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पेठा की उन्नत खेती कैसे करें – पूरी जानकारी

पेठा एक कद्दू वर्गीय फल है. जिसको काशीफल, कुम्हड़ा और कूष्माण्ड के नाम से भी जाना जाता है. इसका पौधा लता के रूप में फैलकर बड़ा होता है. भारत में इसको सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में उगाया जाता है. जहां इसकी खेती को लोग जुआ खेती भी मानते हैं. क्योंकि अच्छा भाव मिलने पर इसकी खेती से किसानों की अच्छीखासी कमाई हो जाती है. लेकिन कम भाव होने पर इसकी लागत भी मिलनी मुश्किल हो जाती है.

पेठा की खेती

पेठा का खाने में इस्तेमाल कई तरीके से किया जाता है. इससे आगरा का पेठा ( मिठाई) बनती है, जिसकी अपनी एक ख़ास पहचान है. इसका ज्यादा इस्तेमाल इसी मिठाई को बनाने में किया जाता है. मिठाई बनाने में इसके पके हुए फलों का इस्तेमाल किया जाता है. जबकि इसके कच्चे फलों का इस्तेमाल सब्जी के रूप में किया जाता है.

पेठा की खेती कम खर्च में अधिक उत्पादन देने वाली होने की वजह से छोटे किसान भाई भी इसकी खेती आसानी से कर लेते है. इसकी खेती तीन से चार महीने की होती है. इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों गर्मी के मौसम में अच्छे से विकास करते है. अधिक बारिश इसकी खेती के लिए उपयोगी नही होती.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

पेठा की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अच्छी पैदावार लेने के लिए गर्मियों में उगाई जाने वाली किस्मों को भारी दोमट मिट्टी में उगा सकते हैं. और जायद की खेती के लिए रेतीली बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. क्योंकि इस दौरान बारिश अधिक होने से रेतीली बलुई दोमट मिट्टी में जल भराव नही हो पता. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 6 से 8 के बीच होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

पेठा की खेती उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले प्रदेशों में आसानी से की जा सकती है. भारत में इसकी खेती गर्मी और बारिश के मौसम में की जाती है. इसकी खेती के लिए ठण्ड का मौसम उपयुक्त नही होता. ठण्ड के मौसम में इसके पौधे विकास नही कर पाते. इसके पौधों को विकास करने के लिए गर्मी के मौसम की आवश्यकता होती है. इसके पौधों को बारिश की सामान्य जरूरत होती है. लेकिन फल बनने के दौरान अधिक बारिश होने से फल खराब हो जाते हैं.

इसके पौधों को शुरुआत में अंकुरित होने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. 15 डिग्री आसपास तापमान होने से इसके बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है. अंकुरित होने के बाद इसके पौधे 30 से 40 डिग्री तक के तापमान में आसानी से विकास कर लेते हैं. लेकिन इससे अधिक तापमान होने से पौधों का विकास रुक जाता है.

उन्नत किस्में

पेठा की कई तरह की उन्नत किस्में हैं. जिन्हें अधिक उत्पादन लेने के लिए तैयार किया गया है.

कोयम्बटूर 1

पेठा की इस किस्म को पछेती फसल के रूप में उगाया जाता है. जिसका इस्तेमाल सब्जी और मिठाई बनाने में किया जाता है. इसके एक फल का वजन 7 से 8 किलो के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 300 किवंटल तक पाई जाती है.

सी. ओ. 1

काशीफल की इस किस्म को दोनों मौसम में उगाया जा सकता हैं. इसके एक फल का वजन 7 से 10 किलो तक पाया जाता है. इस किस्म के पौधों बीज रोपाई के 120 दिन बाद फल देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 300 किवंटल के आसपास पाया जाता हैं.

कशी धवल

इस किस्म एक पौधे बीज रोपाई के 120 दिन बाद फल देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 500 से 600 किवंटल तक पाया जाता है. इसके एक फल का वजन 12 किलो के आसपास पाया जा है. इसके फलों का गुदा सफ़ेद रंग का होता है. इस किस्म की खेती ज्यादातर गर्मी के मौसम में ही की जाती है.

पूसा विश्वास

इस किस्म के पौधों की लम्बाई अधिक पाई जाती है. जो बीज रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 250 से 300 किवंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के फलों का गुदा मोटा और पीला रंग का होता है. इसके एक फल का वजन 5 किलो के आसपास पाया जाता है.

काशी उज्ज्वल

पेठा की इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के 115 से 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके फलों का आकर गोल दिखाई देता है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 550 से 600 किवंटल तक पाया जाता है. इसके एक फल का वजन 12 किलो के आसपास पाया जाता है. जिनका गुदा सफ़ेद रंग का दिखाई देता है.

अर्को चन्दन

उन्नत किस्म का पेठा

इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 130 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 350 किवंटल से ज्यादा पाया जाता है. इस किस्म के कच्चे फलों का इस्तेमाल सब्जी बनाने में किया जाता है. इसके फलों को अधिक समय तक भंडारित किया जा सकता है.

इसके अलावा और भी कई किस्में हैं जिन्हें अलग अलग समय पर अधिक उत्पादन लेने के लिए उगाया जाता है, जिनमे बी एस एस- 987, नरेन्द्र अग्रिम, कोयम्बटूर 2, कल्यानपुर पम्पकिन- 1, पूसा हाइब्रिड, नरेन्द्र अमृत,  बी एस एस- 988, आई आई पी के- 226, संकर नरेन्द्र काशीफल- 1 और सी एम 14 जैसी और भी कई किस्में शामिल हैं.

खेत की तैयारी

पेठा की खेती के लिए शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर दें. उसके बाद कुछ दिन खेत को खुला छोड़ दें. ताकि सूर्य की धूप से मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट नष्ट हो जाएँ. उसके बाद खेत में जैविक खाद के रूप में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन तिरछी जुताई कर दे.

अगर आप इसकी खेती ग्रीष्मकालीन फसल के रूप में कर रहे हो तो खेत की जुताई के बाद पानी चलाकर खेत का पलेव कर दें. खेत का पलेव करने के दो से तीन दिन बाद जब मिट्टी की ऊपरी सतह हल्की सुखी हुई दिखाई देने लगे तब खेत की रोटावेटर के माध्यम से जुताई कर खेत में पाटा लगा दें. उसके बाद खेत में 3 से 4 मीटर की दूरी रखते हुए धोरेनुमा क्यारी बना दें.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

पेठा के बीजों की रोपाई से पहले उन्हें उपचारित कर लेना चाहिए. बीजों को उपचारित करने के लिए थीरम या कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए. एक हेक्टेयर में खेती के लिए इसके लगभग 6 से 8 किलो बीज की मात्रा उपयुक्त होती है.

इसके बीजों की रोपाई खेत में तैयार की गई धोरेनुमा क्यारियों में मेड़ों पर अंदर की तरफ की जाती है. मेड़ों पर इसके बीजों की रोपाई के दौरान बीजों के बीच एक से डेढ़ फिट की दूरी होनी चाहिए. और एक स्थान पर दो बीजों को लगान चाहिए. बीजों को जमीन में दो से तीन सेंटीमीटर की गहराई में लगाना चाहिए.

भारत में पेठा की खेती गर्मी और बरसात के मौसम में की जाती है. ग्रीष्मकालीन फसल की खेती के लिए इसे बीजों की रोपाई फरवरी के आखिरी सप्ताह से मध्य मार्च तक कर देनी चाहिए. जबकि वर्षाकालीन फसल की खेती के लिए इसके बीजों की रोपाई जून के आखिर से मध्य जुलाई तक कर देनी चाहिए. जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी रोपाई मार्च के बाद की जाती है.

पौधों की सिंचाई

पेठा के पौधों को सिंचाई की जरूरत सामान्य रूप से होती है. बारिश के समय उगाई जाने वाली फसलों को शुरुआत में सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन अगर बारिश वक्त पर ना हो और पौधों को सिंचाई की जरूरत हो तो आवश्यकता के अनुसार उनकी सिंचाई कर देनी चाहिए. ग्रीष्मकालीन फसल के दौरान पेठा के पौधों को सिंचाई की जरूरत अधिक होती है.

इस दौरान पेठा की खेती करने पर इसके पौधों की सप्ताह में दो बार सिंचाई करनी चाहिए. गर्मी के मौसम में इसके पौधों की उचित समय पर सिंचाई करने पर अच्छे से विकास करते हैं. पौधे पर फूल खिलने और फल बनने के दौरान पानी की कमी होने पर इसकी पैदावार कम प्राप्त होती है. इस कारण पौधों में फूल और फल बनने के दौरान पानी की कमी ना आने दें.

उर्वरक की मात्रा

पेठा की खेती के लिए उर्वरक की जरूरत बाकी लतादार फसलों की तरह ही होती है. इसके लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त 15 गाड़ी प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पुरानी गोबर की खाद खेत में डालकर मिट्टी में मिला दें. जबकि रासायनिक खाद के रूप में 80 किलो डी.ए.पी. की मात्रा को खेत में आखिरी जुताई के वक्त छिडक दें.

इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में ही लगभग 50 किलो नाइट्रोजन की मात्रा को दो बार में पौधों की सिंचाई के साथ में देनी चाहिए. पहली मात्रा पौधों के विकास के दौरान फूल खिलने से पहले और दूसरी मात्रा फलों के विकास के दौरान देनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

पेठा की खेती में खरपतवार नियंत्रण काफी अहम होता है. क्योंकि इसके पौधे लता के रूप में फैलते हैं. जिससे खेत में खरपतवार होने से पौधों में कई तरह के कीट जनित रोग लग जाते हैं. जिसका असर पौधों के विकास और उनकी पैदावार पर देखने को मिलते हैं. इसकी खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक तरीके से करना अच्छा होता है. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के दौरान इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद बाकी की गुड़ाई 15 दिन के अंतराल में कर देनी चाहिए. इसके पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए सिर्फ तीन गुड़ाई की जरूरत होती है.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

पेठा के पौधों में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिन्हें टाइम रहते नियंत्रित नहीं किया जाए तो फसल को काफी ज्यादा नुकसान पहुँचता है.

लाल कद्‌द भृंग

इसके पौधों पर लाल कद्‌द भृंग का रोग किसी भी अवस्था में दिखाई दे सकता है. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों में अनियमित आकार वाले टेढ़े मेढ़े छिद्र बना देते हैं. जिससे पौधों का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर फेनवेलिरेट, क्लोरपाइरीफोस या सायपरमेथ्रिन की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

सफेद मक्खी

पेठा की खेती में सफेद मक्खी का रोग का प्रभाव पौधे की पत्तियों पर देखने को मिलता हैं. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों को ज्यादा नुक्सान पहुँचाते हैं. सफेद मक्खी पौधे की पत्तियों की निचली सतह पर रहकर पौधे का रस चुस्ती है. जिससे पत्तियां पीली पड़कर नष्ट हो जाती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर इमिडाक्लोप्रिड या एन्डोसल्फान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

चेपा

इस रोग का प्रभाव पौधों पर मौसम परिवर्तन के दौरान अधिक देखने को मिलता है. इस रोग के किट पौधे के कोमल भागों का रस चूसकर पौधे को नष्ट कर देते हैं. इसके कीटों का आकार छोटा और रंग हरा, काला और पिला दिखाई देता हैं. जो पौधों पर एक झुंड के रूप में आक्रमण करते है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल या डाइमेथेएट का छिडकाव करना चाहिए.

फल मक्खी

पेठा के पौधों में फल मक्खी का रोग इसके पौधे की पैदावार को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाता है. इस रोग के कीट इसके फलों पर अंडे देते हैं. और इसके अंडों से निकलने वाला लार्वा फलों के अंदर जाकर उसे नष्ट कर देता है. जिसका असर इसकी पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर एन्डोसल्फान की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

चूर्णिल आसिता

रोग लगा पौधा

चूर्णिल आसिता को पाउडरी मिल्ड्यू के नाम से भी जाना जाता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पाउडर दिखाई देने लगता है. जो रोग बढ़ने पर सम्पूर्ण पौधे की पत्तियों पर फेल जाता है. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देता है. और पौधे का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर हेक्साकोनाजोल या माईक्लोबूटानिल की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फल सडन

पेठा की खेती में फल सडन रोग के प्रभाव की वजह से पैदावार को अधिक नुक्सान पहुँचता है. इसके फलों में ये रोग फलों के लगातार कई दिनों तक एक ही स्थिति में जमीन में रखे रहने पर लगता है. फलों को इस रोग से बचाने के लिए पलटते रहना चाहिए. और रोग लगे फल को निकालकर खेत से बहार फेंक देना चाहिए. इसके अलावा रोग दिखाई देने पर टेबुकोनाजोल या वैलिडामाईसीन की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए. ताकि रोग के किट फैलकर दूसरे फलों को नुक्सान ना पहुंचा सके.

फलों की तुड़ाई

इसके फलों की तुड़ाई दो तरह से की जाती है. इसके कच्चे फलों की तुड़ाई सब्जी के लिए की जाती है. जिसे अगेती तुड़ाई भी कहा जाता है. इसके फलों की अगेती तुड़ाई के लिए इसके फलों को पकने से पहले जब उनका आकर अच्छा दिखाई देने लगे तभी तोड़ लेना चाहिए. जबकि पके हुए फलों की तुड़ाई फलों के पूर्ण रूप से पकने के बाद की जाती है. इसके फलों की तुड़ाई के बाद इसके फलों को बाज़ार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए.

पैदावार और लाभ

पेठा की सभी किस्मों के फलों की औसतन पैदावार 400 से 500 किवंटल के आसपास पाई जाती है. इसका बाज़ार भाव अच्छा होने पर किसान भाइयों को फसल का दाम भी अच्छा मिलता है. अच्छा भाव मिलने पर किसान भाई एक हेक्टेयर से एक से दो लाख तक की कमाई आसानी से कर लेते हैं.

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