सतावर की खेती कैसे करें – कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाए!

सतावर की खेती कंद के रूप में की जाती है. सतावर को सतावरी, सतमूल और सतमूली के नाम से भी जाना जाता है. सतावर एक औषधीय पौधा है जिसका आयुर्वेदिक दवाइयों में इस्तेमाल प्राचीन काल से होता रहा है. आयुर्वेदिक औषधियों में इसको औषधियों की रानी के नाम से भी जाना जाता है. सतावर के बारें में कहा जाता है कि इंसान रोज़ एक चमम्चा सतावर पाउडर को दूध के साथ लेता है, वो पूरे 100 साल तक अपनी जिंदगी जीता है.

सतावर की खेती

सतावर के अंदर कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो कई तरह की बिमारियों के इलाज़ में काम आते हैं. सतावर का इस्तेमाल दर्द कम करने, बांझपन हटाने, पाचन तंत्र की बीमारियों के इलाज, ट्यूमर और गले के संक्रमण जैसी बीमारियों में फ़ायदेमंद साबित होता है.

सतावर की खेती के लिए लैटेराइट और लाल दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए अधिक बारिश और ज्यादा सिंचाई की जरूरत नही होती. इसकी खेती शीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्रों में की जाती है. इसका पौधा पत्तियों रहित झाड़ीनुमा होता है. जिसकी लम्बाई 3 से 5 फिट तक हो सकती है. इसके पौधे पर काटों की मात्रा ज्यादा पाई जाती है.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

सतावर की खेती के लिए लैटेराइट और लाल दोमट मिट्टी बहुत उपयोगी होती है. लेकिन उचित देखरेख में इसको उचित जल निकासी वाली कई तरह की मिट्टियों में आसानी से उगाया जा सकता हैं. पथरीली भूमि में इसकी खेती नही की जा सकती. क्योंकि इसकी जड़ें लगभग एक से दो फिट की गहराई में जाती है. जबकि पथरीली जमीन में इनकी वृद्धि रुक जाती है. इसकी खेती के लिए सामान्य पी.एच. वाली मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है.

जलवायु और तापमान

सतावर की खेती के लिए शीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु को सबसे उपयुक्त माना जाता है. इसकी खेती लगभग 18 माह की होती है. जिसमें इसकी फसल को सभी ऋतुओं का सामना करना पड़ता है. लेकिन सर्दियों में अधिक ठंड या पाला और गर्मियों में अधिक तेज़ गर्मी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नही होती. इसकी खेती की लिए अधिक बारिश भी नुकसानदायक होती है.

इसकी खेती के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. जबकि 35 डिग्री से अधिक तापमान पर भी इसका पौधा विकास कर सकता है. लेकिन 10 डिग्री से कम तापमान इसकी खेती के लिए उपयुक्त नही होता. भारत में इसकी खेती मैदानी राज्यों में ज्यादा की जा रही है.

उन्नत किस्में

सतावर की कई किस्में बाज़ार में मौजूद हैं. जिन्हें दुनियाभर में उनकी पैदावार और मौसम के आधार पर अलग अलग जगहों पर उगाया जाता है. इनमें मुख्य रूप से एस्पेरेगस सारमेन्टोसस, एस्पेरेगस कुरिलो, एस्पेरेगस गोनोक्लैडो, एस्पेरेगस एडसेंस, एस्पेरेगस आफिसिनेलिस, एस्पेरेगस प्लुमोसस, एस्पेरेगस फिलिसिनस और एस्पेरेगस स्प्रेन्गेरी शामिल हैं. जबकि भारत में नेपाली और इंडियन सतावर की ही खेती की जाती है.

नेपाली

नेपाली किस्म

सतावर की इस किस्म का पौधा 3 से 5 फिट की ऊंचाई तक जा सकता है. इसके एक पौधे से कंदों की पैदावार 5 किलो तक आसानी से हो जाती है. इस किस्म के पौधे 18 महीने बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इनकी प्रति एकड़ औसतन पैदावार लगभग 200 से 300 क्विंटल तक हो जाति है.

इंडियन

इसका पौधा दो से तीन फिट की ऊचाई का होता है. इस किस्म की सतावर को पककर तैयार होने में लगभग 19 से 20 महीने का टाइम लगता है. इसकी प्रति एकड़ पैदावार 200 से 260 क्विंटल तक पाई जाती है. जिनको सुखाने पर 25 से 30 प्रतिशत तक शेष बच जाती है.

खेत की जुताई

सतावर की खेती के लिए मिट्टी कठोर और ढ़ेले वाली नही होनी चाहिए. क्योंकि कठोर जमीन में इसकी पैदावार कम होती है. और पौधे को उखाड़ने में भी दिक्कत होती हैं. इस कारण इसकी खेती के लिए खेत की अच्छी और गहरी जुताई की जानी चाहिए.

खेत की जुताई से पहले खेत में मौजूद सभी तरह के अवशेषों को नष्ट कर दें. उसके बाद पलाऊ लगाकर खेत की गहरी जुताई करें. पलाऊ लगाने के बाद खेत को कुछ दिन के लिए खुला छोड़ दें. उसके बाद खेत में गोबर का खाद डालकर कल्टीवेटर से दो से तीन तिरछी जुताई कर दें. कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद खेत में रोटावेटर चलाकर मिट्टी को पूरी तरह से ढ़ेले मुक्त बना लें. उसके बाद खेत में पानी चला दें. पानी चलाने के बाद जब खेत में खरपतवार जन्म ले तब फिर से रोटावेटर चलाकर खेत की फिर से अच्छे से जुताई कर दें. उसके बाद दो से तीन फिट की दूरी पर खेत में मेड तैयार करें.

पौध तैयार करना

सतावर की खेती पौध रोपण के माध्यम से करना अच्छा होता है. इस कारण इसकी पौध पहले नर्सरी में तैयार की जाती है. लेकिन बाज़ार में भी इसकी पौध मिल जाती है, जिनकी कीमत 3 रूपये के आसपास होती है. और नर्सरी में इसकी पौध बनाने में भी काफी खर्चा आता है. इस कारण बाज़ार से इसकी पौध खरीदना अच्छा होता है.

नर्सरी में इसकी पौध तैयार करने के लिए प्रति एकड़ के लिए 200 से 300 ग्राम बीज काफी होता है. जिन्हे क्यारी बनाकर उगाया जाता हैं. बीज को क्यारियों में लगाने से पहले उसे गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए. क्यारी में बीज को लगाते वक्त पंक्ति में 2 से 3 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाए. बीज को क्यारियों में लगाने के बाद उन्हें पुलाव से ढक देते हैं. और क्यारियों की सिंचाई कर देते हैं. क्यारियों की सिंचाई हजारे के माध्यम से करनी चाहिए.

पौध लगाने का तरीका और टाइम

पौध लगाने का तरीका

सतावर की पौध खेत में बनाई गई मेड पर लगाते हैं. मेड पर इन पौधों को दो से तीन फिट की दूरी पर लगाना चाहिए. पौध को खेत में तभी लगाए जब उसकी लम्बाई एक फिट से ज्यादा हो. पौध को हमेशा शाम के वक्त ही खेत में लगाना चाहिए. इससे पौध खराब होने की संभावना बहुत कम होती है, और पौधा अच्छे से अंकुरित होता है. मेड पर पौध को लगाने के बाद तुरंत उनकी सिंचाई कर देनी चाहिये.

जिस जगह सिंचाई की उचित व्यवस्था ना हो वहां सतावर के पौधों को खेत में जून से लेकर जुलाई के शुरूआती सप्ताह तक लगा सकते हैं. क्योंकि इस वक्त बारिश का मौसम होने की वजह से पौधों को सिंचाई की जरूरत नही होती. इसके अलावा इस दौरान मौसम सुहाना बना रहता है. जिससे पौध अच्छे से अंकुरित होती है. जहाँ सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वहां इसकी फसल को मार्च या अप्रैल माह में भी लगा सकते हैं.

पौधों की सिंचाई

सतावर के पौधों को अधिक सिंचाई की जरूरत नही होती. बारिश के मौसम से पहले अगर किसान भाई इसकी रोपाई करता है तो उसे गर्मियों के वक्त सप्ताह में एक बार पानी देना चाहिए. और जब बारिश का मौसम शुरू हो तब सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. बारिश के मौसम के बाद इसके पौधों को लगभग 15 से 20 दिन के अंतराल में पानी देना चाहिए. अगर सिंचाई करने के बाद बारिश हो जाए और जलभराव की स्थिति हो जाए तो खेत से पानी निकाल दें. क्योंकि जलभराव होने पर इसकी फसल में कई तरह के रोग लग सकते हैं. और फसल ख़राब भी हो सकती है.

उर्वरक की मात्रा

सतावर की खेती औषधीय पौधे के रूप में की जाती है. इस कारण इसके खेत में रसायनिक खाद का इस्तेमाल नही करना चाहिए. इसकी खेती में केवल जैविक खादों का ही इस्तेमाल करना चाहिए. इसके लिए खेत की जुताई के वक्त 10 से 15 गाडी पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे मिट्टी में मिला देना चाहिए. इसके अलावा हर सिंचाई के वक्त पानी के साथ वेस्ट डिकम्पोजर पौधों को दें. इससे पौधा अच्छे से विकास करता है और उसको कोई रोग भी नही लगता.

खरपतवार नियंत्रण

सतावर की खेती में खरपतवार नियंत्रण करना जरूरी होता है. क्योंकि इसके पौधे अपना पोषण जमीन की ऊपरी सतह से लेते हैं. लेकिन खरपतवार होने से इनके पौधों को पोषक तत्व उचित मात्रा में नही मिल पाते हैं. जिससे पौधा अच्छे से विकास नही करता और पैदावार भी कम होती है. सतावर के पौधे की तीन से चार गुड़ाई करने पर पैदावार अधिक प्राप्त होती है. और पौधा भी अच्छे से विकास करते है.

सतावर के पौधों को खेत में लगाने के लगभग एक महीने बाद इनकी नीलाई गुड़ाई कर देनी चाहिए. इससे पौधे की जड़ों को हवा की उचित मात्रा मिलती है. जिससे पौधा अच्छे से विकास करता है. जड़ें भी मोटी होती हैं. इसकी गुड़ाई के वक्त ध्यान रखे की कभी भी पौधे की गहरी गुड़ाई ना करें. क्योंकि इसकी जड़ें ज्यादा गहराई में नही जाती. इस कारण गहरी गुड़ाई करने से इसकी जड़ों और फसल दोनों को नुकसान पहुँच सकता है.

अतिरिक्त कमाई

सतावर का पौधा लगभग 18 महीने बाद पककर तैयार होता है. इस दौरान इसके साथ कम वक्त वाली लहसुन, टमाटर और बैंगन जैसी सब्जियों को आसानी से उगा सकते हैं. जिससे किसान भाइयों को आर्थिक परेशानी का सामना नही करना पड़ता.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

सतावर के पौधों में अभी तक कोई ख़ास रोग नही देखे गये हैं. लेकिन इसके पौधों पर कुछ जगह पीली कुंगी का रोग देखने को मिला हैं. पौधों पर ये रोग प्यूचीनिया एस्पारगी के कारण फैलता है. इस रोग के लगने पर पौधे पर पीले धब्बे दिखाई देते हैं. और पौधा सुखने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर बॉर्डीऑक्स के घोल का छिडकाव करना चाहिए.

पौधों की खुदाई और सफाई

सतावर के पौधों में कांटे बहुत ज्यादा पाए जाते हैं. इस कारण इसकी खुदाई से पहले जमीन के ऊपरी भाग को तेज़ धार वाले हथियार से काटकर अलग कर देना चाहिए. काटेंदार भाग को अलग करने के बाद पौधे के मूल से एक से सवा फिट की दूरी बनाते हुए चारों तरफ से खुदाई करें. उसके बाद पौधे की जड़ को जमीन से उखाड़कर उसकी मिट्टी निकाल देते है. इसके लिए जड़ों को कई भागों में तोड़ा जाता है. इन टूटी जड़ों से अँगुलियों को तेज़ धार वाले हथियार से काटकर अलग कर लेते है.

अँगुलियों को अलग करने के बाद उन्हें पानी से धोकर उनकी मिट्टी हटाई जाती हैं. उसके बाद जड़ों ( अँगुलियों ) को पानी में डालकर उन्हें उबाला जाता है. जड़ों को उबालने के बाद उनके छिलके को बाँस की लकड़ी की सहायता से हटा देते है. छिलके को हटाने के बाद अँगुलियों को तेज़ धूप में सुखाया जाता है. जब अँगुलियां सुख जाती हैं तब उन्हें बेच दिया जाता हैं. ज्यादा दूरी पर बेचने के लिए इन्हें हवा रहित बैग में भरना चाहिए.

पैदावार और लाभ

सतावर का पौधा लगभग 18 महीने में तैयार होता हैं. इसके प्रत्येक पौधे से औसतन तीन किलो तक ताज़ा सतावर पैदा हो जाती हैं. एक एकड़ से लगभग 300 क्विंटल तक ताज़ा जड़ें मिल जाती है. जिनको सुखाने के बाद इनका 25 से 30 प्रतिशत शेष रह जाता है. ताज़ा सतावर बाज़ार में 20 से 30 रूपये किलो बेचा जा सकता है. जिससे किसान भाई एक एकड़ से एक बार में 6 से 7 लाख तक की कमाई आसानी से कर सकता है.

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