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मटर की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

मटर की खेती दलहनी फसल के रूप में की जाती है. जिसको प्रमुख व्यापारिक दलहनी फसल माना जाता है. मटर के दानो का इस्तेमाल सूखाकर और ताज़ा हरे रूप में किया जाता है. इसका खाने में ज्यादा इस्तेमाल सब्जियों के साथ में किया जाता है. मटर के अंदर प्रोटीन के साथ साथ विटामिन, फास्फोरस और आयरन जैसे तत्व भी काफी मात्रा में पाए जाते हैं. जो मानव शरीर के लिए काफी ज्यादा उपयोगी होते हैं.

मटर की खेती

मटर का पौधा एक द्विबीजपत्री पौधा है. इसका पौधा लगभग एक मीटर तक की लम्बाई का होता है. मटर के पौधों पर दाने फलियों में पाए जाते हैं. मटर की खेती के लिए गहरी दोमट मिट्टी की जरूरत होती है. इसकी खेती के लिए अधिक बारिश की भी जरूरत नही होती. भारत में इसकी खेती दो तरीके से की जाती है. जिसमें कुछ किसान भाई कच्ची फसल के रूप में इसकी फलियों को बेचने के लिए करते हैं. जबकि कुछ किसान भाई इसके दानो को पकाकर बेचने के लिए उगाते हैं. ताकि उन्हें अधिक लाभ मिल सके.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

मटर की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक पैदावार लेने के लिए इसे गहरी दोमट मिट्टी में उगाना चाहिए. क्षारीय गुण रखने वाली भूमि में इसकी खेती नही करनी चाहिए. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 6 से 7.5 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

मटर की खेती के लिए समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. भारत में इसकी खेती रबी की फसलों के साथ की जाती है. क्योंकि इसके पौधे ठंड के मौसम में अच्छे से विकास करते हैं. और मटर के पौधे सर्दियों में पड़ने वाले पाले के प्रति सहनशील होते हैं. इसके पौधे गर्मी के मौसम में बहुत कम पैदावार देते हैं. और इसके पौधों को बारिश की ज्यादा जरूरत नही होती.

मटर के पौधों को अंकुरित होने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. लेकिन इसके पौधों और पौधों पर बनने वाली फलियों को पकने और विकास करने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है. मटर के पौधे अधिकतम 25 और न्यूनतम 5 डिग्री तापमान पर भी आसानी से विकास कर लेते हैं.

उन्नत किस्में

मटर की कई तरह की किस्में हैं. जिन्हें उनकी उत्पादन क्षमता और बुवाई के समय के आधार पर तैयार किया गया है.

आर्केल

मटर की ये एक उन्नत किस्म है. जिसके बीज झुर्रीदार रूप में दिखाई देते हैं. इसके पौधे अधिकतम डेढ़ फिट की ऊंचाई के पाए जाते हैं. मटर की इस किस्म को हरी फलियों और पैदावार के रूप में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 55 से 60 दिन बाद पहली फली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं.

लिंकन

मटर की इस किस्म के पौधे बौने दिखाई देते हैं. जिसकी पत्तियां गहरे हरे रंग की होती है. इस किस्म के पौधों की फलियां हरी और सिरे के पास से कुछ मुड़ी हुई होती हैं. इस किस्म के पौधों की फलियों में 8 से 10 दाने पाए जाते हैं. जिनका स्वाद काफी मीठा होता है. इस किस्म को पहाड़ी इलाकों में उगाने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के 80 से 90 दिन बाद पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं.

बोनविले

मटर की इस किस्म के पौधे मध्यम लम्बाई के होते हैं. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग दो महीने बाद पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की फलियों का रंग हल्का हरा जबकि फलियों में पाए जाने वाले बीज गहरे हरे के होते हैं. जिनका स्वाद मीठा होता है. इस किस्म के पौधों से हरी फलियों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 100 से 120 क्विंटल तक पाया जाता है. जबकि इसके पूर्ण पके दानो की पैदावार 12 से 15 क्विंटल तक पाई जाती है.

मालवीय मटर – 2

मटर की इस किस्म को पूर्वी मैदानी भागों में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर सफेद फफूंद और रतुआ रोग नही लगता. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 से 130 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25 से 30 क्विंटल तक पाया जाता है.

पंजाब 89

मटर की इस किस्म पर फलियां जोड़े में लगती है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 80 से 90 दिन बाद पहली फली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसकी फलियों का रंग गहरा हरा दिखाई देते हैं. इसकी फलियों में दानो की मात्रा 55 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 60 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

ए. पी. 3

उन्नत किस्म का पौधा

मटर की ये एक जल्द पकने वाली किस्म है. जिसकी पैदावार सामान्य होती है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 70 दिन बाद पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 से 35 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

पी. जी. 3

पी. जी. 3 मटर की एक अगेती किस्म है. जिसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 40 से 60 क्विंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर सफेदी और फली छेदक रोग का प्रभाव देखने को नही मिलता. इस किस्म के पौधों की फलियों में पाए जाने वाले दानो का रंग हल्का सफ़ेद क्रीम कलर जैसा दिखाई देता है. इस किस्म के दानो का इस्तेमाल सब्जी के रूप में करना ज्यादा उचित होता है.

पूसा प्रभात

पूसा प्रभात मटर की एक जल्दी पकने वाली किस्म है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 100 से 110 दिन में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म को उत्तर भारत के पूर्वी राज्यों में अधिक उगाया जात है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 40 से 50 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

पंत 157

मटर की ये एक संकर किस्म है. जिसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 70 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर चूर्णी फफूंदी और फली छेदक रोग देखने को नही मिलता. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 125 से 130 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है.

वी एल 7

मटर की ये एक अगेती किस्म है. इस किस्म के पौधे कम ठंड में भी आसानी से विकास कर लेते हैं. इस किस्म के दानो का रंग हल्का हरा होता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 70 से 80 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर चूर्णिल आसिता का प्रभाव देखने को नही मिलता.

खेत की तैयारी

मटर की खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी है. इसके लिए शुरुआत में खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें. खेत को खुला छोड़ने के बाद उसमें पुरानी गोबर की खाद डालकर उसकी दो से तीन गहरी जुताई कर दें. ताकि गोबर की खाद मिट्टी में अच्छे से मिल जाए. उसके बाद खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर देना चाहिए. खेत का पलेव करने के बाद जब उसकी मिट्टी हलकी सूखने लगे तब उसकी फिर जुताई कर दे. इससे खेत में निकलने वाली खरपतवार भी नष्ट हो जाती है. और मिट्टी भी भुरभुरी हो जाती है. खेत की जुताई के बाद खेत में पाटा चलाकर मिट्टी को समतल बना देना चाहिए.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

मटर की खेती सर्दियों के मौसम में रबी की फसलों के साथ की जाती है. इसके बीजों की रोपाई से पहले उन्हें उपचारित कर लेना चाहिए. बीजों को उपचारित करने के लिए राइजोबियम की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए. इसके अलावा मिट्टी को थीरम या कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए.

मटर की खेती

मटर के बीजों की रोपाई समतल भूमि में ड्रिल के माध्यम से की जाती है. ड्रिल के माध्यम से इसके बीजों की रोपाई पंक्तियों में की जाती है. इसके लिए प्रत्येक पंक्तियों के बीच लगभग एक फिट की दूरी रखनी चाहिए. और पंक्तियों के बीच इसके दानो की रोपाई लगभग 5 से 7 सेंटीमीटर की दूरी पर करनी चाहिए. एक हेक्टेयर में खेती के लिए मटर के 80 से 100 किलो बीज की मात्रा काफी होती है.

मटर के बीजों की रोपाई अगेती और पछेती किस्म के आधार पर अलग अलग समय पर की जाती है. इसकी अगेती किस्म के बीजों की रोपाई के लिए मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर तक का समय सबसे उपयुक्त होता है. इसके अलावा पछेती किस्मों के बीजों की रोपाई नवम्बर माह के आखिर तक की जा सकती है.

पौधों की सिंचाई

मटर के बीजों की रोपाई नम भूमि में की जाती है. लेकिन जो किसान भाई इसकी रोपाई सूखी जमीन में करते हैं. उन्हें बीज रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई कर देनी चाहिए. उसके बाद बीज अंकुरित होने तक नमी बनाए रखना चाहिए. लेकिन नम भूमि में इसके बीजों की सिंचाई बीज रोपाई के लगभग 15 से 20 दिन बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद 20 दिन के अंतराल में सिंचाई करते रहना चाहिए. लेकिन जब पौधे पर फलियां बनती है. उस दौरान पाले से बचाने के लिए हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

मटर की खेती के लिए उर्वरक की उचित मात्रा का होना जरूरी होता है. इसके लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को खेत में डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में खेत की आखिरी जुताई के वक्त लगभग दो बोरे एन.पी.के. की मात्रा का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा बीज रोपाई के बाद सिंचाई के साथ लगभग 25 किलो यूरिया प्रति एकड़ के हिसाब से खेतों में देना चाहिए. इससे फलियां अच्छी बनती है. और पैदावार भी ज्यादा मिलती है.

खरपतवार नियंत्रण

मटर की खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक और रासायनिक तरीके से किया जाता है. रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए लिन्यूरान की उचित मात्रा का छिडकाव बीज रोपाई के तुरंत बाद कर देना चाहिए. जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण करने के लिए इसके बीजों की रोपाई के लगभग 25 से 30 दिन बाद पौधों की नीलाई गुड़ाई कर देनी चाहिए. मटर के पौधों में दो से तीन गुड़ाई काफी होती है. बाकी की गुड़ाई पहली गुड़ाई के बाद 15 दिन के अंतराल में कर देनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

मटर के पौधों में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी उचित टाइम रहते रोकथाम नहीं होने पर पैदावार को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचता है.

रतुआ

इस रोग के लगने पर पौधों की पतियों पर पीले रंग के फफोले नजर आते हैं. जो धीरे धीरे पूरे पौधे पर फैल जाते हैं. जिससे पौधे की पत्तियां पीली होकर गिरने लगती है. और पौधा जल्द सूखकर नष्ट हो जाता है. मटर के पौधों पर इस रोग की रोकथाम के लिए उन्हें समय पर उगाना चाहिए. इसके अलावा पौधों पर नीम के तेल या काढ़े का छिडकाव उचित मात्रा में करने से लाभ मिलता है.

चूर्णी फफूंदी

पौधों पर लगने वाला ये रोग पौधों पर नीचे की तरफ से ऊपर की तरफ बढ़ता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. जिनका आकार रोग बढ़ने के साथ साथ बढ़ता है. जिससे पौधों का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

तुलासिता

मटर के पौधे पर इस रोग का प्रभाव पौधों की पत्तियों के दोनों तरफ देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं जबकि नीचे की सतह पर रूई जैसी सफ़ेद फफूंद दिखाई देने लगती है. जिसकी वजह से पौधों का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मैन्कोजेब या जिनेब की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

चेपा

मटर के पौधों पर लगने वाले इस रोग को माहू के नाम से भी जाना जाता है. इस रोग के किट छोटे आकार के होते हैं. जिनका रंग हरा और पीला होता है. इस रोग के किट पौधों पर समूह में दिखाई देते हैं. जो पौधों का रस चूसकर उनके विकास को रोक देते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फली छेदक

फली छेदक रोग

मटर के पौधों पर लगने वाला ये एक खतरनाक रोग है जो इसकी पैदावार को काफी ज्यादा नुकसान पहुँचाता है. इस रोग के कीट का लार्वा मटर की फली में घुसकर उसे अंदर से खराब कर देता है. जिससे फली के लगभग सभी बीज खराब हो जाते हैं. इस रोग के लगने पर पौधों पर कार्बारिल या क्लोरपाइरीफास की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फसल की कटाई और मढ़ाई

मटर की खेती कच्ची फलियों और दानो की पैदावार के रूप में की जाती है. कच्ची फलियों के रूप में इसकी खेती करने पर इसकी फलियों की तुड़ाई समय समय पर करते रहना चाहिए. जिन्हें दानो के पूरी तरह से पकने से पहले तोड़ लेना चाहिए. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 130 से 140 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिन्हें काटकर सूखा लिया जाता है. और जब पौधे सुख जाते हैं तब उनकी फलियों से दानो को निकाल लिए जाते है. इसके लिए वर्तमान में कई तरह की मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

पैदावार और लाभ

मटर की विभिन्न किस्मों के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 से 25 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. जिसका बाज़ार भाव दो से तीन हज़ार प्रति क्विंटल के आसपास पाया जाता है. जिससे किसान भाइयों की एक बार में एक हेक्टेयर से 50 से 70 हज़ार रूपये तक की कमाई आसानी से हो जाती है.

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