फल

आडू की उन्नत खेती कैसे करें

आडू की गिनती गुठली वाले फलों में होती है. किसान भाई इसकी खेती नगदी फसल के रूप में करते है. आडू की उत्पत्ति का स्थान चीन और ईरान को बताया जाता है. आडू के ताजे फलों का इस्तेमाल खाने में किया जाता है. इसके अलावा आडू से कैंडी, जैम और जैली जैसी चीजें भी बनाई जाती है. इसके फल में शक्कर की मात्रा ज्यादा पाई जाती है. जिस कारण इसका फल अधिक स्वादिष्ट और रसीला होता है.

आडू की खेती

आडू की खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु की जरूरत होती है. आडू का पौधा एक बार लगाने के बाद कई सालों तक पैदावार देता है. भारत में इसकी खेती पर्वतीय भू-भागों में की जाती है. इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. वर्तमान इसको उत्तर भारत के मैदानी भागों में भी उगाया जा रहा है.

अगर आप भी इसकी खेती के माध्यम से अच्छी कमाई करना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

आडू की खेती के लिए हल्की दोमट और बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए जल भराव वाली और कम उपजाऊ भूमि उपयुक्त नही होती. जल भराव होने पर इसके पौधों में रोग लग जाते हैं. इसकी खेती के भूमि का पी.एच. मान मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

आडू की खेती के लिए समशीतोष्ण और शीतोष्ण दोनों ही जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों को विकास करने के लिए गर्मी के मौसम की जरूरत होती है. जबकि अच्छी गुणवत्ता के फलों के लिए सर्दी के मौसम की जरूरत होती है. आडू की खेती समुद्र तल से 750 से 1800 मीटर ऊंचाई वाले भू-भागों में की जाती है. इसकी खेती उन जगहों पर नही की जा सकती जहां सर्दियों के दौरान देर से पाला पड़ता है. इसके पौधे पर फूल आने के दौरान होने वाली बारिश नुकसानदायक होती है.

आडू की खेती के लिए तापमान की ख़ास जरूरत होती है. इसके पौधों को शुरुआत में विकास करने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. उसके बाद इसके पौधे सर्दियों में न्यूनतम 4 डिग्री और गर्मियों में अधिकतम 30 डिग्री तापमान को सहन कर सकते हैं. जबकि इसके पौधों पर फलों के लगने के बाद पकने के दौरान निश्चित समय तक 7 डिग्री तापमान की जरूरत होती है.

उन्नत किस्में

आडू की वर्तमान में कई उन्नत किस्में हैं. जिन्हें अधिक उत्पादन लेने के लिए अलग अलग जगहों पर उगाया जाता है.

प्रताप

आडू की इस किस्म को पंजाब के मैदानी भागों में उगने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे जल्दी फल पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के फल बाहर से पीले और लाल रंग के दिखाई देते हैं. इस किस्म के पूर्ण रूप से तैयार एक वृक्ष से सालाना औसतन 70 किलो तक फल प्राप्त होते हैं.

खुरमानी

आडू की इस किस्म के पौधे अधिक उत्पादन और देरी से फल देने के लिए जाने जाते हैं. इसके पौधे जून के लास्ट में फल देना शुरू करते हैं. जिनका प्रति पौधा उत्पादन 110 से 120 किलो तक पाया जाता है. जो पौधे के पूर्ण रूप से पेड़ बनने के बाद मिलता है. इसके फल आकर्षक लाल रंग के दिखाई देते हैं. जिनका गुदा सफ़ेद नर्म और रसीला होता है.

अलेक्जेंडर

आडू की इस किस्म के पौधे अधिक पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के पौधों पर फल जून महीने के आसपास पकते हैं. पकने के बाद इसके फलों का रंग हल्का पीला दिखाई देने लगता हैं. इस किस्म के फलों का गुदा कुरकुरा और स्वादिष्ट होता है. इसके फल फूल लगने के लगभग 4 महीने बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके एक पौधे का शुरुआती उत्पादन 20 किलो के आसपास पाया जाता है.

रैड हैवन

उन्नत किस्म का पौधा

आडू की इस किस्म के फल सामान्य मोटाई के होते हैं. जो जून महीने की शुरुआत में पकना शुरू हो जाते हैं. इस किस्म का प्रति पौधा उत्पादन 80 से 100 किलो तक पाया जाता है. इसके फलों का रंग हल्का लाल दिखाई देता है. जिन पर कम मात्रा में रोएं दिखाई देते हैं. इस किस्म के फलों का गुदा गुठली के पास से कठोर पाया जाता है.

फ्लोरिडा प्रिंस

आडू की ये एक विदेशी किस्म है, जिसे यू.एस. से मंगाया गया है. इस किस्म के पौधे जल्द पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इसके फल फूल आने के लगभग 70 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके पूर्ण रूप से तैयार एक वृक्ष से सालाना औसतन 100 किलो के आसपास फल प्राप्त होते हैं. इसके फलों का गुदा नरम और स्वादिष्ट होता है.

एलटन

आडू की इस किस्म के पौधे पछेती पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इसके पौधों पर फल जून के आखिरी सप्ताह में पकना शुरू होते हैं. इसके फलों पर हल्के रोएं पाये जाते हैं. इसके फलों का रंग हल्का पीला दिखाई देता है. जिसका गुदा हल्का खट्टा और स्वादिष्ट होता है.

शान ई पंजाब

आडू की इस किस्म को भारत में ही तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे मई महीने में पैदावार देना शुरू कर देते हैं. इस किस्म के फलों का रंग पीला और गहरा लाल पाया जाता है. इसके फलों में गुठली नही पाई जाती. इसके फल पकने के बाद हल्के कठोर होने के कारण इन्हें ज्यादा दूर तक ले जाया जा सकता है. इस किस्म के फलों का प्रति पौधा उत्पादन 70 किलो के आसपास पाया जाता है.

सहारनपुर प्रभात

आडू की ये एक संकर किस्म है. जिसके पौधों को ठंडे मौसम की जरूरत कम होती है. इस किस्म के फल आकर्षक लाल रंग के होते हैं. जिनका गुदा मीठा और स्वादिष्ट होता है. इसके गुदे का रंग सफ़ेद दिखाई देता है. इस किस्म के पौधों पर फल अप्रैल माह के आखिरी तक पककर तैयार हो जाते हैं.

वर्ल्डस अलएस्ट

आडू की ये एक विदेशी किस्म है. जिसके फल छोटे और मध्यम आकार वाले होते हैं. इसके फल बाहर से कलियों में बटा हुआ दिखाई देता है. इसके फलों का गुदा हल्का बादामी रंग का होता है. जो हल्की खटास के साथ रसीला होता है. इसके फल जून के आखिर में पकना शुरू होते हैं.

इनके अलावा और भी कई किस्में बाज़ार में उपलब्ध हैं. जिन्हें अलग अलग  वातावरण के हिसाब से सम्पूर्ण भारत में उगाया जाता है. जिनमें आगरा,  चाइना फ्लैट, पेशावरी,डबल फ्लावरिंग, जे.एच.हेल, हरदोई, फार्चूना, हालफोर्ड, तोतापरी, क्रोफोर्ड अर्ली, फ्लोरिडाज़ ओन, अलबर्टा और डाक्टर हाग जैसी कई किस्में शामिल हैं.

खेत की तैयारी

आडू की खेती के लिए खेत की तैयारी के वक्त शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर दें. अवशेषों को नष्ट करने के बाद खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में मौजूद ढेलों को रोटावेटर के माध्यम से भुरभुरी मिट्टी में बदल दें. मिट्टी को भुरभुरा बनाने के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल बना लें. ताकि बारिश के मौसम में जल भराव जैसी समस्या का सामना ना करना पड़ता.

आडू के पौधों को खेत में गड्डे तैयार कर लगाया जाता है. खेत में गड्डे बनाने के दौरान इन गड्डों का आकार एक मीटर चौड़ाई और दो से ढाई फिट गहराई का होना चाहिए. गड्डों को तैयार करते वक्त प्रत्येक गड्डों के बीच 5 से 7 मीटर की दूरी रखते हुए पंक्तियों में तैयार किया जाता है. और प्रत्येक पंक्तियों के बीच लगभग 5 से 6 मीटर की दूरी होनी चाहिए.

गड्डों के तैयार होने के बाद उनमें उचित मात्रा में जैविक और रासायनिक उर्वरक को मिट्टी में मिलाकर भर देते हैं. गड्डों को भरने के बाद उनकी गहरी सिंचाई कर उन्हें पुलाव या सुखी घास से ढक देते हैं. जिससे मिट्टी और खाद अच्छे से अपघटित हो जाते हैं. इन गड्डों को पौध रोपाई से एक महीने पहले तैयार किया जाता है.

पौध तैयार करना

आडू के पौधों को बीज और कलम के माध्यम से पहले नर्सरी में तैयार किया जाता है. बीज के माध्यम से पौध तैयार करने पर पौधों में मातृवृक्ष के गुण कम देखने को मिलते हैं. और पौधे फल भी काफी समय बाद देना शुरू करते हैं. इस कारण इन्हें कलम के माध्यम से तैयार किया जाता है. कलम के माध्यम से पौध तैयार करने के लिए कलम रोपण और ग्राफ्टिंग की विधि का इस्तेमाल किया जाता हैं. इन दोनों विधियों से पौध तैयार करने के बारें में अधिक जानकारी आप हमारे इस आर्टिकल से हासिल कर सकते हैं.

इसके अलावा वर्तमान में सरकार द्वारा रजिस्टर्ड कई नर्सरी और संस्थाएं हैं, जो इसकी पौध किसान भाइयों को कम दाम पर देती है. नर्सरी से ख़रीदे गए पौधे जल्द ही पैदावार देना शुरू कर देते है. इससे किसान भाइयों की मेहनत और समय दोनों का बचाव हो जाता है. लेकिन नर्सरी से पौध खरीदते वक्त ध्यान रखे की केवल उन्ही पौधों को खरीदें जो पौधा एक साल से ज्यादा उम्र का हो और अच्छे से विकास कर रहे हों. साथ ही उन पर किसी तरह का कोई रोग भी ना लगा हों.

पौध रोपाई का तरीका और टाइम

आडू के पौधों की रोपाई

आडू के पौधों को खेत में तैयार किये गए गड्डों में लगाया जाता है. इसके लिए पहले गड्डों के बीचोंबीच एक छोटे आकार का गड्डा तैयार कर लें. छोटे गड्डे तैयार करने के बाद उन्हें बाविस्टिन या गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए. उसके बाद पौधों की पॉलीथीन को हटाकर उन्हें गड्डों में लगा दें. पौधों को गड्डों में लगाने के बाद उनके चारों तरफ जड़ से एक सेंटीमीटर ऊंचाई तक मिट्टी डालकर अच्छे से दबा दें.

आडू के पेड़ो को सर्दी के मौसम में लगाना अच्छा होता है. इस दौरान इसके पौधों को दिसम्बर और जनवरी माह में उगाना चाहिए. इसके अलावा अधिक ठंडे पर्वतीय प्रदेशों में इन्हें फरवरी माह में भी उगा सकते है.

पौधों की सिंचाई

आडू के पौधों को सामान्य सिंचाई की जरूरत होती है. शुरुआत में इसके पौधों को खेत में लगाने के तुरंत बाद पानी दे देना चाहिए. सर्दियों के मौसम में आडू के पौधों को सिंचाई की कम आवश्यकता होती है. इस दौरान पौधों को महीने में दो बार पानी देना काफी होता है. जबकि गर्मियों के मौसम में इसके पौधों को सप्ताह में एक बार पानी देना अच्छा होता है.

आडू के पूर्ण रूप से तैयार पेड़ो को साल में 10 से 12 सिंचाई की जरूरत होती है. इनमें से ज्यादातर सिंचाई पेड़ो पर फल बनने के दौरान की जाती है. इसके पेड़ो पर जब फल बन रहे हों तब पेड़ो की हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए. इससे फलों का आकार अच्छा बनता है. लेकिन जब फल पकने लगे तब सिंचाई कुछ दिन पहले बंद कर देनी चाहिए. इससे फलों की गुणवत्ता अच्छी बनती है.

उर्वरक की मात्रा

आडू के पौधों को बाकी बागवानी फसलों की तरह सामान्य मात्रा में उर्वरकों की जरूरत होती है. इसके लिए शुरुआत में गड्डों की तैयारी के वक्त प्रत्येक गड्डों में लगभग 10 से 15 किलो पुरानी गोबर की खाद और 400 से 500 ग्राम एन.पी.के. की मात्रा को मिट्टी में मिलाकर गड्डों में भर दें. पौधों को उर्वरक की ये मात्रा दो से तीन साल तक देनी चाहिए.

लेकिन जब पौधा बड़ा हो जाये तब पौधों को दी जाने वाली उर्वरक की इस मात्रा को पौधों के विकास के साथ साथ बढ़ा देनी चाहिए. जब आडू का पौधा फल देना शुरु कर दें तब प्रत्येक पेड़ो को सालान 25 किलो के आसपास जैविक खाद और एक किलो रासायनिक खाद देना चाहिए. इससे पेड़ो के विकास और पैदावार दोनों पर फर्क देखने को मिलता है. पेड़ो को उर्वरक की ये मात्रा फूल बनने से पहले नवम्बर या दिसम्बर माह के शुरुआत में देना अच्छा होता है.

पौधों की देखभाल

आडू के पौधों को देखभाल की खास जरूरत होती है. इसके लिए शुरुआत में पौधों को खेत में लगाने के बाद खेत की तारबंदी कर दें. ताकि आवारा पशु पौधों को नुक्सान ना पहुंचा पाये. इसके अलावा पौधों को अच्छा आकार देने के लिए शुरुआत में एक मीटर की लम्बाई तक पौधों पर किसी भी तरह की शाखा को जन्म ना लेने दें. इससे पौधे का तना भी मजबूत बनता है.

जब पौधे फल देना शुरू कर दें तब उनकी उचित समय पर कटाई छटाई कर देखभाल करनी चाहिए. कटाई छटाई के दौरान पेड़ो पर मौजूद रोग ग्रस्त और सूखी हुई डालियों को निकाल देना चाहिए. इससे पेड़ो में नई शाखाओं का निर्माण होता है. जिससे पेड़ो की पैदावार में भी फर्क देखने को मिलता है. आडू के पेड़ो की कटाई छटाई उन पर फूल बनने से लगभग एक महीने पहले उर्वरक देने के दौरान कर देनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

आडू के पौधों में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक तरीके से करना अच्छा होता है. इसके लिए पौधों को खेत में लगाने के बाद शुरुआत में उनकी हर महीने हल्की गुड़ाई करते रहना चाहिए. जब इसका पौधा पूर्ण रूप से तैयार हो जाता हैं तब इसके पौधे को साल में दो गुड़ाई की ही जरूरत होती है. इसके अलावा पौधों के बीच मौजूद खाली जमीन में अगर किसी तरह की कोई फसल ना उगाई गई हो तो बारिश के बाद जब जमीन सूख जाने पर खेत की जुताई कर देनी चाहिए. इससे खाली जमीन में खरपतवार जन्म नही ले पाती हैं.

अतिरिक्त कमाई

आडू के पौधों को खेत में लगाने के तीन से चार साल बाद पैदावार प्राप्त होती है. इस दौरान किसान भाई खेत में खाली पड़ी भूमि में सब्जी, मसाले, औषधीय और कम समय की बागबानी फसलों को उगाकर अच्छी कमाई कर सकता है. इससे किसान भाइयों को उनके खेत से पैदावार भी मिलती रहती है. और उन्हें किसी तरह की आर्थिक समस्या का सामना भी नही करना पड़ता.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

आडू के पौधों में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी अगर वक्त रहते देखभाल ना की जाए तो पौधों में काफी नुक्सान देखने को मिलता है.

लीफ कर्ल

लीफ कर्ल रोग को पत्ती मरोड़ के नाम से भी जाना जाता है. आडू के पौधों पर लगने वाला ये एक कीट जनित रोग है. जिसका प्रभाव पौधों पर फरवरी से अप्रैल माह के बीच दिखाई देता है. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों का रस चूसते हैं. जिससे पौधे की पत्तियां सिकुड़ने लगती है. और कुछ दिन बाद पीली पड़कर नीचे गिर जाती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पेड़ो पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और थिरम की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

ग्रे फल सड़ांध

आडू में ग्रे फल सड़ांध रोग

आडू के पौधों में ग्रे फल सड़ांध का रोग फलों के पकने के दौरान लगता है. इस रोग के लगने से आडू के फलों का रंग गहरा भूरा दिखाई देने लगता है. और कुछ दिन बाद फल अपने आप टूटकर गिर जाता है. लेकिन इस दौरान रोग ग्रस्त फल के संपर्क में अगर कोई और फल आ जाता है तो वो संक्रमित हो जाता है. जिससे रोग सम्पूर्ण वृक्ष पर फैल जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए जिस फल में रोग दिखाई दे उसे तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए. इसके अलावा बोर्डेक्स तरल मिश्रण की उचित मात्रा का छिडकाव पेड़ो पर करना चाहिए.

स्केल कीट

स्केल कीट का प्रभाव पौधों पर खरीफ की फसलों के वक्त अधिक देखने को मिलता है. इस रोग के कीट पेड़ो की कोमल शाखाओं का रस चूसते हैं. जिससे पौधे विकास करना बंद कर देते है. और रोग का प्रभाव बढ़ने पर रोग फफूंदी का रूप धारण कर लेता है. जिससे पौधा जल्द नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पेड़ो पर मिथाइल डिमेटान या डाईमेथोएट की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

गोंदिया रोग

आडू के पौधों में गोंदिया रोग पोषक तत्वों की कमी की वजह से देखने को मिलता है. आडू के पौधों में ज्यादातर ये रोग बारिश के मौसम में देखने को मिलता है. जिसके लगने से फलों की गुणवत्ता में कमी देखने को मिलती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पेड़ो पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और बोरेक्स की उचित मात्रा का छिडकाव फूल आने से पहले 20 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.

जड़ सडन

आडू के पौधों में जड़ सडन का रोग जल भराव की वजह से देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे शुरुआत में मुरझाने लगते हैं. उसके बाद पौधे की पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है. और वो सूखकर गिरने लगती है. जिसे पौधा जल्द ही नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए खेत में जल भराव ना होने दें. और पेड़ो की जड़ों में बोर्डों मिश्रण की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

माहू

आडू के पौधों में माहू रोग का प्रकोप मौसम परिवर्तन के दौरान मार्च से मई महीने में देखने को मिलता है. इस रोग के कीट पौधे पर समूह में आक्रमण कर पौधों के कोमल भागों का रस चूसते हैं. जिससे पौधे की पत्तियां समय से पहले पीली पड़कर गिरने लग जाती है. जिससे पौधा विकास करना बंद कर देता है. इस रोग की रोकथाम के लिए रोगोर 30 ई सी की उचित मात्रा का छिडकाव पेड़ो पर करना चाहिए.

फलों की तुड़ाई और छटाई

आडू के पौधे खेत में लगाने के तीन से चार साल बाद पैदावार देना शुरू करते हैं. आडू की विभिन्न किस्मों के पेड़ो की तुड़ाई अप्रैल से जुलाई महीने तक की जाती है. आडू के फलों को पूरी तरह पकने के बाद ही तोड़ना चाहिए. क्योंकि पकने से पहले तोड़ने पर फलों की गुणवत्ता कम हो जाती है. और बाज़ार भाव भी कम मिलता है. आडू का पूरी तरह पका हुआ फल हल्का नर्म दिखाई देने लगता हैं.

आडू के फलों की तुड़ाई जब फलों का रंग किस्म के आधार पर आकर्षक और नर्म दिखाई दे तब करनी चाहिए. इसके फलों की तुड़ाई के बाद उनकी छटाई की जाती है. छटाई के दौरान इसके अधिक नर्म फलों को अलग कर लेना चाहिए. अधिक पके फलों को नजदीक के बाज़ारों में बेचना चाहिए. जबकि कम नर्म फलों को दूर के बाज़ार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए.

पैदावार और लाभ

आडू के वृक्ष शुरुआत में 10 से 15 किलो उपज देते हैं. लेकिन पेड़ो के विकास के साथ साथ इनका उत्पादन बढ़ता जाता है. 10 से 15 साल बाद पूर्ण रूप से तैयार एक वृक्ष से सालान औसतन 80 किलो के आसपास फल प्राप्त होते हैं. जबकि एक हेक्टेयर में 400 के आसपास पौधे लगाए जा सकते हैं. जिनका कुल उत्पादन 32000 किलो के आसपास पाया जाता है. अगर एक किलो आडू का बाज़ार भाव 10 रूपये किलो भी लगाया जाए तो भी किसान भाइयों को सालान एक हेक्टेयर से तीन लाख से भी ज्यादा की कमाई होती है.  जबकि बाज़ार में आडू का भाव लगभग 40 रूपये प्रति किलो के आसपास पाया जाता है.

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