अलग अलग प्रजातियों की मछलियों को डाला जाता है.

मछलियों की देखरेख

मछलियों को टैंक में डालने के बाद उनकी देखरेख की जाती है. जिसमे जीवों के विकास के लिए उन्हें हर रोज़ उचित मात्रा में खाना देते रहना चाहिए. इसके अलावा जीवों में काफी बार रोग भी लग जाते है. जिनकी समय रहते देखभाल की जानी चाहिए. इसके जीवों में रोग फैलने से रोकने के लिए पोटेशियम परमैंगनेट या सोडियम पानी में मिलाना चाहिए.

इसके अलावा इसके पानी भी शुद्ध और उचित गुणवत्ता वाला होना चाहिए. इसके लिए पानी की जाँच करते रहना चाहिए. मछली पालन के दौरान टैंकों में पानी अधिकतम दो सप्ताह तक ही भरा रहने दें. उसके बाद पानी को बदल दें. क्योंकि साफ़ पानी में इसके जीव अच्छे से विकास करते हैं.

मछलियों को टैंकों से कब और कैसे निकालें

मछली लगभग एक साल बाद पूर्ण रूप से तैयार हो जाती है. एक साल पुरानी मछली का वजन लगभग एक किलो के आसपास या इससे अधिक हो जाता, तब उसे जाल की सहायता से निकाल लेना चाहिए. जाल से निकलते वक्त सावधानी से केवल बड़ी मछलियों को ही पकड़ना चाहिए. और छोटी मछलियों को किसी तरह का नुक्सान नही पहुंचाना चाहिए.

मछलियों को पकड़ने के तुरंत बाद बेचने के लिए भेज देना चाहिए. मछलियों को बेचने में अधिक मेहनत की जरूरत नही होती. क्योंकि इसकी मांग हर जगह होती हैं. इसलिए इसे अपने नजदीकी किसी मंडी में बेचकर अच्छा लाभ कमा सकते हैं.

मछली उत्पादन में लाभ

एक एकड़ में लगभग चार हजार के आसपास मछलियों को टैंक में डाला जाता है. जिनको खरीदने और भोजन देने में सालभर में लगभग दो लाख का खर्च आ जाता है. और एक साल बाद प्रत्येक मछली का औसत वजन एक किलो मान ले. और जिनका बाजार भाव 100 रूपये प्रति किलो भी मिले तो एक बार में एक एकड़ से लगभग चार लाख से ज्यादा की कमाई हो जाती है.

मछली उत्पादन के दौरान सावधानी

मछली उत्पादन के दौरान काफी सावधानियां रखी जानी आवश्यक है. जिन्हें अगर नही रखा जाए तो इसमें काफी नुक्सान पहुँचता है.

  1. मछली पालन के लिए टैंको का निर्माण खुली जगह में करवाना चाहिए. जहाँ सूर्य की धूप सीधी पड़ती हो. और साथ ही टैंको को बारिश और सर्दी से बचाने की व्यवस्था भी कर लेनी चाहिए.
  2. पानी में सीप, घोंघे और अन्य कीट को टैंकों में पैदा ना होने दें.
  3. मछलियों को खाने वाले मासाहारी जीवों से टैंको की सुरक्षा करनी चाहिए. इसके लिए पानी में जाल बिछा दें.
  4. पानी में ऑक्सीजन की मात्रा को बनाए रखे. इसके लिए समय समय पर टैंक की जांच करते रहे और पानी को बदल दें.
  5. मछलियों में बीमारी सर्दी के मौसम में अधिक दिखाई देती है. इसलिए इस दौरान ख़ास ध्यान रखना चाहिए.
  6. मछली की वातावरण और मुनाफे के आधार पर उन्नत नस्ल का ही चयन करें.
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