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साइटिका में प्रयोग होने वाली जड़ी बूटी

आज की इस व्यस्त जिंदगी में मनुष्य अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना लगभग भूल सा गया है. आज काम में मशगूल रहने वाला मनुष्य अपने स्वास्थ्य की देखभाल किये बिना लगातार काम करने में लगा रहता है. जिससे वो उचित समय पर अच्छे से खाना भी नही खा पाता है. जिससे मनुष्य को कई तरह की बीमारी लग जाती हैं उन्हीं में से एक बिमारी साइटिका है. जो लोगों में काफी ज्यादा देखने को मिल रही है. मनुष्य में यह बीमारी काफी ज्यादा बढ़ चुकी है. जब मनुष्य अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक मेहनत करता है तब इस बीमारी का प्रभाव मनुष्य के शरीर में अधिक देखने को मिलता है.

साइटिका में प्रयोग होने वाली जड़ी बूटी

आज हम आपको इस बीमारी के उपाय के लिए उपयोग में आने वाली जड़ी बूटियों के बारें में बताने वाले हैं.

साइटिका बीमारी के लक्ष्ण

साइटिका असल में बीमारी नही हैं बल्कि यह बिमारियों के शरीर में आने से पहले के लक्षण होते हैं. जो मनुष्य के शरीर की हड्डियों के जोड़ों में दिखाई देती है. अगर इसका इलाज सही वक्त रहते नही कराया जाता है तो ये शरीर में काफी बढ़ जाती है. जो बाद में काफी परेशानी देती है. इसके शुरुआत में शरीर में काफी लक्षण दिखाई देते हैं.

  1. इसके लगने पर शुरुआत में शरीर की मांस पेशियों में खिचाव आने लगता हैं.
  2. शरीर को हिलने डुलने में अधिक परेशानी आती हैं.
  3. पीठ और पैरों पर किसी चीज के छुने का अहसास बहुत जल्द होता है.
  4. कमर और कंधों के जोड़ों में तेज़ दर्द रहने लगता हैं.
  5. टांगें के कमजोर होने के साथ ही उनमें सुन्नता उत्पन्न हो जाती हैं.

शरीर में जब इनका प्रभाव दिखाई देने लगे तब तुरंत इसकी रोकथाम कर लेनी चाहिए. इसके लिए अधिक मेहनत नही करनी चाहिए. और सही समय पर उचित खाना और आराम करना चाहिए. इसके अलावा डॉक्टर से इसके बारें में विचार विमर्श करना चाहिए.

इसके अलावा इसे शुरुआत में कुछ घरेलू नुक्शों के माध्यम से भी सही किया जा सकता है. जिसके लिए कई तरह की जड़ी बूटियों की जरूरत होती है. जिनका उचित तरीके से इस्तेमाल करने पर इस रोग की रोकथाम में लाभ देखने को मिलता है.

साइटिका में प्रयोग होने वाली जड़ी बूटी

गूंजा

गुंजा को रत्ती के नाम से भी जाना जाता है. इसका पौधा बेल के रूप में बढ़कर अपना विकास करता है. इसके पौधे पर हल्के पीले गुलाबी और बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं. इसके पौधे से मिलने वाले बीजों से तेल निकला जाता है. जिसका इस्तेमाल दर्द होने वाले स्थानों पर दर्द निवारक के रूप में लगाकर मालिश की जाती है. जिससे दर्द से छुटकारा मिलता है. इसके तेल को बनाने के लिए लगभग 50 ग्राम बीजों को कुचलकर (पीसकर) उसे लगभग 200 ग्राम खाने के तेल मिलाकर लगभग 15 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं. उसके बाद प्राप्त होने वाले तेल को दर्द वाले स्थान पर लगा कर उसकी मालिश करने से दर्द ख़तम हो जाता हैं.

लहसुन

लहसुन का इस्तेमाल मसाले के साथ साथ आयुर्वेद चिकित्सा में बहुत ज्यादा किया जाता है. लहसुन के अंदर कई तरह की बिमारियों से लड़ने वाले तत्व पाए जाते हैं. सुखी लहसुन की कलियाँ साइटिका बिमारी की रोकथाम में बहुत कारगर मानी जाती है. माना जाता हैं कि लगभग 40 ग्राम सूखी लहसुन की कलियों को पीसकर उन्हें लगभग आधा लीटर दूध में मिलाकर गर्म करें. दूध को तब तक गर्म करें जब तक दूध आधा ना बच जाए. इस आधे बचे दूध को दो बराबर के हिस्सों में बांट लें जिसमें से एक हिस्सा सुबह पीले और दूसरे हिस्से को शाम को पीलें. इसे साइटिका के रोग में फर्क देखने को मिलता है. इसके अलावा रोज़ लगभग चार पोत सूखी लहसुन को सुबह खाली पेट चबाने से साइटिका की बिमारी में काफी फायदा देखने को मिलता है.

पिप्पली (लेंडी पिप्पल)

लेंडी पिप्पल की खेती ज्यादातर दक्षिण भारत में की जाती है. जिसे लाँग पेप्पर के नाम से भी जाना जाता है. इसके लगभग 100 ग्राम बीजों को 200 ग्राम पानी में डालकर पांच से सात मिनट तक तेज़ आंच में उबालकर शेष बचे भाग को छालनी में से छानकर अलग कर लिया जाता हैं. उसके बाद प्राप्त होने वाले द्रव्य की 10 ग्राम मात्रा में लगभग चुटकी भर कपूर और सुखी अदरक (सोंठ) के चूर्ण को मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें. उसके बाद इस पेस्ट को रोगी के शरीर पर दर्द वाली जगहों पर लगाकर उसकी मालिश करें. इस प्रक्रिया को दिन में तीन से चार बार दोहरायें जिससे कुछ दिन बाद दर्द कम हो जाता है.

हल्दी

बात करें हल्दी के बारें में तो हल्दी का इस्तेमाल मसाले के साथ साथ आयुर्वेद औषधि और सौन्दर्य प्रसाधन की चीजों को बनाने में किया जाता है. चोट लगने पर हल्दी को दूध में मिलकर पीने से दर्द ख़तम हो जाता है. इसी आधार पर इसका इस्तेमाल साइटिका के उपचार के रूप में किया जाता है. साइटिका के इलाज के लिए हल्दी के साथ लहसुन और पिप्पली को सामान मात्रा में मिलाकर उसका लेप तैयार कर लें. इस लेप को रोगी के दर्द वाले स्थान पर लगा दें. इसके अलावा रोगी को रोज़ दो से तीन गिलास हल्दी पानी पिला दें. हल्दी पानी बनाने के लिए एक गिलास पानी में आधा चम्मच हल्दी को मिलाकर रोगी को दें.

पारिजात (प्राजक्ता)

पारिजात को प्राजक्ता, हरसिंगार, शेफाली और शिउली के नामों से जाना जाता है. इसका पौधा सामान्य रूप से लगभग 10 से 15 फिट की ऊंचाई का पाया जाता है. इसके पौधे पर सफ़ेद और नारंगी रंग के फूल खिलते हैं. जिनका इस्तेमाल पूजा में किया जाता है. इसका इस्तेमाल साइटिका रोग की रोकथाम के लिए बहुत ही उपयोगी होता है. इसके पौधे की छाल का इस्तेमाल इसके काढ़े को तैयार करने में किया जाता है. जिसको अन्य पौधों के साथ मिलाकर तैयार किया जाता हैं.

इसका काढा तैयार करने के लिए लगभग 200 ग्राम पारिजात के पौधे की छाल और 10 ग्राम के आसपास अदरक, 5 ग्राम लहसुन और 15 ग्राम कपूर को आपस में तीन लीटर पानी में मिलाकर तब तक उबाते जब तक मिश्रण एक चौथाई रहा जाता हैं. उसके बाद मिश्रण को छान लिया जाता है. जिसे दर्द वाले स्थान पर लगभग  15 दिन तक दिन में दो बार लगाकर मालिश करनी चाहिए. इससे रोग में फायदा देखने को मिलता है.

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