फल

सीताफल की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

सीताफल को शरीफा, शुगर एप्पल और कस्टर्ड एप्पल के नाम से भी जाना जाता है. ये एक स्वादिष्ट मीठा फल होता है. इस कारण लोग इसको खाना काफी ज्यादा पसंद करते हैं. इसके खाने के बहुत सारे फायदे हैं. सीताफल के इस्तेमाल से हृदय संबंधित, पेट संबंधित, कैंसर, कमजोरी और जोड़ों में दर्द जैसी कई बीमारियों से छुटकारा मिलता है.

सीताफल का खाने के अलावा व्यापारिक तौर पर भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. इसके बीजों को सुखाकर उनका तेल निकाला जाता है. इस तेल का इस्तेमाल साबुन और पेंट बनाने में किया जाता है. इसके अलावा इसके गूदे को दूध में मिलाकर आइसक्रीम तैयार की जाती है. इसका फल बहुत ठंडा होता है. जिससे यह शरीर के तापमान को स्थिर बनाता है.

सीताफल की खेती

इसकी खेती के लिए शुष्क जलवायु वाली जगह ज्यादा उपयुक्त होती है. इसके पौधे को गर्मी की ज्यादा जरूरत होती है. और सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसके लिए नुकसानदायक होता है. इसके पौधे को ज्यादा बारिश की जरूरत नही होती. इसकी पत्तियों में एक विशेष महक आती है. जिस कारण इसके पौधों की ज्यादा देखरेख करने की जरूरत नही होती. भारत में इसकी खेती झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम और आंध्रप्रदेश में सबसे ज्यादा होती है.

अगर आप भी इसकी खेती कर अच्छा लाभ कमाना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

सीताफल की खेती लगभग सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती हैं. लेकिन अच्छी पैदावार के लिए उचित जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. जबकि जल भराव वाली काली चिकनी मिट्टी में इसकी खेती नही की जा सकती. क्योंकि जल भराव होने पर उत्त्पन्न  होने वाले कीटों के कारण पौधों  में कई तरह के रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 5.5 से 7 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

सीताफल की खेती के लिए शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र उपयुक्त होते हैं. इसके पौधे अधिक गर्मी में आसानी से विकास करते हैं. लेकिन अधिक समय तक पड़ने वाली तेज़ सर्दी इसके लिए उपयुक्त नही होती. इससे इसके फलों का स्वाद कड़ा हो जाता है. इसके फलों को पकने के लिए गर्मी के मौसम की जरूरत होती है. लेकिन गर्मी में पकने के बाद भी इसके फल बहुत ठंडे होते हैं.

इसके पौधे को अंकुरण के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. और विकास के टाइम ये 40 डिग्री तापमान को भी सहन कर लेता है. लेकिन जब इस पर फूल और फल बनते हैं, उस वक्त 40 डिग्री से ज्यादा तापमान होता है तो इसके फूल और फल दोनों झड़ने लगते हैं.

उन्नत किस्में

सीताफल की कई तरह की किस्में पाई जाती है. इन सभी किस्मों को उगने के स्थान, फल, बीज के रंग और आकार के आधार पर तैयार किया गया है.

अर्का सहन

अर्का सहन सीताफल की एक संकर किस्म है. इस किस्म के फल बहुत रसदार होते हैं. जो बहुत धीमी गति से पकते हैं. इस किस्म के फलों में बीज की मात्रा कम और आकार छोटा होता है. इसके गूदे अंदर से बर्फ की तरह सफ़ेद दिखाई देते हैं. जो स्वाद में बहुत मीठे होते हैं. इनमें सुगंध मध्यम प्रकार की आती है.

उन्नत किस्म

लाल सीताफल

इस किस्म के पौधों को बीज के माध्यम से उगाने पर फलों में शुद्धता बनी रहती है. इसके फलों का रंग हल्का लाल गुलाबी होता है. इस किस्म के एक पौधे से एक वर्ष में 40 से 50 फल ही प्राप्त किया जा सकते हैं. जो समय के साथ साथ बढ़ते जाते हैं. इस किस्म के फलों में बीज काफी कम मात्रा में पाए जाते है.

मैमथ

इस किस्म का उत्पादन लाल शरीफे से ज्यादा होता है. इसके एक पौधे से सालभर में 60 से ज्यादा सीताफल प्राप्त होते हैं. इस किस्म के फलों में बीज की मात्रा भी कम पाई जाती है. इसके फलों की फाँके गोलाकार और बड़ी होती हैं. जिनमें गूदे की मात्रा अधिक पाई जाती है.

बाला नगर

इस किस्म के सीताफल की खेती ज्यादातर झारखंड में की जाती है. झारखण्ड के जंगलों में यह सामान्य रूप से पाया जाता है. इसके फलों का रंग हल्का हरा होता है. इस किस्म के फलों में बीज की मात्रा अधिक पाई जाती है. इसके एक पौधे की पैदावार 5 किलो के आसपास पाई जाती है.

इनके अलावा और भी कई किस्में हैं जिनका उत्पादन अलग अलग जगहों पर किया जाता है. इनमें वाशिंगटन पी.आई. 107, 005, ब्रिटिश ग्वाइना और बारबाड़ोज़ सीडलिंग जैसी कई किस्में मौजूद हैं.

खेत की तैयारी

सीताफल की खेती के लिए शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेषों को हटाकर उसकी पलाऊ के माध्यम से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद कल्टीवेटर के माध्यम से खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर उसमें पाटा लगा दें. पाटा लगाने से मिट्टी में मौजूद ढेले ख़त्म हो जाते हैं और भूमि समतल दिखाई देती है.

खेत के समतल हो जाने के बाद खेत में तीन से चार मीटर की दूरी रखते हुए दो फिट चौड़े और एक फिट गहरे गड्डे तैयार कर लें. गड्डों को पंक्ति में तैयार करें और प्रत्येक पंक्ति के बीच तीन मीटर की दूरी बनाकर रखे. गड्डों के तैयार हो जाने के बाद उसमें जैविक और रासायनिक खाद की उचित मात्रा डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. उसके बाद गड्डों की सिंचाई कर दें.

पौध तैयार करना

सीताफल की लाल किस्म को छोड़कर बाकी किस्मों को कलम के माध्यम से तैयार करना चाहिए. क्योंकि कलम के माध्यम से तैयार करने पर इसका फल दो साल बाद ही बनना शुरू हो जाता है. जबकि बीज के माध्यम से तैयार की हुई पौध पर चार से पांच साल बाद फल लगने शुरू होते हैं.

कलम के माध्यम से इसकी पौध तैयार करने के लिए शील्ड बडिंग और ग्राफ्टिंग विधि का इस्तेमाल करते हैं. ये दोनों विधि अलग अलग समय पर की जाती है. शील्ड बडिंग के लिए जनवरी से जून का महीना उपयुक्त होता है. जबकि ग्राफ्टिंग के लिए अक्टूबर और नवम्बर का महीना उपयुक्त होता है. इसकी कलम तैयार करने के बजाय इसे बाज़ार में रजिस्टर्ड नर्सरी से खरीदकर भी लगा सकते हैं. पौधे को खरीदकर लगाने से टाइम की बचत होती है और फल भी जल्दी लगने लगते हैं.

बीज के माध्यम से पौध तैयार करने के लिए इसके बीज को पहले तीन से चार दिन तक पानी मे भिगोकर रखा जाता है. जिससे बीज जल्दी अंकुरित हो जाता है. तीन से चार दिन बाद नर्सरी में इसके दो से तीन बीजों को मिट्टी और खाद के मिश्रण से भरी पॉलीथिन में लगा देते हैं. जिसके कुछ दिन बाद ये अंकुरित होने लग जाते हैं.  अंकुरित होने के बाद जब पौधे अच्छे से विकास करने लगते है तब उनमें सबसे ज्यादा विकास कर रहे एक पौधे को रखकर बाकी पौधों को नष्ट कर देते हैं.  बीज के माध्यम से इसके पौधे लगाने के लिए इसके बीज को चार महीने पहले मिट्टी में उगाकर पौध तैयार की जाती है.

पौध की रोपाई का तारिक और टाइम

सीताफल के पौधे को खेत में तैयार किये गए गड्डों में लगाते हैं. पौध को लगाने के लिए तैयार किये गए गड्डों में एक और छोटा गड्डा तैयार करना होता है. जिसमें पौधे को लगाया जाता है. इस तैयार किये गए नए गड्डे को पहले गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए. उसके बाद इसके पौधे को गड्डे में लगाकर उसे चारों तरफ से अच्छे से मिट्टी से दबा दें.

इसके पौधों की रोपाई का सबसे उपयुक्त टाइम जुलाई का महीना है. क्योंकि बारिश का मौसम होने की वजह से, इस दौरान पौधों को विकास करने के लिए आदर्श वातावरण मिलता है.

सीताफल के पौधे

पौधों की सिंचाई

पौधों की रोपाई के तुरंत बाद इसकी सिंचाई कर देनी चाहिए. सीताफल के पौधे को सिंचाई की काफी कम जरूरत होती है. लेकिन फिर भी पौधे की साल भर में लगभग 10 से 12 सिंचाई कर देनी चाहिए. सर्दियों के मौसम में इसकी 15 से 20 दिन में सिंचाई करनी चाहिए. और गर्मियों के मौसम में इसके पौधे की सप्ताह में एक बार सिंचाई जरुर कर देनी चाहिए. जबकि बारिश के मौसम में इसके पौधे को सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन जब पौधे पर फल बन रहे हो तब पौधे में नमी बनाए रखने के लिए पौधे को हल्का पानी देते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

सीताफल के पौधे को उर्वरक की जरूरत होती है. इसके लिए गड्डों को तैयार करते वक्त प्रत्येक गड्डों में 5 से 10 किलो पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा एन.पी.के. की 50 ग्राम मात्रा मिट्टी में मिलकर उसे गड्डों में भर दें. पौधों को खाद की ये मात्रा साल में एक बार तीन से चार साल तक देनी चाहिए. उसके बाद पौधे की वृद्धि के साथ साथ इसकी मात्रा में भी वृद्धि करते रहना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

सीताफल के पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए पौधों को गड्डों में लगाने के तीन से चार सप्ताह बाद उसकी हल्की नीलाई गुड़ाई कर दें. इससे पौधा अच्छे से विकास करता है. इसके पौधों की साल में दो से तीन नीलाई गुड़ाई करना अच्छा होता है. इसके अलावा बारिश के मौसम के बाद शेष बची बीच की जमीन अगर खाली हो तो उसकी जुताई कर दें. इससे खेत में उगने वाली खरपतवार नष्ट हो जाती है.

अतरिक्त कमाई

सीताफल के पौधे दो से तीन साल बाद फल देना शुरू करते हैं. लेकिन इसके पौधे पूर्ण रूप से तैयार होने में चार से पांच साल का वक्त लेते हैं. इस दौरान खेत में खाली बची जमीन में कई तरह की मसाला और सब्जी फसल को उगाया जा सकता हैं. जिससे किसान भाइयों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है. और उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना भी नही करना पड़ता.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

सीताफल के पौधे से एक विशेष प्रकार की महक आती है. जिससे इसके पौधे पर किसी प्रकार की बिमारी का नुक्सान देखने को नही मिलता. इसके पौधों से फलन के दौरान अगर फूल झड़ने लगे तो पौधों में पानी देना बंद कर दें. इसके फल पकने के बाद जल्दी सड़ जाते हैं. इस कारण इसके फलों को उचित समय रहते तोड़ लेना चाहिए.

पौधे की देखरेख और कटाई छटाई

सीताफल के पौधों की कटाई छटाई करना जरूरी होता है. इसके पौधों के बड़े होने के साथ साथ इनकी शाखाओं को सिरे पर से काट देना चाहिए. इससे नई शाखाएं निकलती हैं. जिन पर लगने वाले नए फलों के कारण पौधों की पैदावार में वृद्धि देखने को मिलती है. शाखाओं की कटिंग के दौरान सुखी हुई शाखाओं को भी काटकर अलग कर दें.

इसके पौधे में आने वाली गंध के कारण पशुओं से इसकी सुरक्षा की भी जरूरत नही होती.

हस्त परागण

इसके पौधे से आने वाली महक के कारण मित्र किट इसके पौधे पर बहुत कम मात्रा में आते हैं. जिस कारण इसके फूलों में निषेचन क्रिया करवाने के लिए हस्त परागण करवाना होता है. इसके लिए रोयेंदार कपड़े को हाथ में पहनकर सुबह जल्दी इसके फूलों पर घूमा देना चाहिए.

फलों की तुड़ाई

सीताफल के फलों की बनने की अवधि काफी लम्बी होती है. इसके पौधों पर फूल मार्च के महीने में आने शुरू हो जाते हैं. जो जुलाई माह तक आते हैं. उसके बाद इसके फलों को बनने में चार महीने का वक्त लगता है. इसके फल सितम्बर माह के बाद पकने शुरू होते हैं. सीताफल के पौधे पर फूल खिलने के तुरन्त बाद 50 पी.पी.एम. जिब्रेलिक एसिड का छिडकाव कर दें. इससे पौधे पर फल अच्छे से बनते हैं.

इसका पूर्ण रूप से पका हुआ फल कठोर दिखाई देने लगता है. इस दौरान इसके फलों में बनी फांकों में खाली जगह दिखाई देने लगती है. तब इसका फल पूरी तरह पककर तैयार हो जाता है. इस दौरान इनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए. इसके कम पके फलों की तुड़ाई नही करनी चाहिए. क्योंकि कम पके फलों में कडवाहट आने लगती है.

पैदावार और लाभ

सीताफल के पौधे खेत में लगाने के दो से तीन साल बाद फल देना शुरू कर देते हैं. इसके प्रत्येक पौधे से शुरूआत में 60 के आसपास फल प्राप्त होते हैं. जो उम्र बढ़ने के साथ साथ बढ़ते हैं. कुछ सालों बाद इसके एक पौधे से 100 से ज्यादा फल प्राप्त होने लगते हैं. एक एकड़ में इसके 500 के आसपास पौधे लगाए जा सकते हैं. जिनसे सीताफल की सालाना 30 क्विंटल के आसपास पैदावार हो जाती हैं. जिनका बाज़ार भाव 40 रूपये किलो के आसपास पाया जाता है. जिससे किसान भाई एक साल में एक एकड़ से एक से सवा लाख तक की कमाई आसानी से कर लेता हैं.

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