फसलों के प्रकार – Types of Crops in India

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है. भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का प्राचीन काल से ही सबसे ज्यादा और अहम योगदान रहा है. कृषि के माध्यम से ही आज लाखों लोगों को रोज़गार मुहैया हो रहा है. आज भारत में कई प्रकार की खेती कर किसान भाई अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं. लेकिन काफी किसान भाई है जो परम्परागत खेती की वजह से लगातार गरीब होते जा रहे है. किसान भाइयों को अपने अच्छे विकास के लिए सही खेती और उसे करने के सही तरीकों का चुनाव कर खेती करनी चाहिए.

फसलों के प्रकार

वैसे तो भारत में मौसम के आधार पर तीन तरह की ही खेती की जाती है. जिसे सभी किसान भाई खरीफ, रबी और जायद के नाम से जानते हैं. लेकिन इन सभी प्रकारों को भी उनकी श्रेणी के आधार में कई भागों में बांटा गया है. जिनके बारें में इस आर्टिकल में हम आपको सम्पुर्ण जानकारी देने वाले हैं.

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मौसम के आधार पर फसलों के प्रकार

खरीफ

भारत में खरीफ की फसलें बारिश के मौसम के दौरान जून और जुलाई के महीने में उगाई जाती है. जिन्हें सर्दी के मौसम के शुरू होने से पहले काट लिया जाता है. खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों के लिए अंकुरण या बुवाई के वक्त सामान्य तापमान और हवा में नमी की जरूरत होती है. जबकि फसल को पकने के लिए तेज़ धूप और अधिक तापमान की जरूरत होती है. भारत में खरीफ के वक्त उगाई जाने वाली फसलों में धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंग, मूंगफली, उड़द, सन और कपास जैसी फसलें शामिल है. खरीफ के वक्त उगाई जाने वाली ज्यादातर फसलों में सिंचाई की कम और सामान्य जरूरत होती है.

रबी

रबी की फसलें सर्दी के मौसम में उगाई जाती है. इन फसलों को विकास करने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है. जबकि पकने के दौरान इन्हें भी अधिक तापमान और सूर्य के प्रकाश की ज्यादा जरूरत होती है. रबी की ज्यादातर फसलों को अक्टूबर माह के बाद ही उगाया जाता है. रबी के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में गेहूँ, जौ, आलू, तम्‍बाकू, लाही, चना, मसूर, सरसों और मटर जैसी फसलें शामिल हैं. रबी के वक्त उगाई जाने वाली फसलों में सिंचाई की ज्यादा जरूरत होती है.

जायद

जायद के मौसम में उगाई जाने वाली फसलें काफी कम वक्त में पककर तैयार हो जाती हैं. इन फसलों को रबी की फसल कटने के तुरंत बाद मार्च के महीने में उगाया जाता है. और खरीफ की फसलों के उगाने से पहले काट लिया जाता है. जायद के मौसम में उगाई जाने वाली ज्यादातर व्यापारिक लाभ की कद्दू वर्गीय फसलें होती है. जिनमें खरबूजा, खीरा, तरबूज, लौकी, तोरई, मीर्च और टमाटर जैसी फसलें हैं.

समय पर आधारित फसलों के प्रकार

एकवर्षीय फसलें

एकवर्षीय फसल साल में एक बार ही पैदावार दे पाती हैं. जिन्हें रबी और खरीफ के मौसम में उगाया जाता है. एक वर्षीय फसलों में धान, गेहूँ, चना, ढैंचा, आलू, शकरकन्‍द, कद्दू, बाजरा, मूँग, कपास, मूँगफली, सरसों,लौकी और सोयाबीन जैसी फसलें शामिल हैं.

द्विवर्षीय फसलें

द्विवर्षीय फसल वो होती हैं जो साल में दो बार पैदावार देती हैं. इन फसलों को इनकी किस्मों के आधार पर साल में दो बार अलग अलग मौसम में उगाया जा सकता है. द्विवर्षीय फसलों में मुख्य रूप से चुकंदर और प्‍याज को उगाया जाता हैं.

बहुवर्षीय फसलें

बहुवर्षीय फसलें साल में दो से ज्यादा बार पैदावार देने के लिए उगाई जाती है. इन फसलों को एक बार खेत में उगाने के बाद पौधों की बार बार कटाई कर कई बार पैदावार ली जा सकती हैं. जिस कारण किसान भाइयों को कम खर्च में अधिक पैदावार प्राप्त हो जाती है. इस तरह की फसलों में नेपियर घास, नींबू घास और रिजका जैसी फसलें शामिल हैं.

उपयोगिता के आधार पर फसलों के प्रकार

धान्य या अनाज फसलें

इस तरह की ज्यादातर फसलें एकवर्षीय होती हैं. जिनका ज्यादा उपयोग खाने के रूप में होता हैं. इस तरह की फसलों में धान, चना, मक्‍का, ज्‍वार, गेहूँ, जौं और बाजरा जैसी फसलें हैं. जिन्हें रबी और खरीफ मौसम के आधार पर उगाया जाता है.

तिलहनी फसलें

तिलहनी फसलों को व्यापारिक रूप से किसान भाई उगाते हैं. इन फसलों का बाज़ार भाव अच्छा मिलता है. इन फसलों से निकाले गए तेल का इस्तेमाल खाने और व्यापारिक चीजों को बनाने में किया जाता हैं. तिलहन फसलों में सरसों, अरंडी, सूरजमुखी, अलसी, तिल, मूंगफली, सोयाबीन और राई जैसी और भी कई फसलें शामिल हैं.

दलहनी फसलें

दलहनी फसलें

दलहनी फसलें ज्यादातर शुष्क प्रदेशों में उगाई जाती हैं. दलहनी फसलें खेत की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने का काम करती हैं. दलहनी फसलों की खेती मिश्रित खेती के रूप में भी की जा सकती है. जिनमें चना, उड़द,  मसूर, अरहर, मूंगफली, मूंग, मटर और सोयाबीन जैसी फसलें शामिल हैं.

मसाला फसलें

मसाला फसलों की खेती खाने की चीजों को अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए की जाती है. जिनके उत्पादन से किसान भाइयों को अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है. भारत में मसाला फसलों की खेती ज्यादा दक्षिण भारत में की जाती है. जिनमें अदरक, पुदीना, मिर्च, धनिया, अजवाइन, जीरा, सौंफ, लहसुन, हल्‍दी, काली मिर्च, इलायची और तेजपात शामिल हैं.

रेशेदार फसलें

रेशेदार फसलों का इस्तेमाल वस्त्र उद्योग में अधिक होता है. रेशेदार फसलों को बेचने पर भी किसान भाइयों को अधिक लाभ प्राप्त होता है. रेशेदार फसलों में जूट, कपास, सनई और पटसन जैसी और भी कई फसलें शामिल हैं.

हरा चारा फसलें

चारा के रूप में इस्तेमाल होने वाली फसलों की खेती में एक बार बीज की रोपाई करने पर कई बार कटाई की जाती है. हरे चारे की फसल का इस्तेमाल व्यापार के रूप में बाज़ार में बेचकर भी कर सकते हैं. हरे चारे की फसलों में बरसीम, लूसर्न, लोबिया, नेपियर घास और ज्‍वार का इस्तेमाल किया जाता हैं.

बागबानी फसलें

बागबानी फसलों को फल वाली फसलें भी कहा जाता हैं. बागबानी फसलों के पौधे एक बार लगाने के बाद कई सालों तक पैदावार देते हैं. ये फसलें एकवर्षीय होती हैं. जिनमें आम, अमरूद, लिचि, केला, पपीता, सेब, नाशपाती और संतरा जैसी और भी फसलें शामिल हैं.

कंद वर्गीय फसलें

कंद वर्गीय फसलों की खेती मसाले, सब्जी और औषधीय पौधों के रूप में की जाती है. इसके पौधों पर लगने वाले फल जमीन के अंदर पाए जाते हैं. आलू, शकरकंद, अदरक, गाजर, मूली, अरबी, रतालू, टेपियोका, शलजम, हल्‍दी और अदरक जैसी और कई फसलें इस श्रेणी में शामिल हैं.

नशादायक और पेय फसलें

नशादायक फसलों की खेती पेय पदार्थों के रूप में की जाती हैं. जिनका इस्तेमाल नशे के रूप में भी होता है. जिनमें तम्बाकू, डोडा पोस्‍त (अफीम), चाय, कॉफी, धतूरा और भांग शामिल हैं.

औषधीय फसलें

औषधीय फसलें की खेती तीनों मौसम में की जाती है. क्योंकि ज्यादातर औषधीय फसलें पूरे साल उगाने के बाद पैदावार देती हैं. इन फसलों की खेती से किसान भाइयों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है.

अन्य फसलों के प्रकार

नकदी फसलें

नगदी फसलें

नकदी फसलें वो फसल होती है. जिन्हें कटाई या तुड़ाई करने के बाद अधिक दिनों तक भंडारित नही किया जा सकता. नगदी फसलों की खेती से किसान भाइयों की अच्छी खासी कमाई भी होती है. नगदी फसलों में जूट, कॉफी, कोको, गन्ना, टमाटर, केला, संतरा और कपास जैसे कई फसलें शामिल हैं.

अन्तर्वतीय फसलें

अन्तर्वतीय फसलें की खेती मुख्य फसलों के साथ सहायक फसल के रूप में की जाती है. इसके लिए दलहन फसलों का इस्तेमाल ज्यादा किया जाना चाहिए. सहायक फसलों की खेती किसान भाई ज्यादातर बागबानी फसलों में ही करते हैं.

भूमि की उर्वरक क्षमता बढ़ाने वाली फसलें

लगातार एक ही तरह की पैदावार करने से भूमि की उर्वरक क्षमता काफी कम हो जाती है. जिससे भूमि पैदावार देना कम कर देती हैं. इसलिए भूमि की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने के लिए दलहन फसलों को खेतों के उगाना चाहिए.

हरी खाद की फसलें

हरी खाद का इस्तेमाल भी खेत की उर्वरक क्षमता को बढ़ने के लिए किया जाता है. हरी खाद की फसल के लिए पौधों की रोपाई के दो महीने बाद उन्हें काटकर खेत की मिट्टी में मिला दिया जाता हैं. जिससे भूमि की उर्वरक क्षमता बढ़ जाती हैं. हरी खाद के रूप में मूंग, सनई, मोठ, बरसीम, ढैंचा, मसूर और ग्‍वार को खेत में उगाया जाता है.

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