उन्नत किस्में

मेथी की उन्नत किस्में और पैदावार

मेथी की खेती मुख्य रूप से मसाला फसल के रूप में की जाती है. मेथी के दानो का इस्तेमाल अचार, सब्जी, आयुर्वेदिक औषधि, सौंदर्य प्रसाधन की चीजों को बनाने में किया जाता है. इनके अलावा मेथी के दानो को पशुओं के खाने के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. मेथी के दानो को पीसकर खाने से पेट संबंधित कई तरह की बीमारियों से छुटकारा मिलता है. मेथी के दानो के अलावा इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी खाने में किया जाता है. इसकी पत्तियों को काटकर सब्जी और आटे में मिलाकर रोटी बनाई जाती हैं.

मेथी की उन्नत किस्में

मेथी का पौधा दो से तीन फिट की ऊंचाई का पाया जाता है. मेथी की खेती सर्दी के मौसम में रबी की फसलों के साथ या सहफसली खेती के रूप में करते हैं. मेथी की उन्नत खेती के लिए इसके दानो की रोपाई का सबसे उपयुक्त टाइम सितम्बर माह के आखिरी सप्ताह को माना जाता है. लेकिन वर्तमान में अब काफी ऐसी किस्में इजात कर ली गई हैं, जिनकी रोपाई उचित समय से पहले और बाद दोनों वक्त की जा सकती हैं. जिससे किसान भाई मेथी से दो तरह से पैदावार लेकर अच्छी कमाई कर सकता है.

आज हम आपको मेथी की उन्नत किस्मों के बारें में बताने वाले है. जिन्हे उगाकर आप भी अच्छीखासी कमाई कर सकते हैं.

आर एम टी 1

मेथी की इस किस्म को श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर द्वारा तैयार किया गया है, जिसे प्रभा के नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म के पौधे राजस्थान की सभी स्थानीय किस्मों से ज्यादा पैदावार देने वाली किस्म के रूप में जाने जाते है. इस किस्म के दाने चमकीले और आकर्षक होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 140 से 150 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों पर जड़ गलन और छाछया रोग का प्रभाव बहुत कम देखने को मिलता है.

एन आर सी एस एस एम एस 1

मेथी की इस किस्म का निर्माण नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन सीड स्पाइस, तबीजी, अजमेर द्वारा किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 135 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे हरी पत्तियों की खेती के लिए भी उपयुक्त होते हैं. इसके पौधे एक बार लगाने के बाद तीन कटिंग आसानी से दे सकते हैं. दानो के रूप में इस किस्म के पौधों की कुल पैदावार 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से पाई जाती है. इस किस्म के दाने कड़े और मोटे दिखाई देते हैं. इसकी पत्तियों में भी तीखापन पाया जाता है. जिनका आकार सामान्य से बड़ा होता हैं.

कश्मीरी मेथी

मेथी की इस किस्म को पहाड़ी इलाकों में लगाने के लिए तैयार किया गया है. इसके पौधे अधिक सर्दी को सहन कर लेते हैं. इसके पौधों पर आने वाली फलियों की लम्बाई 8 सेंटीमीटर तक पाई जाती है. इस किस्म के पौधे हरी पत्तियों के रूप में दो से तीन कटाई आसानी से दे सकते हैं. फसल के रूप में इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 से 130 दिन बाद पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 18 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

ए एफ जी 1

मेथी की इस किस्म के पौधे मध्यम समय में अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार किये गए हैं. इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई वाले होते हैं. जिनकी पत्तियों की चौड़ाई अधिक पाई जाती है. हरी पत्तियों में रूप में इसके पौधे की तीन बार आसानी से कटाई की जा सकती है. जबकि इस किस्म को हरी पत्तियों और दाने दोनों की उपज लेने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 135 से 140 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका हरी पत्तियों के रूप में 80 क्विंटल और दानो के रूप में 20 से 25 क्विंटल के आसपास पैदावार प्राप्त होती है. इसके दानो का आकार बड़ा, मोटा और स्वाद कम कड़वा पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर कीट रोगों का प्रभाव कम देखने को मिलता है.

राजेन्द्र क्रांति

मेथी की इस किस्म को राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, बिहार द्वारा कम समय में उत्तम पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे मौसम के प्रति सहनशील पाए जाते हैं. इसके पौधे रोपाई के लगभग 120 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 12 से 15 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में माहू, कैटरपिलर और छाछया जैसे रोग काफी कम देखने को मिलते हैं.

आर एम टी 1

मेथी की इस किस्म के पौधे देरी से पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. जो बीज रोपाई के लगभग 150 से 160 दिन बाद कटाई के लिए तैयार होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों को चूर्णी फफूंद और जड़ गलन जैसी बिमारी काफी कम देखने को मिलती है. इस किस्म का उत्पादन राजस्थान और गुजरात में अधिक किया जाता है.

एम. एल. 150

मेथी की इस किस्म को पंजाब में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे अधिक गहरे हरे दिखाई देते हैं. इसके पौधे पर फलियाँ अधिक मात्रा में पाई जाती हैं. इसके पौधों की एक कटाई के बाद इसकी फसल आसानी से ली जा सकती है. इस किस्म के दाने आकर्षक मोटे, पीले और चमकदार होते हैं. इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 18 से 20 क्विंटल के बीच पाई जाती हैं.

आर एम टी 143

मेथी की इस किस्म को श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर द्वारा भारी मिट्टी वाली जगहों पर उगाने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 145 दिन के आसपास कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 16 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर कई तरह के फफूंद और जीवाणु जनित रोगों का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

ए एफ जी 2

मेथी की इस किस्म का निर्माण हरे पौधों की कटाई के लिए किया गया है. इस किस्म के पौधों की तीन कटाई आसानी से की जा सकती है. इस किस्म के पौधों की प्रत्येक कटाई से प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 50 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई और चौड़ी पत्तियों वाले होते हैं. जिनमें कडवापन पाया जाता है. पैदावार के रूप में इसके पौधे रोपाई के लगभग  140 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका दानो के रूप में प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 18 से 20 क्विंटल तक पाया जाता है.

एच. एम. 219

मेथी की ये एक अधिक उत्पादन देने वाली किस्म है. जिसके पौधे सामान्य ऊंचाई के होते हैं. और इसकी पत्तियां कम चौड़ी पाई जाती है. इस किस्म के पौधे 130 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 25 से 30 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में सफेद धब्बे का रोग देखने को नही मिलता है.

लाम सेलेक्शन 1

मेथी की इस किस्म को आंध्रप्रदेश कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कम समय में पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 90 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों को आंध्रप्रदेश के आसपास वाली जगहों पर उगाया जाता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 10 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर माहू, कैटरपिलर, चूर्णी फफूंद और जड़ गलन जैसे रोगों का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

पूसा अर्ली बंचिंग

मेथी की इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा कम समय में उत्तम पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधों पर फलियाँ गुच्छों में पाई जाती हैं. इस किस्म के पौधों को हरी पत्ती और पैदावार दोनों के लिए उगाया जा सकता है. हरी पत्तियों के रूप में इसके पौधों की दो से तीन कटिंग आसानी से की जा सकती है. इसके पौधे रोपाई के लगभग 120 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 12 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

हिसार सोनाली

मेथी की इस किस्म का निर्माण चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा किया गया है. इस किस्म का उत्पादन हरियाणा, राजस्थान और पंजाब के कुछ हिस्सों में किया जाता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 150 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में जड़ गलन और पर्ण धब्बा जैसे रोग काफी कम देखने को मिलते हैं.

को 1

मेथी की इस किस्म को तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म का उत्पादन ज्यादातर तमिलनाडु के आसपास वाले राज्यों में ही किया जाता है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 90 से 95 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 8 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में जड़ गलन का रोग काफी कम देखने को मिलता है.

हिसार सुवर्णा

मेथी की इस किस्म का निर्माण चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा इसके दाने और हरी पत्तियों के उत्पादन के लिए किया गया है. इस किस्म का सबसे ज्यादा उत्पादन राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में किया जाता है. हरी पत्तियों के रूप में इस किस्म के पौधों की दो से तीन कटिंग आसानी से की जा सकती है. जबकि पैदावार के रूप में इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 से 20 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर पर्ण धब्बा और भभूतिया रोग का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

एन आर सी एस एस ए एम 2

मेथी की इस किस्म का निर्माण नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन सीड स्पाइस, तबीजी के द्वारा किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 140 दिन बाद पककर तैयार होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 से 20 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इसके दाने छोटे आकार के होते हैं. जबकि इसकी पत्तियों का आकार बड़ा और चौड़ा होता है. इस किस्म को दोनो तरह की पैदावार के लिए उगाया जा सकता है.

आर एम टी 305

मेथी की इस किस्म के पौधे बौने आकार के दिखाई देते हैं. जिन पर सभी फलियाँ एक साथ परिपक्व होती हैं. इसके पौधे रोपाई के लगभग 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 13 से 15 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में चूर्ण फफूंदी का रोग काफी कम देखने को मिलता है.

यू एम 112

मेथी की इस किस्म को हरी पत्ती और दाने दोनों की उपज लेने के लिए उगाया जा सकता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 120 से 140 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे सीधे बढ़कर अपना विकास करते हैं. हरी पत्तियों के रूप में इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 40 से 50 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस के पौधों की लम्बाई सामान्य से काफी ज्यादा पाई जाती है.

हिसार माधवी

मेथी की इस किस्म का निर्माण चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा सम्पूर्ण भारत में उगाने के लिए किया गया है. इस किस्म के पौधों को सिंचित और असिंचित दोनों तरह की भूमि में आसानी से उगाया जा सकता हैं. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 130 से 140 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में मृदु रोमिल फफूंद और भ-भूतिया रोग देखने को कम मिलता है.

हिसार मुक्त

मेथी की इस किस्म का निर्माण भी चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा उत्तर भारत के सभी राज्यों में उगाने के लिए किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 130 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 से 25 क्विंटल के बीच पाया जाता है.

इनके अलावा कुछ क्षेत्रिय किस्में भी हैं जिन्हें किसान भाई बहुत कम मात्रा में उगाते हैं. जिनमें कोयम्बटूर, राजस्थान मेथी 1, गुजराती मेथी 1 और 2 जैसी किस्में शामिल हैं.

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