सब्ज़ी

कद्दू की खेती कैसे करें – Pumpkin Farming information

कद्दू की खेती लतादार सब्जी वाली फसलों की तरह ही नगदी फसल के रूप में की जाती है. इसके पौधे पर पीले रंग के फूल खिलते हैं. जिसकी पतीयों का आकार काफी बड़ा होता है. कद्दू को मटर की तरह ही द्विबीजपत्री पौधों की श्रेणी में रखा गया है. कद्दू की खेती मुख्य रूप से सब्जी के लिए ही की जाती है. इसका फल वजन में भारी होता है, जो एक हरे रंग के कमजोर तने से लगा होता है. कद्दू का इस्तेमाल सब्जी के अलावा कई तरह से खाने में किया जाता है.

कद्दू की खेती

कद्दू की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि अच्छी होती है. कद्दू की खेती के लिए गर्म और आद्र दोनों ही जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों को पानी की जरूरत होती है. भारत में अलग अलग जगहों पर इसकी खेती लगभग पूरे साल की जा सकती है. इसके पौधे भी एक साल तक पैदावार दे सकते हैं. इसके फलों को काफी टाइम तक संग्रहित कर रखा जा सकता है.

अगर आप भी कद्दू की खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

कद्दू की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. कम समय तक जल भराव वाली भूमि में इसकी खेती की जा सकती है. जबकि अधिक समय तक जल भराव रहने वाली भूमि में इसकी खेती नही करनी चाहिए. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 5 से 7 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

कद्दू की खेती के लिए शीतोष्ण और समशीतोष्ण दोनों ही जलवायु उपयुक्त होती है. भारत में इसकी खेती ज्यादातर बारिश के मौसम के दौरान की जाती है. इसके पौधे सर्दी के मौसम को सहन नही कर पाते. सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसके लिए नुकसानदायक होता है. जबकि गर्मी के मौसम में ये आसानी से विकास कर लेते हैं. इसके पौधों को बारिश की सामान्य जरूरत होती है. पौधों पर फूल बनने के दौरान होने वाली बारिश इसके लिए उपयोगी नही होती. इस दौरान बारिश होने से फूल खराब हो जाते हैं.

कद्दू की खेती के लिए शुरुआत में बीजों के अंकुरण के वक्त लगभग 20 डिग्री के आसपास तापमान उपयुक्त होता है. जबकि पौधों के विकास और फलों की बढ़वार के वक्त तापमान 25 से 30 डिग्री के बीच होना चाहिए.

उन्नत किस्में

कद्दू कई उन्नत किस्में हैं. जिन्हें उनकी रोपाई के वक्त और उत्पादन क्षमता के आधार पर तैयार किया गया है.

पूसा विश्वास

कद्दू की इस किस्म को उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में उगाया जाता है. इसके एक फल का वजन 5 किलो के आसपास पाया जाता है. जबकि इसका कुल उत्पादन 400 किवंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास होता है. इसके फलों का रंग हरा दिखाई देता है. जिन पर सफ़ेद रंग के धब्बे बने होते हैं. इस किस्म के पौधों पर फल बीज रोपाई के 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं.

काशी उज्जवल

कद्दू की इस किस्म को उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों जगहों पर उगाया जाता है. इसके एक पौधे पर चार से पांच फल लगते हैं. इसके एक फल का वजन 10 से 15 किलो के बीच पाया जाता है. और इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 550 किवंटल के आसपास पाया जाता है. इसके फलों को सामान्य तापमान पर छायादार जगहों में 6 महीने तक भंडारित किया जा सकता है.

डी.ए.जी.एच. 16

कद्दू की इस किस्म का पौधा बीज रोपाई के 110 दिन बाद पककर तैयार हो जाता हैं. इसके फलों का बाहरी रंग हरा और सफ़ेद दिखाई देता हैं. और अंदर से इसका गुदा सफ़ेद रंग का होता है. इसके एक पौधे पर 4 या 5 फल आते हैं. जिसका वजन 12 किलो के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 450 से 500 किवंटल के बीच पाया जाता है.

पूसा विकास

कद्दू की इस किस्म के पौधे बारिश के मौसम में उगाये जाते हैं. इस किस्म के पौधों की लम्बाई दो से तीन मीटर के बीच पाई जाती है. इसके फल कच्चे रूप में सब्जी में ज्यादा उपयोग में लिए जाते हैं. इसका फल छोटे आकार का होता है. जिनका वजन दो किलो के आसपास पाया जाता है. एक हेक्टेयर के इसका उत्पादन 300 किवंटल से ज्यादा पाया जाता है.

काशी धवल

उन्नत किस्म

कद्दू की इस किस्म को पर्वतीय जगहों पर उगाने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 100 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके फलों का गुदा सफ़ेद रंग का दिखाई देता है. इस किस्म के एक फल का वजन 12 किलो के आसपास पाया जाता है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 600 किवंटल के आसपास पाया जाता है. इसके फलों को सामान्य तापमान पर पांच महीने से ज्यादा टाइम तक संग्रहित कर सकते हैं.

पूसा हाईब्रिड 1

कद्दू की ये एक संकर किस्म है. जिसको बसन्त ऋतू में उगाने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधों पर लगने वाले फलों का रंग पीला दिखाई देता है. जिनका आकार गोल और चपटा दिखाई देता है. इस किस्म के एक फल का वजन 5 किलो के आसपास पाया जाता है. जिनका प्रति हेक्टेयर कुल उत्पादन 520 किवंटल के आसपास पाया जाता है.

इनके अलावा और भी कई उन्नत किस्में है. जिन्हें अलग अलग जगहों पर अच्छे उत्पादन के लिए लगाया जाता है.

खेत की तैयरी

कद्दू की खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा और हवा युक्त होना जरूरी होता है. इसके लिए शुरुआत में खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद मिट्टी को तेज धूप लगने के लिए कुछ दिनों तक खुला छोड़ दें. खेत को खुला छोड़ने के बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पाटा लगाकर उसे समतल बना लें. कद्दू की खेती समतल भूमि में की जाती है. इस कारण खेत को समतल बनाने के बाद उसमें उचित दूरी पर धोरेनुमा क्यारियाँ बनाकर तैयार कर लें.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

कद्दू के बीजों को खेत में लगाने से पहले उन्हें उपचारित कर लेना चाहिए. बीजों को उपचारित करने के लिए थीरम या बाविस्टीन की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए. एक हेक्टेयर भूमि में खेती के लिए तीन से चार किलो बीज काफी होता है.

कद्दू का पौधा

कद्दू के बीजों की रोपाई किसान भाई हाथों से करते हैं. इसके बीजों की रोपाई खेत में तैयार की गई धोरेनुमा क्यारियों में की जाती है. इन धोरेनुमा क्यारियों के बीच चार से 5 मीटर की दूरी होनी चाहिए. इसके बीजों की रोपाई के दौरान बीजों को क्यारियों की मेड़ पर अंदर की तरफ लगाते हैं. मेड पर इसके बीजों की रोपाई एक से डेढ़ फिट की दूरी रखते हुए की जाती है. ताकि पौधे के विकास करने के दौरान पौधे की बेल आसानी से फैल सके.

कद्दू के बीजों की रोपाई अलग अलग मौसम के आधार पर की जाती है. सिंचाई और पर्वतीय भू-भाग वाली जगहों पर इसे मार्च या अप्रैल माह में लगा सकते हैं. इसके अलावा बिना सिंचाई वाली जगहों पर इसे बारिश के मौसम में जून के महीने में उगाया जाता है. जबकि दक्षिणी भारत की कुछ जगहों पर इसे अगस्त माह तक उगाते हैं.

पौधों की सिंचाई

कद्दू के पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत बीजों के अंकुरित होने और पौधों पर लगे फलों के विकास करने के दौरान अधिक होती है. कद्दू के बीजों को खेत में लगाने के बाद अंकुरित होने तक नमी बनाए रखने के लिए आवश्यकता के अनुसार तीन या चार दिन के अंतराल में हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए. बीजों के अंकुरण के बाद इसके पौधों को पानी की सामान्य जरूरत होती है. लेकिन गर्मियों के मौसम में इसके पौधों के विकास के लिए सप्ताह में एक बार पानी देना उचित होता है. जबकि बारिश के मौसम में इसके पौधे को सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन अगर बारिश वक्त पर ना हो तो पौधों की सिंचाई आवश्यकता के अनुसार करते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

कद्दू के पौधों से अधिक और उचित उत्पादन लेने के लिए उर्वरक की उचित मात्रा की जरूरत होती है. इसके लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त लगभग 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. जैविक खाद के रूप में गोबर की खाद की जगह किसान भाई कम्पोस्ट खाद का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. जबकि रासायनिक खाद के रूप में 40 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो पोटाश और 50 किलो फास्फोरस की मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में आखिरी जुताई के वक्त छिड़क दें. इसके अलावा रासायनिक खाद में ही 40 किलो नाइट्रोजन की मात्रा को खेत में दो बार में सिंचाई के साथ देना अच्छा होता है.

खरपतवार नियंत्रण

कद्दू की खेती में खरपतवार नियंत्रण काफी अहम होता है. क्योंकि इसके पौधे बेल के रूप में फैलते हैं. जो जमीन की सतह पर होते हैं. ऐसे में खरपतवार इसके पौधों को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाती है. कद्दू की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक तरीके से किया जाता है. रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए शुरुआत में बीजों की रोपाई के तुरंत बाद बासालीन की उचित मात्रा का छिडकाव खेत में कर देना चाहिए. जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण पौधों की नीलाई गुड़ाई कर किया जाता है. इसके पौधों को दो से तीन गुड़ाई की जरूरत होती है. इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद हल्के रूप से कर देनी चाहिए. उसके बाद बाकी की गुड़ाई पहली गुड़ाई के बाद 20 दिन के अंतराल में करनी चाहिए. और हर गुड़ाई के वक्त पौधों की जड़ों के पास मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

कद्दू के पौधों पर कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जो इसकी फसल को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाते हैं. जिनकी उचित टाइम रहते रोकथाम करना अच्छा होता है.

लालड़ी

कद्दू के पौधों पर लगने वाले इस रोग को रेड पम्पकिन बीटिल के नाम से भी जाना जाता है. पौधों पर इस रोग का प्रभाव अंकुरण के बाद दिखाई देने लगता है. इस रोग के कीट पौधे की जड़ों और उसकी पत्तियों को ज्यादा नुक्सान पहुँचाते है. जड़ों के काटने पर पौधा तुरंत मुरझाकर सूखने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर ट्राइक्लोफेरान या डाईक्लोरोवास की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फल मक्खी

कद्दू के फलों पर फल मक्खी रोग का प्रभाव पौधों के विकास के दौरान फल लगने के वक्त देखने को मिलता है. इस रोग के कीट फलों के अंदर अपने अंडे देते हैं. जिनकी सुंडी फलों के अंदर विकास कर उन्हें नष्ट कर देती है. और फलों के खराब होने के बाद उन्हें काटकर बाहर निकलती है. इस रोग के लगने पर फल समय से पहले ही गिरकर ख़राब हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बारिल या मैलाथियान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

सफ़ेद सुंडी

कद्दू की फसल पर सफ़ेद सुंडी का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है. इस रोग की सुंडी जमीन के अंदर पाई जाती है. जिसका रंग सफ़ेद और पीला दिखाई देता है. ये सुंडी पौधे की जड़ों को काटकर नुक्सान पहुँचाती है. जिस कारण पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए खेत में नीम की खली जुताई के वक्त छिड़क देनी चाहिए.

मोजैक

कद्दू के पौधों पर लगने वाला ये एक विषाणु जनित रोग है. इस रोग के लगने पर पौधे की बढ़वार रुक जाती है, और फलों का आकार छोटा दिखाई देने लगता है. इस रोग के लगने से पौधों से पैदावार काफी कम प्राप्त होती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफॉस या फास्फोमिडान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

एन्थ्रेक्नोज

कद्दू की बारिश के मौसम में लगाई जाने वाली फसल पर इस रोग का प्रभाव देखने को ज्यादा मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर काले भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. जिनका आकार समय के साथ बढ़ता जाता है. इस रोग के लगने पर पौधों का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए हेक्साकोनाजोल या प्रोपिकोनाजोल की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

फल सडन

फल सड़न रोग

कद्दू के फलों पर फल सडन रोग का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है. कद्दू के फलों पर ये रोग लगातार कई दिनों तक फलों की एक ही स्थिति में जमीन से लगे रहने पर लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए इसके फलों को पलटते रहना चाहिए. इसके अलावा रोग दिखाई देने पर टेबुकोनाजोल या वैलिडामाईसीन की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना अच्छा होता है.

फलों की तुड़ाई

कद्दू के फल बीज रोपाई के लगभग 100 से 110 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है. इसके पके हुए फल उपर से पीले सफ़ेद दिखाई देते हैं. जबकि इसके हरे फल 70 से 80 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जब फलों का आकार पूर्ण रूप से अच्छा हो जाए तब उन्हें तेज़ धार वाले हथियार से डंठल सहित काट लेना चाहिए. उसके बाद उनकी सफाई कर बाज़ार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए.

पैदावार और लाभ

कद्दू की विभिन्न किस्मों की औसतन पैदावार 400 किवंटल से ज्यादा पाई जाती है. जिसका बाज़ार 10 रुपये प्रति किलो तक पाया जाता है. जिससे एक बार में एक हेक्टेयर से किसान भाई को चार लाख तक की कमाई आसानी से हो जाती है.

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