मसाले

जीरे की उन्नत खेती कैसे करें – पूरी जानकारी

जीरे की खेती मसाला फसल के रूप में की जाती है. जीरा का आकार सौंफ की तरह ही दिखाई देता है. जीरा का इस्तेमाल कई तरह के व्यंजनों को खुशबूदार बनाने के लिए किया जाता है. खाने में इसका इस्तेमाल कई रूपों में किया जाता है. जिसमें लोग इसका इस्तेमाल पाउडर के रूप में और भूनकर खाने में करते हैं. खाने के अलावा इसका इस्तेमाल कई तरह की पेट संबंधित बीमारियों में भी किया जाता है.

जीरा की खेती

जीरा के पौधों के लिए शुष्क जलवायु की जरूरत होती है. इसके पौधे को बारिश की सामान्य जरूरत होती है. लेकिन फसल के पकने के दौरान बारिश होने से इसकी पैदावार को नुक्सान पहुँचता है. इसके पौधे को विकास करने से लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. भारत में इसकी सबसे ज्यादा खेती राजस्थान और गुजरात में की जाती है. आज राजस्थान और गुजरात के किसान भाई इसकी खेती से भारी मुनाफा कमा रहे हैं.

अगर आप भी जीरा की खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

जीरा की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक उत्पादन लेने के लिए इसे बलुई दोमट मिट्टी में उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. जलभराव और पथरीली जमीन में इसकी खेती नही की जानी चाहिए.

जलवायु और तापमान

जीरा की खेती रबी की फसलों के साथ की जाती है. क्योंकि इसके पौधे सर्दी के मौसम से अच्छे से विकास करते हैं. इसके पौधे अधिक तेज़ गर्मी को सहन नही कर पाते. इसके पौधों को बारिश की काफी कम जरूरत होती है. पौधों पर दाने बनने के दौरान होने वाली बारिश इसके लिए नुकसानदायक होती है. क्योंकि इस दौरान बारिश होने से इसके पौधों में झुलसा रोग लग जाता है.

जीरा के पौधों को विभिन्न अवस्थाओं में अलग अलग तापक्रम की जरूरत होती है. बीजों की रोपाई के दौरान शुरुआत में इसके पौधों को 25 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. उसके बाद इसके पौधों को विकास करने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. और पौधों पर पुष्प छत्रक की पकाई के दौरान इसके पौधों को 25 से 30 डिग्री के बीच तापमान की जरूरत होती है.

उन्नत किस्में

जीरे की कई सारी उन्नत किस्में मौजूद है. जिन्हें अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है.

आर. जेड. 19

जीरा की इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 10 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों को उख्टा और झुलसा रोग नही लगता. इसके दाने आकर्षक और गहरे भूरे रंग के होते हैं.

जी. सी. 4

जीरे की इस किस्म को गुजराती 4 के नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 105 से 110 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई वाले होते हैं. और इसके दानो का रंग गहरा भूरा और चमकीला दिखाई देता है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 8 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

आर. जेड. 223

जीरा की उन्नत खेती

जीरा की इस किस्म का पौधा 120 से 130 दिन में पककर तैयार हो जाता है. इस किस्म के पौधों पर उख्टा और झुलसा रोग देखने को नही लगता. इसके दानो का रंग हल्का भूरा दिखाई देता है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 से 7 क्विंटल तक पाया जाता है. इसके दानो में तेल की मात्रा 2.3 प्रतिशत तक पाई जाती है.

आर. एस. 1

जीरा की ये एक जल्दी पककर तैयार होने वाली किस्म है. इस किस्म के बीज रोयेदार और बड़े आकार के होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 से 10 क्विंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के पौधे 5 फिट के आसपास लम्बाई के पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 90 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं.

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जीरा की इस किस्म के पौधे सामान्य लम्बाई के पाए जाते है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 8 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर बनने वाले दानो का आकार मोटा होता है. इस किस्म के पौधों पर छाछया रोग देखने को नही मिलता. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 से 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं.

जी.सी. 1

जीरा की इस किस्म को गुजरात कृषि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 110 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 7 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में उख्टा रोग सहने की क्षमता ज्यादा पाई जाती है.

खेत की तैयारी

जीरा की खेती के लिए शुरुआत में खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हलों से कर दें. उसके बाद कुछ दिन तक खेत को खुला छोड़ दें. खेत को खुला छोड़ने के बाद उसमे उचित मात्रा में जैविक खाद के रूप में गोबर की खाद डाल दे. उसके बाद खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दें. खेत की जुताई के कुछ दिन बाद उसमें रोटावेटर चला दें. ताकि खेत में मौजूद मिट्टी के ढेले ख़त्म हो जाएँ. रोटावेटर चलाने के बाद खेत में पाटा चलाकर खेत को समतल बना दें.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

जीरा के बीजों की रोपाई समतल भूमि में छिडकाव और ड्रिल के माध्यम से की जाती है. छिडकाव विधि में इसके बीजों की रोपाई क्यारी बनाकर की जाती है. इसलिए इसके बीजों की रोपाई से पहले खेत में 3 गुना 5 फिट की क्यारी तैयार कर लें. उसके बाद तैयार की गई क्यारियों में किसान भाई बीजों को छिड़क कर उसे हाथ या दंताली से मिट्टी में मिला देते हैं. जिससे बीज मिट्टी में एक से डेढ़ सेंटीमीटर नीचे चला जाता है. इसके बीजों की जमीन में सिर्फ एक से डेढ़ सेंटीमीटर नीचे ही उगाना चाहिए. इससे ज्यादा नीचे उगाने से अंकुरण प्रभावित होता है. ड्रिल के माध्यम से इसके बीजों की रोपाई पंक्तियों में की जाती है. पंक्तियों में रोपाई के दौरान प्रत्येक पंक्तियों के बीच लगभग एक फिट की दूरी होनी चाहिए. और पंक्तियों में इसके बीजों के बीच लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी उपयुक्त होती है.

रोपाई का तरीका

इसके बीजों को खेत में लगाने से पहले उन्हें उपचारित कर लेना चाहिए. बीज को उपचारित करने के लिए कार्बनडाजिम की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए. एक हेक्टेयर में ड्रिल के माध्यम से बीज रोपाई के लिए 8 से 10 किलो बीज की जरूरत होती है. जबकि छिडकाव विधि से रोपाई के लिए लगभग 12 किलो के आसपास बीज की जरूरत होती है.

जीरे की खेती रबी की फसलों के साथ की जाती है. इस दौरान इसकी खेती के लिए इसके बीजों की रोपाई नवम्बर माह के आखिरी तक कर देनी चाहिए. इससे अधिक देरी से रोपाई करने पर इसका अकुरण और पैदावार दोनों ही प्रभावित होते हैं.

पौधों की सिंचाई

जीरा के बीजों की रोपाई सूखी हुई जमीन में की जाती है. इसलिए बीज की रोपाई के तुरंत बाद खेत में पानी दे देना चाहिए. इसके पौधों की पहली सिंचाई पानी के धीमे बहाव में करनी चाहिए. क्योंकि तेज़ बहाव में सिंचाई करने पर बीज बहकर किनारों पर चला जाता है. जीरा के बीजों की पहली सिंचाई के बाद बाकी की सिंचाई 10 से 12 दिन के अंतराल में की जानी चाहिए. इसके पौधों को पककर तैयार होने में पांच से सात सिंचाई की जरूरत होती है. लेकिन जब पौधों पर बीज बन रहे हों तब उनकी सिंचाई नही करनी चाहिए. क्योंकि इस दौरान सिंचाई करने से इसके दाने कमजोर पड़ जाते हैं.

उर्वरक की मात्रा

जीरे की खेती के लिए उर्वरक की जरूरत सामान्य रूप से बाकी मसाला फसलों की तरह ही होती है. इसकी खेती के लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त 10 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को जुताई के साथ खेत में डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें. उसके बाद खेत की आखिरी जुताई के वक्त 65 किलो डी.ए.पी. और 9 किलो यूरिया प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में छिड़क दें. इससे अलावा पौधों की सिंचाई के वक्त पौधों के विकास के दौरान 20 से 25 किलो यूरिया की मात्रा को तीसरी सिंचाई के वक्त पौधों में देना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

जीरे की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीकों से किया जा सकता है. रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए आक्साडायर्जिल की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर बीज रोपाई के तुरंत बाद छिडक देना चाहिए. जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण पौधों की नीलाई गुड़ाई कर किया जाता है. इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 20 दिन बाद कर देनी चाहिए. पहली गुड़ाई के बाद बाकी की गुड़ाई, 15 दिन के अंतराल में करनी चाहिए. इसके पौधों की दो से तीन गुड़ाई करना अच्छा होता है.

पौधों को लगने वाला रोग और उसकी रोकथाम

जीरे के पौधों में कई तरह के जीवाणु और कीट जनित रोग देखने को मिलते हैं. जिनका अगर टाइम रहते नियंत्रण ना किया जाए तो पैदावार को बहुत ज्यादा नुक्सान पहुँचता है.

मोयला

जीरा के पौधों पर लगने वाला ये रोग एक कीट जनित रोग है. इस रोग के कीट इसके पौधों के कोमल भागों का रस चूसकर उन्हें काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाते है. इस रोग का प्रकोप पौधों पर फूल बनने के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधा जल्दी ही सूखकर नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मैलाथियान या डाईमेथोएट की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

छाछया रोग

जीरा के पौधों में छाछया रोग फफूंदी की वजह से देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पदार्थ दिखाई देने लगता है. रोग बढ़ने की स्थिति में सम्पूर्ण पत्तियां सफ़ेद दिखाई देने लगती है. जिसकी वजह से पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नही कर पाता और पौधे का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक या कैराथेन की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

झुलसा रोग

रोग लगा पौधा

इस रोग को ब्लाईट के नाम से जाना जाता है. पौधों पर यह रोग बारिश के वक्त या आकाश में बादल छाए रहने के कारण लगता है. इस रोग के लगने पर पौधे के शीर्ष भाग झुके हुए दिखाई देते हैं. इसके अलावा पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. पौधों पर इस रोग के लगने पर मैनकोजेब या डाईफनोकोना जोल की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा बीजों की रोपाई के वक्त उन्हें मैनकोजेब से उपचारित कर लेना चाहिए.

विल्ट

पौधों पर यह रोग किसी भी अवस्था में देखने को मिल सकता है. लेकिन पौधों के अंकुरण के साथ इस रोग का प्रभाव काफी ज्यादा देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर सम्पूर्ण पौधा विकास करना बंद कर देता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बन्डाजिम की उचित मात्रा का छिडकाव करते रहना चाहिए.

दीमक का रोग

पौधों पर दीमक रोग का प्रभाव शुरुआत से लेकर पौधों की कटाई तक कभी भी देखने को मिल सकता है. दीमक पौधे की जड़ों को काटकर पौधों को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाती हैं. जिससे पौधा बहुत जल्द नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए बीजों की रोपाई से पहले उन्हें क्लोरोपाइरीफॉस या क्यूनालफॉस की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए. और खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर पौधों की जड़ों के पास क्लोरोपाइरीफॉस की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

पौधों की कटाई

जीरा के पौधे बिज़ रोपाई के लगभग 100 से 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस दौरान इसके बीजों का रंग हल्का भूरा दिखाई देने लगता है. इसके पुष्प छत्रक को काटकर खेत में एकत्रित कर सुखा लें. पुष्प छत्रक के सुख जाने के बाद इसके दानों को पुष्प छत्रक से मशीनों की सहायता से निकाल लिया जाता है.

पैदावार और लाभ

जीरा की विभिन्न किस्मों के पौधों की औसतन पैदावार 7 से 8 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. जीरा का बाज़ार भाव 100 रुपये प्रति किलो के आसपास पाया जाता है. जिससे किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से 40 से 50 हज़ार तक की कमाई आसानी से कर लेता है.

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