मसाले

कढ़ी (करी) पत्ता की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

कढ़ी (करी) पत्ते के पौधे को मीठा नीम के नाम से भी जाना जाता है. इसका पौधा कडवे नीम की तरह ही होता है. लेकिन इसकी पत्तियां किनारों पर से कटी हुई नही होती. इसके पेड़ की ऊंचाई 15 से 20 फिट तक जा सकती है. मीठे नीम की सिर्फ पत्तियों का ही इस्तेमाल किया जाता है. इस कारण लोग इन्हें लगभग 2 मीटर तक ही बढ़ने देते हैं. क्योंकि इसके पौधे पर फूल बनने के बाद इसका विकास रूक जाता है. मीठे नीम की पत्तियों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल मसाले और औषधियों में किया जाता है. इस कारण इसके पौधे को मसाले और औषधीय पौधों की श्रेणी में शामिल किया गया हैं.

कढ़ी पत्ता की पैदावार

इसके पत्तों का पाउडर बनाकर लम्बे समय तक भण्डारण कर उपयोग में ले सकते हैं. इसका ताज़ा पत्ता ज्यादा खूशबूदार होता है. इसके पत्तों को तोड़ने के बाद किसी भी तापमान पर रख लें, लेकिन कुछ घंटों बाद उनकी खूशबू समाप्त हो जाती है. इसके पौधे पर सफ़ेद रंग के छोटे छोटे फूल आते हैं जो खूशबूदार होते हैं. जिन से बनने वाले फलों के बीज जहरीले होते हैं. जिन्हें कभी नही खाना चाहिए.

इसकी खेती के लिए उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधे को विकास करने के लिए सूर्य के सीधे प्रकाश की जरूरत होती है. इस कारण इसे छायादार जगह में नही उगाना चाहिए. इसके पौधे को एक बार खेत में लगाने के बाद 10 से 15 साल तक पैदावार दे सकता है. इसकी खेती के लिए सामान्य पी.एच. वाली जमीन की जरूरत होती है.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

इसकी खेती के लिए उचित जल प्रबंधन वाली उपजाऊ जमीन की जरूरत होती है. कढ़ी पत्ते की खेती के लिए जलभराव वाली चिकनी काली मिट्टी उपयुक्त नही होती. क्योंकि इसके पौधे एक बार लगाने के बाद 10 से 15 साल तक पैदावार देते हैं. और बारिश के मौसम में जल भराव होने की वजह से इसके पौधों में कई तरह के रोग लगने की संभावना बढ़ जाती हैं. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 6 से 7 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

कढ़ी (करी) पत्ता के पौधे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए उपयुक्त होते हैं. भारत में इसे केरल, कर्नाटक, बिहार, बंगाल और उत्तर पूर्वी पहाड़ी राज्यों में ज्यादा उगाया जाता है. इसके पौधे को सूर्य के प्रकाश की जरूरत होती है. इस कारण इसे छायादार जगह में नही उगाना चाहिए. इसके पौधे को बारिश की काफी कम जरूरत होती है. और सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसके पौधों को नुक्सान पहुँचाता है.

इसके पौधों को अंकुरण से विकास करने तक अलग अलग तापमान की जरूरत नही होती. इसका पौधा सामान्य तापमान पर अच्छे से विकास करता हैं. लेकिन सर्दियों में न्यूनतम 10 और गर्मियों में अधिकतम 40 डिग्री तापमान पर भी इसका पौधा विकास कर सकता है.

खेती की तैयारी

कढ़ी पत्ते के पौधे एक बार लगाने के बाद कई साल तक पैदावार देते है. इस कारण खेत की जुताई अच्छे से करने के लिए पहले गहरी मिट्टी खोदने वाले पलाऊ से खेत की जुताई करें. पलाऊ लगाने के बाद कल्टीवेटर से दो से तीन जुताई कर खेत में पाटा चला दें. इससे मिट्टी समतल हो जायेगी.

मिट्टी के समतल हो जाने के बाद खेत में तीन से चार मीटर की दूरी पर हलके गड्डे तैयार कर लें. इन गड्डों को पंक्ति के रूप में ही तैयार करें. और प्रत्येक पंक्तियों के बीच समान दूरी बनाकर रखे. उसके बाद इन गड्डों में पुरानी गोबर की खाद और जैविक उर्वरक की उचित मात्रा को मिट्टी में मिलाकर उन्हें गड्डों में 15 दिन पहले भर दें. मिट्टी के भरने के बाद गड्डों की सिंचाई कर दें.

बीज रोपाई का तरीका और वक्त

कढ़ी पत्ता की खेती

कढ़ी पत्ते के पौधे बीज के माध्यम से लगाए जाते हैं. जबकि किसान भाई इसे कलम के माध्यम से भी लगा सकते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग इन्हें बीज के माध्यम से ही लगाना पसंद करते हैं. क्योंकि बीज और कलम दोनों ही माध्यम से लगाने पर सामान तरीके से पैदावार मिलती है. एक एकड़ में लगभग 70 किलों बीज की जरूरत होती है.

इसके बीजों को खेत में तीन से चार मीटर की दूरी पर बनाए गए गड्डों में लगाया जाता है. इसके बीजों को गड्डों में लगाने से पहले उन्हें गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए. बीजों को उपचारित करने के लिए उन्हें रोपाई से पहले लगभग दो से तीन घंटे गोमूत्र में भिगोकर रखना चाहिए. उसके बाद उपचारित किये गए दो से तीन बीजों को गड्डों में लगभग तीन से चार सेंटीमीटर नीचे गाड़ देना चाहिए.

इसके बीजों की रोपाई सर्दी के मौसम को छोड़कर कभी भी की जा सकती है. लेकिन इसे मार्च के महीने में उगाना अच्छा होता है. मार्च के महीने मे बीज लगाने के बाद सितम्बर से अक्टूबर माह तक ये काटने के लिए तैयार हो जाते हैं. इसकी पहली कटाई बीज रोपाई के सात महीने बाद  की जाती हैं. उसके बाद हर तीसरे महीने पौधा कटाई के लिए तैयार हो जाता हैं.

पौधों की सिंचाई

इसके बीजों को खेत में लगाने के तुंरत बाद उनकी सिंचाई कर दें. और उसके बाद जब तक बीज अंकुरित होता है तब तक गड्डों में नमी बनाए रखने के लिए दो से तीन दिन के अंतराल में पानी दें. जब बीज अच्छे से अंकुरित हो जाए तब गर्मियों के मौसम में सप्ताह में एक बार पौधों को पानी देना चाहिए. जबकि बरसात के मौसम में इसके पौधों को पानी की जरूरत नही होती. लेकिन बारिश वक्त पर ना हो तो आवश्यकता के अनुसार पौधों को पानी दें. सर्दियों में इसके पौधे को पानी की काफी कम जरूरत होती है. सर्दियों में पौधे को पानी तभी दें जब जमीन सूखी हुई दिखाई दे.

उर्वरक की मात्रा

करी पत्ते का औषधि और मसाले में उपयोग होता है. इस कारण इसकी पैदावार में हमेशा जैविक खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. इसकी खेती के लिए गड्डों की तैयारी के वक्त लगभग 200 क्विंटल पुरानी सड़ी गोबर खाद प्रति एकड़ के हिसाब से गड्डों में डालकर मिट्टी में मिला दें. उसके बाद हर तीसरे महीने जैविक कम्पोस्ट खाद पौधों को दो से तीन किलो की मात्रा में दें.

खरपतवार नियंत्रण

इसके पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए पहली गुड़ाई बीज रोपण के लगभग एक महीने बाद कर देनी चाहिए. अगर हो सके तो पहली गुड़ाई के वक्त सिर्फ हाथ से ही खरपतवार निकाल दें. उसके बाद दूसरी गुड़ाई दो महीने बाद करें. और तीसरी गुड़ाई तीन से चार महीने बाद कर दें. पौधे की कटाई के तुरंत बाद एक बार गुड़ाई करना अच्छा होता है.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

कढ़ी पत्ते के पौधों की कटाई हर तीसरे महीने में की जाती है. इस दौरान इसमें काफी कम रोग ही देखने को मिलते है. लेकिन कुछ रोग होते हैं जो पौधे पर आ जाते हैं.

कीटों का आक्रमण

कढ़ी पत्ते के पौधे पर कीटों का आक्रमण मौसम परिवर्तन की वजह से देखने को मिलता है. पौधे पर लगने वाले किट और उनके लार्वा इसकी पत्तियों को नुक्सान पहुँचाते हैं. और इसके पौधे की पत्तियों का ही इस्तेमाल व्यापारिक रूप से होता है. इसलिए इसकी पत्तियों को कीटों के आक्रमण से बचाने के लिए पौधे पर नीम का तेल या नीम के पानी का छिडकाव करें.

जड गलन

जड़ गलन का रोग पानी भराव की स्थिति में देखने को मिलता हैं. इस रोग के लगने पर पूरा पौधा नष्ट हो जाता है. शुरुआत में इसके पौधे की पत्तियां पीली दिखाई देने लगती है. उसके कुछ दिन बाद पत्तियां सुखकर गिरने लगती हैं. इस रोग का सबसे अच्छा बचाव है की पौधों की जड़ों में पानी भरा ना रहने दें. इसके अलावा रोग लगने पर पौधों की जड़ों में ट्राइकोडर्मा का छिडकाव करना चाहिए.

दीमक

दीमक मिट्टी में रहकर पौधे की जड़ों को नुक्सान पहुँचाती है. इसके लगने पर पौधे की पत्तियां मुरझाने लगती हैं. उसके बाद धीरे धीरे पूरा पौधा सुखकर नष्ट हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए बीज को क्लोरोपाइरीफास से उपचारित कर खेत में लगाएं.

पौधों की कटाई और देखरेख

कढ़ी पत्तों की कटाई

इसके पौधे बीज लगाने के सात महीने बाद पहली कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके पौधों की कटाई करते वक्त इन्हें लगभग आधा फिट ऊपर से काटें. जिससे पौधा फिर से फूटने ( अंकुरित या नई शाखा ) में ज्यादा वक्त नही लेता है. और शाखाओं की संख्या में भी वृद्धि होती है. पहली कटाई के बाद इसके पौधे तीसरे या चौथे महीने फिर से कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके पौधों पर फूल बनने से पहले काट लेना चाहिए. क्योंकि फूल बनने के बाद पौधा विकास नही करता.

पत्तों को सुखाना

पौधों की कटाई के बाद सभी बड़ी पत्तियों को डालियों से हटाकर उन्हें किसी छायादार जगह में सूखा लेना चाहिए. इसकी पत्तियों को सूखाने के दौरान उन्हें पलटते रहें. क्योंकि पत्तियों के नही पलटने से उनमें सडन पैदा हो जाती है, और पत्तियां खराब होने लगती है. पत्तियों के सूख जाने बाद उन्हें चूर्ण बनाकर या पत्तियों को सीधा बाज़ार में बेच दिया जाता है.

पैदावार और लाभ

करी पत्ते की एक साल में चार बार कटाई की जाती है. जिन्हें सूखाकर बेचा जाता है. एक एकड़ से साल भर में तीन से चार टन माल आसानी से मिल जाता है. जिससे किसान भाई एक एकड़ से एक बार में एक लाख से ज्यादा की कमाई कर सकता हैं.

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