केसर अपनी अनोखी सुगंध और अपने ख़ास गुणों के लिए जाना जाता है. बाज़ार में केसर की कीमत एक से लेकर तीन लाख रूपये प्रति किलो तक पाई जाती है. केसर को लाल सोना भी कहा जाता है. इसका इस्तेमाल प्राचीन काल से होता रहा है. इसको एक औषधीय और गुणकारी पौधा माना जाता है. इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्राचीन काल से होता रहा है. केसर का इस्तेमाल साबुन और सौंदर्य प्रसाधन की चीजों में भी किया जाता है.
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केसर का इस्तेमाल खाने में भी कई तरह से किया जाता है. केसर के अंदर कई ऐसे गुणकारी तत्व पाए जाते हैं जो मनुष्य के लिए बहुत ज्यादा लाभदायक होते है. केसर को दूध में डालकर गर्भवती महिला को पिलाना अच्छा होता है. केसर के इस्तेमाल से हृदय से संबंधित रोग नही होते और रक्त शोधन की क्षमता भी बढ़ जाती है.
केसर की खेती ज्यादातर यूरोप और एशियाई भागों में ही की जाती है. स्पेन और ईरान दुनिया का 80 प्रतिशत केसर पैदा करते हैं. इसकी खेती समुद्र तल से 1000 से 2500 मीटर की ऊंचाई वाली जगहों पर की जा सकती है. इसकी खेती के लिए बर्फीले प्रदेशों को उचित माना जाता है. इसकी खेती उचित जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में की जा सकती है. आज केसर की खेती कर किसान भाई बड़ा मुनाफा कमा रहे हैं.
अगर आप भी केसर की खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.
उपयुक्त मिट्टी
केसर की खेती के लिए रेतीली चिकनी बलुई और दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है. लेकिन वर्तमान में उचित देखरेख कर इसकी खेती राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेशों में भी की जा रही है. इसकी खेती के लिए जमीन में पानी का भराव नही होना चाहिए. क्योंकि पानी भराव की वजह से इसके बीज सड़कर नष्ट हो जाते हैं. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.
जलवायु और तापमान
केसर की खेती बर्फिलें प्रदेशों में सबसे ज्यादा की जाती है. इसकी खेती के लिए सर्दी, गर्मी और धूप तीनों की जरूरत होती है. सर्दी में पड़ने वाली बर्फ और गीला मौसम इसके फूलों की वृद्धि को रोकता है. जो इसके लिए उपयोगी भी होता है. क्योंकि इससे बाद में नए फूल अधिक मात्रा में आते हैं. इसके पौधे में फूल सर्दी के बाद आते हैं. दरअसल जब सूर्य की गर्मी से बर्फ पिघलने लगती है और जमीन सुखने लगती है तब इसके पौधों में फूल आने लगते हैं. जिसमें केसर लगता है.
इसके पौधों को उगने और वृद्धि करने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. इसके पौधों पर फूल बनने के लिए 10 से 20 डिग्री के आसपास तापमान बेहतर होता है.
उन्नत किस्में
केसर की बाज़ार में दो ही किस्में मौजूद हैं. जिनको कश्मीरी और अमेरिकन केसर के नाम से जाना जाता है. भारत में वर्तमान में अमेरिकन केसर की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है.
कश्मीरी मोंगरा

कश्मीरी मोंगरा किस्म का केसर सबसे महंगा मिलता है. दुनियाभर में इसकी कीमत 3 लाख रूपये प्रति किलो से भी ज्यादा है. इस किस्म के केसर की खेती सिर्फ जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ और पंपोर में ही की जाती है. इस किस्म के पौधे 20 से 25 सेंटीमीटर ऊचाई के होते हैं. जिन पर बेंगनी, नीले और सफ़ेद रंग के फूल आते हैं. इन फूलों का आकार कीपनुमा होता है. जिनके अंदर दो से तीन लाल-नारंगी रंग के तन्तु (पंखुडियां) पाए जाते हैं. ये तन्तु ही केसर होता है. इसके लगभग 75 हज़ार फूलों से 450 ग्राम केसर बनता है.
अमेरिकन केसर
अमेरिकन केसर की खेती जम्मू कश्मीर के बाहर कई जगहों पर की जा रही हैं. लेकिन इस किस्म के केसर की कीमत कश्मीरी मोंगरा से बहुत कम पाई जाती है. इस किस्म के पौधों को ख़ास जलवायु की जरूरत नही होती. इन्हें राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेशों में भी उगाया जा रहा है. इसके पौधे चार से पांच फिट तक लम्बे पाए जाते हैं. इनके शिखर पर इसके डंठल बनते हैं. जिनके ऊपर पीले रंग के फूल खिलते हैं. इसके फूल में भी तन्तु पाए जाते हैं. जिनकी मात्रा बहुत ज्यादा होती है. और जब इनका रंग लाल हो जाता है तब इन्हें तोड़ लिया जाता है.
खेत की जुताई
केसर की खेती के लिए शुरुआत में गहरी जुताई की जरूरत होती है. ताकि खेत में डाले जाने वाले उर्वरक जमीन के अंदर तक अच्छे से मिल जाएँ. इसके पौधे एक बार लगाने के बाद कई बार फल दे सकते हैं. इसलिए खेत की तैयारी करते वक्त खेतों को अच्छी तरह जोतकर और उचित मात्रा में उर्वरक मिलाकर उन्हें तैयार करें.
खेत की पहली जुताई पलाऊ लगाकर करें. उसके बाद खेत में गोबर की खाद डालकर उसे कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन तिरछी जुताई कर मिट्टी में अच्छे से मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी छोड़कर जमीन को गिला कर दें. जब जमीन से खरपतवार निकल आयें और जमीन हल्की सुख जाएँ, तब उसमें एन.पी.के. की उचित मात्र डालकर रोटावेटर चला दें. इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जायेगी. जिससे खेत में पानी भराव की समस्या नही हो पाएगी.
बीज लगाने का टाइम और तरीका
केसर की पैदावार लगभग 6 महीने की होती है. लेकिन अच्छी गुणवत्ता का केसर लेने के लिए केसर को टाइम पर लगाया जाना जरूरी है. क्योंकि केसर उसकी गुणवत्ता के आधार पर ही बिकता है.

केसर के बीज बारिश के मौसम के समाप्त होने के बाद जुलाई महीने के आखिर से सितंबर माह तक लगाए जाते हैं. अगस्त के माह के शुरुआत में इन्हें खेतों में लगाना सबसे उपयुक्त होता है. क्योंकि अगस्त के मौसम में लगाने के बाद सर्दियों की शुरुआत (नवम्बर माह) में इसके पौधों केसर देना शुरू कर देते हैं. और उसके बाद ज्यादा सर्दी के पड़ने से केसर खराब भी नही होता.
केसर को खेतों में समतल और मेड दोनों पर लगा सकते हैं. समतल में इनके पौधों को पंक्ति में डेढ़ से दो फिट की दूरी पर लगाते हैं. जबकि मेड पर इन्हें एक फिट की दूरी पर लगाना चाहिए. और प्रत्येक मेड के बीच एक से डेढ़ फिट की दूरी रखनी चाहिए.
एक हेक्टेयर में कश्मीरी मोंगरा के लिए लगभग 1 से 2 क्विंटल बीज की जरूरत होती है. जबकि अमेरिकन केसर का लगभग आधा किलो बीज काफी होता है. कश्मीरी मोंगरा केसर का बीज लहसुन के जैसा होता है.
पौधों की सिंचाई
केसर के बीज को खेत में लगाने के तुरंत बाद ही इसकी सिंचाई कर देनी चाहिए. अगर इसकी खेती बर्फिलें प्रदेशों से बहार की जा रही हो तो सर्दियों के मौसम में इनकी लगभग 15 दिन के अंतराल में सिंचाई कर देनी चाहिए. और गर्मियों के मौसम में सप्ताह में एक या दो बार सिंचाई करनी चाहिए. बारिश के मौसम में इसके पौधे को सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन अगर बारिश वक्त पर ना हो और पौधे को पानी जरूरत हो तो आवश्यकता के अनुसार पौधे की सिंचाई करनी चाहिए.
उर्वरक की मात्रा
केसर के पौधे को उर्वरक की ज्यादा जरूरत होती है. इसलिए शुरुआत में जब खेतों की जुताई करें तब 10 से 15 गाडी पुरानी गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालें. इसके अलावा जो किसान भाई खेत में रासाय्निकं खाद डालना चाहते हो वो एन.पी.के. की उचित मात्रा खेत में आखिरी जुताई से पहले छिडक दे. इसके बाद हर सिंचाई के साथ खेत में वेस्ट डिकम्पोजर पौधों को देना चाहिए.
खरपतवार नियंत्रण
केसर के पौधे को शुरुआत में खरपतवार नियंत्रण की जरूरत होती हैं. जब बीज अंकुरित हो जाए उसके लगभग 20 दिन बाद खेत की हल्की नीलाई गुड़ाई कर दें. उसके बाद लगभग 20 से 30 दिन के अंतराल में दो गुड़ाई और कर दें. इससे पौधा अच्छे से वृद्धि करता है.
पौधों की देखभाल
केसर के पौधों की देखभाल की जरूरत उन भागों में पड़ती हैं जहाँ बर्फ नही पड़ती. इसके पौधे सर्दी के मौसम को तो आसानी से सहन कर लेते हैं. लेकिन गर्मियों में इनके पौधों को सामान्य तापमान की जरूरत होती है. क्योंकि अधिक गर्मी में इसके पौधे नष्ट हो सकते हैं. इसलिए अधिक गर्मी से बचाने के लिए इनके पौधों को छाया की जरूरत होती है.
पौधे में लगने वाले रोग
केसर के पौधे पर बहुत कम रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन इसके पौधे पर सिर्फ दो तरह के ही रोग ज्यादा देखने को मिलते हैं.
बीज सडन
केसर के पौधे पर ये रोग रोपाई के बाद ज्यादा देखने को मिलता हैं. इस रोग कोर्म सड़ांध के नाम से भी जाना जाता है. इस रोग के लगने पर बीज सड़ने लगता है. जिससे पौधा अंकुरित होने से पहले ही नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे के बीज को सस्पेंशन कार्बेन्डाजिम से उपचारित कर लें. इसके अलावा पौधे के उगने के बाद ये रोग दिखाई दे तो पौधे की जड़ों पर 0.2 प्रतिशत सस्पेंशन कार्बेन्डाजिम का छिडकाव करना चाहिए.
मकड़ी जाला
पौधों पर ये रोग अंकुरित होने के एक से दो महीने बाद कभी भी दिखाई दे सकता है. इस रोग की वजह से पौधे की वृद्धि रुक जाती है. जिससे पैदावार पर फर्क देखने को मिलता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर 8 से 10 दिन पुरानी छाछ की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहिए.
केसर की तुड़ाई और सुखाई

केसर के पौधे रोपाई के लगभग तीन से चार महीने बाद ही केसर देना शुरू कर देते हैं. केसर के फूलों पर दिखाई देने पीली पंखुडियां जब लाल भगवा रंग की दिखाई देने लगे तब उन्हें तोड़कर संग्रहित कर लें. उसके बाद इन्हें किसी छायादार जगह पर सूखा लें. जब केसर पूरी तरह सूख जाए उसके बाद उसे किसी काँच के बर्तन में संग्रह कर लें.
पैदावार और लाभ
कश्मीरी केसर के लगभग 150000 फूलों से एक किलो केसर प्राप्त होती है. लेकिन पैदावार में अमेरिकन केसर की ज्यादा पैदावार होती है. एक बीघा खेत से अमेरिकन केसर एक किलो के आसपास पाया जाता है. लेकिन दोनों के बाज़ार भाव में काफी अंतर मिलता है. जहाँ कश्मीरी मोंगरा तीन लाख के आसपास बिकता हैं. वहीं अमेरिकन केसर उसमें केसर की मात्रा के आधार पर 50 हज़ार से लेकर दो लाख से ज्यादा में बेचा जाता है. इससे किसान भाई एक बार में एक बीघा से 50 हज़ार से दो लाख तक की कमाई कर सकता है.
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