औषधि

ईसबगोल की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

ईसबगोल की खेती औषधीय पौधे के रूप में की जाती है. इसके दानो का इस्तेमाल कई तरह की बिमारियों में किया जाता है. लेकिन ज्यादा इस्तेमाल पेट संबंधित बीमारियों में किया जाता है. बीमारियों के अलावा इसका इस्तेमाल और भी कई तरह की चीजों को बनाने में किया जाता है. जिनमें आइसक्रीम और रंग रोगन के सामान को बनाने में किया जाता है.

ईसबगोल की खेती

ईसबगोल के पौधे तीन से चार फिट की ऊंचाई के पाए जाते हैं. इसके पौधे झाडी की तरह दिखाई देते हैं. जिन पर गेहूं की तरह बाली दिखाई देती है. इसके पौधों की पत्तियां धान के पौधों की तरह होती है. भारत में ईसबगोल की खेती पंजाब, हरियाणा, गुजरात,राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में की जाती है.

ईसबगोल के पौधों को विकास करने के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की जरूरत होती है. इसके पौधों को बारिश की ज्यादा जरूरत नही होती. क्योंकि बारिश के होने से इसकी पैदावार परभावित होती है. इसकी खेती के लिए सामान्य मौसम सबसे उपयुक्त होता है. ईसबगोल की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है.

अगर आप भी इसकी खेती कर अच्छा लाभ कमाना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

ईसबगोल की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि सबसे उपयुक्त होती है. इसके पौधे अधिक नमी वाली भूमि में विकास नही कर सकते. इसके पौधों को विकास करने के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

ईसबगोल की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. भारत में इसकी खेती रबी की फसलों के साथ की जाती है. इसके पौधे को बारिश की जरूरत शुरुआत में होती है. फसल के पकने के दौरान होने वाली बारिश इसके पौधों को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाती है. इसके पौधों को पकने के दौरान अधिक गर्मी की जरूरत होती है.

ईसबगोल की खेती में तापमान और मौसम का ख़ास प्रभाव देखने को मिलता है. इसके पौधों को विकास करने के लिए शुरुआत में सामान्य तापमान की जरूरत होती है. उसके बाद जब पौधे पर फलियाँ आ जाएँ तब इसके पौधों को तापमान की ज्यादा जरूरत होती है.

उन्नत किस्में

ईसबगोल की कई तरह की उन्नत किस्में मौजूद हैं. इन किस्मों को फसल के पकने की अवधि और पैदावार के आधार पर तैयार किया गया ही.

जवाहर ईसबगोल 4

ईसबगोल की इस किस्म को कैलाश नाथ काटजू उद्यानिकी महाविद्यालय, मंदसौर द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद पककर तेयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 15 क्विंटल तक पाया जाता है.

आर.आई. 89

ईसबगोल की इस किस्म के पौधे आकार में छोटे दिखाई देते हैं. जिनका आकर एक से डेढ़ फिट के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12  से 16 क्विंटल तक देखने को मिलता है.

गुजरात ईसबगोल 2

उन्नत किस्म का पौधा

ईसबगोल की इस किस्म को अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगंधित पौध परियोजना, आणंद ( गुजरात ) द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 9 से 10 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. ईसबगोल की इस किस्म को गुजरात में सबसे ज्यादा उगाया जाता है.

हरियाणा ईसबगोल 5

ईसबगोल की इस किस्म का निर्माण चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 90 से 110 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 10 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

आई. आई. 1

ईसबगोल की इस किस्म को अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. जिसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 से 16 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनकी लम्बाई डेढ़ फिट के आसपास पाई जाती है.

इनके अलावा और भी कई किस्में हैं जिन्हें अलग अलग जगहों पर उगाने के लिए तैयार किया गया है. जिनका उत्पादन भी बाकी किस्मों की तरह ही देखने को मिला है.

खेत की तैयारी

ईसबगोल की खेती के लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर देनी चाहिए. उसके बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी छोड़कर उसका पलेव कर दें.

पलेव करने के बाद जब मिट्टी की ऊपरी सतह सूखकर भूरी दिखाई देने लगे तब खेत की रोटावेटर चलाकर गहरी जुताई कर दें. इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी दिखाई देने लगती है. उसके बाद खेत में पाटा चलाकर मिट्टी को समतल बना दें. ताकि खेत में पानी भराव जैसी समस्या का सामना नही करना पड़े. ईसबगोल के बीजों की रोपाई खेत में समतल और मेड दोनों पर की जाती है. मेड पर रोपाई करने के लिए खेत में उचित दूरी पर मेड तैयार कर लेनी चाहिए.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

ईसबगोल के बीजों की रोपाई से पहले उन्हें उपचारित कर लेना चाहिए. इसके बीजों को उपचारित करने के लिए मेटालेक्जिल की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए. एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए चार से 5 किलो बीज की मात्रा उपयुक्त होती है. ईसबगोल के बीजों की रोपाई समतल भूमि और मेड दोनों तरह की भूमि पर की जाती है. समतल भूमि में बीज़ रोपाई करने के लिए छिडकाव विधि का इस्तेमाल किया जाता है. जबकि मेड पर रोपाई के के लिए ड्रिल विधि का इस्तेमाल किया जाता है.

बीज रोपाई का तरीका

समतल खेत में छिडकाव विधि से बीजों की रोपाई के लिए पहले खेत में बीज की उचित मात्रा को समतल भूमि में छिड़क दें. उसके बाद कल्टीवेटर के पीछे हल्का पाटा बाँधकर खेत की दो हल्की जुताई कर दें. इससे ईसबगोल के बीज अच्छे से मिट्टी में मिल जाते हैं. जबकि ड्रिल के माध्यम से इसके बीजों की रोपाई पंक्तियों में की जाती है. प्रत्येक पंक्तियों के बीच एक फिट के आसपास दूरी रखते हुए इसकी मेड तैयार की जाती है. मेड पर इसके बीजों की रोपाई 5 सेंटीमीटर के आसपास दूरी रखते हुए की जाती है.

ईसबगोल के बीजों की रोपाई उचित समय पर की जानी जरूरी है. क्योंकि इसके बीजों की अगेती या पछेती रोपाई करने पर इसके पौधों में कई तरह के रोग लग जाते हैं. जिनकी वजह से पैदावार में काफी कमी देखने को मिलती है. इस कारण इसके बीजों की रोपाई अक्टूबर माह के आखिरी सप्ताह से नवम्बर माह के मध्य तक कर देनी चाहिए.

पौधों की सिंचाई

ईसबगोल के पौधों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत नही होती. लेकिन इसके बीजों की रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए. उसके बाद अगर बीजों का अंकुरण कम मात्रा में हो तो खेत की चार से पांच दिन बाद एक बार फिर से हल्की सिंचाई कर दें. ताकि बीजों का अंकुरण सम्पूर्ण तरीके से हो सके. बीजों के अंकुरण के बाद इसके पौधों को पानी की कम ही जरूरत होती है. इसके बीजों के अंकुरण के बाद इसके पौधों को दो से तीन सिंचाई की जरूरत होती है. इसके बीजों के अंकुरण के बाद पहली सिंचाई 30 से 35 दिन बाद करनी चाहिए. और दूसरी सिंचाई, पहली सिंचाई के लगभग 20 से 30 दिन बाद करनी चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

ईसबगोल के पौधों की उर्वरक की सामान्य जरूरत होती है. इसके लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त लगभग 10 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में देना चाहिए. और रासायनिक खाद के रूप में एक बोरा एन.पी.के. की मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में आखिरी जुताई के वक्त छिड़क दें. इसके अलावा लगभग 25 किलो नाइट्रोजन की मात्रा को सिंचाई के वक्त छिडकाव कर पौधों को देनी चाहिए. इससे पैदावार अधिक मिलती है.

खरपतवार नियंत्रण

ईसबगोल की खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक और रासायनिक दोनों तरीकों से किया जाता है. रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए इसके बीजों की रोपाई के बाद सल्फोसल्फ्यूरॉन या आइसोप्रोट्यूरॉन की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए. जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए इसके पौधों की नीलाई गुड़ाई की जाती है. ईसबगोल के पौधों की दो नीलाई गुड़ाई करना काफी होता है. इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. जबकि दूसरी गुड़ाई, पहली गुड़ाई के 15 दिन बाद कर देनी चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

ईसबगोल के पौधों में कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन इनकी उचित टाइम रहते देखभाल नहीं की जाए तो पौधा जल्द ही नष्ट हो जाता है.

मृदुरोमिल आसिता

रोग लगा पौधा

ईसबगोल के पौधों पर मृदुरोमिल आसिता का रोग पौधे पर बाली निकलने के दौरान दिखाई देता है. इस रोग के लगने पर पौधों का विकास रुक जाता है. जिस कारण इसकी पैदावार पर भी फर्क देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का चूर्ण दिखाई देने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या मैंकोजेब की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

मोयला

ईसबगोल के पौधों पर लगने वाला ये रोग एक कीट जनित रोग है. जिसका प्रभाव बीज रोपाई के लगभग दो महीने बाद पौधों पर फूल बनने के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग के कीट इसके पौधों के कोमल भागों का रस चूसकर उन्हें काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाते है. इस रोग के लगने पर पौधा जल्दी ही सूखकर नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड या ऑक्सी मिथाइल डेमेटान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फसल की कटाई और मढाई

ईसबगोल के पौधों की कटाई बीज रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद की जाती है. इस दौरान इसके पौधों की पत्तियां पीली पड़कर सूखने लग जाती है. तब इसके पौधों की कटाई कर ली जाती है. इसके पौधों की कटाई सुबह के वक्त ही करनी चाहिए. क्योंकि सुबह के वक्त कटाई करने से इसकी बालियों से बीज काफी कम मात्रा में झड़ते हैं.

इसके पौधे की कटाई के बाद छोटे किसान भाई इसके दानो को बालियों को सुखाकर हाथ से मसलकर निकाल लेते हैं. जबकि बड़े किसान भाई इसके दानो को मशीनों की सहायता से निकालते हैं. क्योंकि इसकी भूसी भी बहुत कामयाब होती है. जिसका इस्तेमाल चारे के रूप में किया जाता है.

पैदावार और लाभ

ईसबगोल की खेती से किसान भाई अच्छीखासी कमाई कर रहे हैं. ईसबगोल की विभिन्न किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 10 से 12 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इसके दानो से मिलने वाली भूसी की मात्रा 20 से 30 प्रतिशत तक पाई जाती है. इसके दानो का बाज़ार भाव 8 हज़ार के आसपास पाया जाता है. जबकि इसकी भूसी का बाज़ार भाव मांग के हिसाब से अलग अलग पाया जाता है. जिस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से एक से डेढ़ लाख तक की कमाई आसानी से कर लेते हैं.

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