नारियल की उन्नत खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!!

नारियल का पेड़ सबसे लम्बे टाइम तक फल देने वाला पौधा है. इसका पौधा 80 साल का होने के बाद भी हरा भरा रहता है. नारियल के फल हिन्दू धर्म के धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग लिए जाते हैं. नारियल के पौधे को स्वर्ग का पौधा भी कहते हैं. नारियल के पौधे की लम्बाई 10 मीटर से भी ज्यादा हो सकती है. इसका तना पत्ती और शाखा रहित होता है.

नारियल पर लगने वाले फलों का इस्तेमाल कई जगहों पर होता है. कच्चे नारियल का इस्तेमाल नारियल के पानी के रूप में होता है. और कच्चे नारियल के गुदें को खाया जाता है. जब नारियल का फल पक जाता है तो उससे तेल निकाला जाता है. इसके तेल का खाने से लेकर शरीर पर लगाने और दवाइयों में इस्तेमाल होता है. नारियल की जूट को जलाकर उसे गर्म पानी में मिलाकर बुखार वाले रोगी को पिलाने से उसकी प्यास खत्म हो जाती है.

नारियल का इस्तेमाल जलन, डायरिया, सर्दी जुकाम जैसी कई बीमारियों में लाभदायक होता है. नारियल के अंदर जिंक की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती है. जिस कारण इसके इस्तेमाल से इंसान को मोटापे की बीमारी से छुटकारा मिलता है. नारियल का इस्तेमाल त्वचा संबंधित रोगों में भी किया जाता है.

नारियल की खेती समुद्र किनारे की जाती है. इसके अलावा नमकीन मिट्टी वाली जगहों पर भी इसकी खेती की जा सकती है. नारियल की खेती के लिए उष्ण और उपोष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नही होती. भारत में इसकी खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और समुद्र तटीय इलाकों में की जाती है.

अगर आप नारियल की खेती करना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

नारियल की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है. बलुई दोमट मिट्टी के अलावा नारियल की खेती अच्छी जल धारण और जल निकासी वाली जमीन में आसानी से हो सकती है. लेकिन मिट्टी के तुरंत नीचे कोई चट्टान नही होनी चाहिए. काली और पथरीली जमीन में इसकी खेती नही की जा सकती. क्योंकि नारियल की जड़ें लम्बाई में जाती हैं. जबकि काली और पथरीली जमीन कठोर होती है. जिससे जड़े आसानी से जमीन में अंदर तक नही जा पाती हैं. नारियल की खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 5.2 से 8.8 तक होना चाहिए.

 जलवायु और तापमान

नारियल की खेती के लिए उष्ण और उपोष्ण जलवायु की जरूरत होती है. इसकी खेती के लिए हवा की सापेक्ष आर्द्रता ज्यादा जरूरी होती है. नारियल की खेती के लिए हवा की न्यूनतम सापेक्ष आर्द्रता 60 प्रतिशत तक होना जरूरी है. क्योंकि इससे कम सापेक्ष आर्द्रता होने पर इसके फलों में गुणवत्ता की कमी देखने को मिलती है. नारियल के फलों को पकने के लिए उचित गर्म मौसम की जरूरत होती है.

नारियल की खेती के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. सामान्य तापमान पर पौधे पर फल अधिक मात्रा में आते हैं. और फलों की गुणवत्ता भी काफी अच्छी होती हैं. नारियल की खेती उस जगह भी की जा सकती हैं जहां तापमान सर्दियों में न्यूनतम 10 डिग्री और गर्मियों में अधिकतम 40 डिग्री ज्यादा दिनों तक न रहता हो.

नारियल की किस्में

नारियल की मुख्य रूप से दो ही प्रजातियां हैं. लेकिन अब संकरण के माध्यम से तीसरी प्रजाति भी विकसित कर ली गई है.

लम्बी प्रजाति

लम्बी प्रजाति का नारियल

लम्बी प्रजाति के नारियल गैर-परम्परागत क्षेत्रों में आसानी से उगाये जा सकते हैं. इस प्रजाति के पौधे आकार में बड़े होते हैं. इनकी उम्र भी अन्य प्रजातियों से ज्यादा पाई जाती है. इसके पौधों को कम पानी की जरूरत होती है. इनकी खेती मुख्य रूप से पश्चिम तटीय और तटीय जगहों पर की जाती है. इनमें कपाडम, वेस्ट कोस्ट टाँल, लक्षद्वीप माइक्रो,रंगून, कावेरी, अंडमान ज्वॉइन्ट,लक्षद्वीप ऑर्डिनरी,लक्षद्वीप मीडियम, कैतताली, गंगाभवानी, कोचीन चाइना, जावा स्याम, फिजी घई और तेगाई किस्में शामिल हैं.

बौनी प्रजाति

इस प्रजाति के पौधे आकार में छोटे होते हैं. इनकी उम्र लम्बी प्रजाति के नारियलों की अपेक्षा कम पाई जाती है. इस प्रजाति की किस्मों की खेती गैर-परम्परागत क्षेत्रों में नही की जा सकती. इसके पौधे को पानी ज्यादा जरूरत होती है. गैर-परम्परागत क्षेत्रों में इसकी पैदावार बहुत कम होती है. और इन क्षेत्रों में इसके पौधे को देखभाल की ज्यादा जरूरत होती है. इस प्रजाति की मुख्य किस्में ड्वार्फ- ग्रीन,लक्षद्वीप स्मॉल, मालद्वीप ड्वार्फ, फिलीपीन ड्वार्फ, लक्षद्वीप ड्वार्फ, चावट ड्वार्फ, चेन्थेंगू और अंडमान ड्वार् हैं.

संकर प्रजाति

इस प्रजाति को लम्बी और बौनी प्रजाति के संकरण से तैयार किया गया है. इस प्रजाति की किस्मों को खासकर अलग अलग जलवायु वाले क्षेत्रों में उगाने के लिए तैयार किया गया है. केरल कृषि विश्वविद्यालय और तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय द्वारा 10 प्रकार की संकर किस्मों को तैयार किया गया है. इस प्रजाति के पौधे को ज्यादा पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. अच्छी देखभाल कर इस प्रजाति के पौधे से ज्यादा मात्रा में पैदावार ली जा सकती है.

खेत की जुताई

नारियल के पौधों को खेत में लगाने के लिए पहले खेत की अच्छे से जुताई कर उसे तैयार किया जाता है. जुताई करने के बाद खेत को समतल बना दें ताकि खेत में बारिश के मौसम में जलभराव वाली समस्या का सामना ना करना पड़ें. उसके बाद खेत में 20 से 25 फिट की दूरी रखते हुए एक मीटर लम्बे, चौड़े और गहरे गड्डे बना दें. सभी गड्डों को खेत में पंक्तियों में ही बनाए. पंक्तियों के बीच भी 20 से 25 फिट की दूरी होनी चाहिए.

पेड़ लगाने का टाइम और तरीका

नारियल के पौधे को गड्डे में लगाने का सबसे उपयुक्त टाइम जून से सितम्बर का है. जबकि इस दौरान भारी बारिश हो तो इसका रोपण नही करना चाहिए. क्योंकि भारी बारिश के टाइम इसका रोपण करने से पौधे के नष्ट होने की समस्या ज्यादा होती है. जबकि जहाँ पानी की उचित व्यवस्था हो वहां इसका रोपण बारिश के मौसम से एक महीने पहले कर सकते हैं. वो जगह जहाँ बारिश के मौसम में बाढ़ आने की संभावना ज्यादा होती हैं वहां इसके पौधों का रोपण बारिश के मौसम के बाद करना सबसे उपयुक्त होता है.

नारियल का पौधा

नारियल के पौधे को गड्डों में लगाने से पहले गड्डों में उचित मात्रा में गोबर की पुरानी खाद या कपोस्ट डालकर उसने कुछ दिन के लिए खुला छोड़ दें. उसके बाद उसमें हलकी मिट्टी डालकर मिक्स कर दें. जब ये मिटटी और गोबर का खाद अच्छे से जमकर कठोर हो जाएँ तब गड्डों के बीच में खुरपे की सहायता एक गड्डा तैयार करें. जिसमें नारियल के पौधे का बीज आसानी से आ सके.

बीज को गड्डे में लगाने के बाद उसमें मिट्टी डालकर उसे चारों तरफ से दबा दें. मिट्टी को दबाते टाइम ध्यान रखे की पौधे का बीज दो से तीन सेंटीमीटर बाहर दिखाई देना चाहिए. पौधे को गड्डे में लगाने के बाद गड्डे से बाहर निकाली गई मिट्टी से गड्डे के चारों तरफ कुछ दूरी बनाते हुए एक घेरा बना दें. इसकी मिट्टी को अच्छी तरह दबा दें ताकि ज्यादा बारिश के होने पर गड्डों में खेत के पानी का भराव ना हो पाए. क्योंकि गड्डों में पानी भराव होने की वजह से पौधा जल्दी खराब हो जाता है.

नारियल के पौधे को खेत में लगाने के दौरान खेत में सफ़ेद चिटी का प्रकोप दिखाई दें तो छोटे वाले गड्डे में बीज को लगाने से पहले सेविडोल 8जी की 5 ग्राम मात्रा डालकर मिट्टी को उपचारित कर लें. ऐसा करने से पौधे को सफ़ेद चीटियों के प्रकोप से बचाया जा सकता है.

जिस जगह की मिट्टी मखरली हो तो उसमें पौधे को लगाने से पहले लगभग 2 किलो नमक डालकर उपचारित कर लेना चाहिए. उसके बाद पौधे को गड्डे में लगाना चाहिए. इसके अलावा गड्डें में 20 से 25 नारियल के छिलके डालना भी अच्छा होता है. इससे पौधे के पास नमी की मात्रा बनी रहती है.

पौधे की देखरेख और सिंचाई

पौधे को खेत में लगाने के बाद लगभग तीन से चार साल पौधे की अच्छे से देखभाल करने की जरूरत होती है. इस दौरान पौधे को ज्यादा सर्दी और ज्यादा गर्मी से बचाकर रखा जाता है. नारियल के पौधे को शुरुआत में वृद्धि करने के लिए उचित मात्रा में हवा की जरूरत होती है. इसके लिए जड़ों के पास बचाए गए तीन से चार सेंटीमीटर वाले भाग को दो से तीन साल तक मिट्टी से नही ढकना चाहिए.

नारियल के पौधे की लम्बी और संकर प्रजाति को ज्यादा पानी की जरूरत नही होती. जबकि बौनी प्रजाति को ज्यादा पानी की जरूरत होती है. गैर-परम्परागत क्षेत्रों में सिर्फ लम्बी और संकर प्रजाति के पौधों को ही लगाया जा सकता है. इस प्रजाति के पौधों को अगर बारिश के मौसम में खेत में लगाया जाता है तो इनकी शुरूआती सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन अगर इसके पौधे को बारिश के मौसम से पहले या बाद में लगाया जाता है तो इनकी सिंचाई तुरंत कर देनी चाहिए. उसके बाद नमी बनाए रखने के लिए उचित टाइम पर पौधे की सिंचाई करते रहना चाहिए.

नारियल के पौधों की सिंचाई के लिए ड्रिप विधि सबसे अच्छी और उपयुक्त होती है. क्योंकि ड्रिप सिंचाई विधि के माध्यम से पौधे को उचित मात्रा में पानी मिलता रहता है. जिससे पौधा अच्छे से विकास करता है और पैदावार में भी फर्क देखने को मिलता है. गर्मी के मौसम में पौधे को तीन दिन के अंतराल में ज़रुर पानी देना चाहिए. जबकि सर्दी के मौसम में सप्ताह में इसकी एक सिंचाई काफी होती है.

उर्वरक की मात्रा

नारियल की खेती के लिए मिट्टी में उर्वरक की मात्रा उचित होनी चाहिए. नारियल के पौधों को गड्डों में लगाने से पहले उसमें 20 से 25 किलो गोबर की पुरानी खाद और 1:2:2 के अनुपात में एन.पी.के. की आधा किलो मात्रा गड्डों में देनी चाहिए. एन.पी.के. की इस आधा किलो मात्रा को साल में तीन बार पौधे को देनी चाहिए. उसके बाद पौधे की उम्र बढ़ने के साथ साथ उर्वरक की मात्रा को भी बढ़ा देना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

नारियल के पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए नीलाई गुड़ाई करना जरूरी होता है. क्योंकि नीलाई गुड़ाई करने से पौधे की जड़ों में हवा का अच्छे से संचार होता है. जिस कारण पौधे अच्छे से विकास करते हैं और पैदावार भी अच्छी होती है. नारियल के पौधे की साल में तीन से चार नीलाई गुड़ाई जरुर कर देनी चाहिए. और बाकी बची हुई जमीन की बारिश के बाद जुताई कर देनी चाहिए.

उपरी कमाई

नारियल का पौधा लगभग 5 से 8 साल बाद पैदावार देना शुरू करता है. इस दौरान किसान भाई बाकी बची हुई जगह पर दलहन और मसाला फसल की खेती कर सकता है. जिससे उन्हें खेत से उपज भी मिलती रहेगी. और आर्थिक परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ेगा.

पौधे में लगने वाले रोग

रोग लगा पौधा

नारियल के पौधे में कई तरह के रोग लगते हैं. जो मौसम के बदलने और कीटों के आक्रमण की वजह से लगते हैं. जिनकी रोकथाम करना जरूरी होता है.

गैंडा भृंग

पौधों में ये रोग राइनोसोरस बीटल नामक कीट की वजह से लगता है. इस रोग में कीट पौधे की नई पत्तियों को खा जाता है. जिससे कोपल के पूरी तरह से खिलने के बाद उसकी पत्तियां कटी हुई दिखाई देती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे की नई शाखाओं से इस कीट को बहार निकाल देना चाहिए. इसके अलावा सेविडॉल 8 जी की 25 ग्राम मात्रा को 200 ग्राम बालू रेत में मिलकर शुरूआती तीन पत्तियों की कोपल में भर देना चाहिए.

कोकोनट माइट

नारियल के पौधे पर ये रोग फलों के लगने के टाइम दिखाई देता है. इस रोग के लगने पर फलों का रंग और आकार दोनों बदल जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर नीमाजोल का छिडकाव करना चाहिए.

कोरिड बग

पौधों पर ये रोग फूल आने के दौरान दिखाई देता है. इस रोग के लगने पर पौधे के मादा फूल अच्छे से विकसित नही होते. इससे फल और फूल दोनों ख़राब होने लगते हैं. कभी कभी तो इस रोग के प्रभाव की वजह से फलों के पूरे बड़े होने के बाद उनमें पानी और नारियल गिरी नही बनती. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे में निषेचन की क्रिया के पूर्ण होने तक कार्बरिल या एंडोसल्फान का छिडकाव करना चाहिए.

रेड पाम वीविल

पौधों पर ये रोग कीट की वजह से लगता है. इसके कीट पौधे के तने पर छिद्र बना देते हैं. जिनसे चिपचिपा पदार्थ बाहर निकलने लगता है. जो तने के रसे होते हैं. जिन्हें ये कीट खाकर बाहर निकाल देते हैं. इसके लगने पर पौधा जल्द हो सुखकर नष्ट हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए तने पर दिखाई देनें वाले छिद्रों में सेल्फोस की गोली का चूर्ण या कैरोसिन से भीगी हुई रुई भर देनी चाहिए. इसके अलावा पौधे के तने पर एंडोसल्फान या कार्बोरिल की उचित मात्रा का इंजेक्शन लगा देना चाहिए.

फल सड़न

फल सड़न रोग की वजह से पैदावार पर फर्क देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर फल के डंठल सड़ने लगते हैं. इसके प्रभाव से नए बने फल ज्यादा प्रभावित होते हैं. इसके लगने पर जल्द ही फल सड़कर खराब हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए बोर्डो मिश्रण या फाइटोलॉन का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए. इसका छिडकाव वर्षा ऋतू से पहले और बाद में दो बार करना चाहिए.

क्राउन चोकिंग

पौधों पर ये रोग शुरूआती अवस्था में देखने को ज्यादा मिलता है. इस रोग के लग जाने पर पौधे का विकास रुक जाता है. पौधे की पत्तियों का आकार बदलने लगता है. धीरे धीरे पातियाँ खिलाना बंद कर देती हैं. जिससे पौधा एक लकड़ी के डंडे की तरह दिखाई देने लगता है. पौधे पर ये रोग पौषक तत्व की कमी की वजह से होता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे को उचित मात्रा में उर्वरक देने चाहिए. इस रोग में ज्यादातर मिट्टी में बोरॉन की कमी ज्यादा हो जाती है. इसलिए पौधे को साल में 50 ग्राम बोरॉक्स देना चाहिए.

कली सड़न

रोग लगा पौधा

पौधों पर कलि सड़न का रोग सबसे खतरनाक होता है. इसके लगने पर पौधा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है. इस रोग के लगने पर पौधे की कलियाँ मुरझाने लगती हैं. सही समय पर इसकी रोकथाम नही की जाए तो ये रोग पौधे के शीर्ष भाग तक पहुँच जाता है. और शीर्ष भाग को गलाकर पौधे को पूरी तरह नष्ट कर देता है. इस रोग के लगने पर पौधों से सड़े हुए अंडे की जैसे बदबू आने लगती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर बोर्डो मिश्रण का छिडकाव सप्ताह में दो से तीन बार करना चाहिए. इसके अलावा शुरुआत में पता लगने पर पौधे की नई कलियों पर बोर्डोपेस्ट का लेप कर देना चाहिए.

फलों की तुड़ाई

नारियल के फलों की तुड़ाई करना सबसे कठिन काम होता है. इसके लिए पौधे के शिखर तक चढ़ना पड़ता है. नारियल के फल को पूरी तरह तैयार होने में 15 महीने से ज्यादा का टाइम लगता है. लेकिन इससे पहले भी इनकी तुड़ाई की जाती है. जब नारियल हरे रंग का होता है तब इसकी तुड़ाई नारियल पानी के लिए की जाती है. नारियल पूरी तरह पकने के बाद पीला दिखाई देने लगता है. नारियल को अच्छे से पकने के बाद ही तोडना सही होता है. पूरी तरह से पकने के बाद नारियल में रेशे और तेल पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.

पैदावार और लाभ

नारियल की अलग अलग किस्मों की अलग अलग पैदावार होती है. जिसमें बौनी प्रजाति के पौधे ज्यादा उत्पादन देते हैं. क्योंकि इस पर फल 3 साल बाद ही लगने शुरू हो जाते हैं. जबकि बाकी प्रजातियों पर 8 साल तक फल लगने शुरू होते हैं. अलग अलग प्रजातियों की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 50 क्विंटल से ज्यादा होती है. जिसका बाज़ार भाव इनकी गुणवत्ता के आधार पर अलग अलग होता है. जिससे किसान भाइयों की अच्छी कमाई हो जाती है.

2 thoughts on “नारियल की उन्नत खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!!”

  1. छोटे छोटे गोटी के आकार के नारियल लगते है फिर टूट कर गिर जातें है ।क्या किया जाए ।

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