तिल की उन्नत खेती कैसे करें

तिल की खेती तिलहन फसल के रूप में की जाती है. भारत में इसकी खेती प्राचीन काल से होती रही है. तिल को दुनिया की पहली तिलहन फसल भी माना जाता है. इसके उत्पादन का मुख्य उद्देश्य इससे तेल प्राप्त करना ही है. इसके तेल का इस्तेमाल कई तरह से खाने में किया जाता है. भारत में तिल की खेती खरीफ की फसलों के साथ की जाती है. इसकी फ़सल को मिश्रित खेती के रूप में भी कर सकते हैं. तिल के पौधे की ऊंचाई एक मीटर के आसपास पाई जाती है. इसके पौधे पर सफेद और बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं.

तिल की खेती

तिल की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है. तिल के पौधे को विकास करने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. तिल मुख्य रूप से काला और सफ़ेद दो प्रकार का होता है. काले तिल का उपयोग कई तरह के अलग अलग कार्यों में किया जाता है. जबकि सफेद तिल का इस्तेमाल ज्यादातर तेल निकालने और खाने में ही किया जाता है. जिससे तिल के लडडू और मिठाइयाँ बनाई जाती है.

अगर आप भी तिल की खेती कर अच्छा लाभ कमाना चाहते है तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले है.

उपयुक्त मिट्टी

तिल की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. तिल की खेती उन जगहों पर नही की जा सकती जहां बारिश के वक्त जल भराव अधिक मात्रा में होता है.

जलवायु और तापमान

तिल की खेती की लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु सबसे उपयुक्त होती है. भारत में इसकी खेती गर्मियों के मौसम में खरीफ की फसल के साथ की जाती है. तिल की खेती के लिए गर्मी का मौसम उपयुक्त होता है. इसकी फसल को सर्दियों के मौसम से पहले ही काट लिया जाता है. लेकिन अधिक बारिश इसकी खेती के लिए उपयुक्त नही होती.

तिल की खेती के लिए सामान्य तापमान उपयुक्त होता है. कम समय के लिए इसका पौधा अधिकतम 40 डिग्री तापमान को भी सहन कर सकता है. लेकिन ज्यादा तापमान अधिक समय तक बना रहता है तो पौधा विकास करना बंद कर देता है.

उन्नत किस्में

तिल की कई तरह की किस्में है. इन सभी किस्मों से अधिक पैदावार के लिए अलग अलग भू भाग में उगाया जाता है.

टी.सी. 25

तिल की यह किस्म जल्दी पककर तैयार होने वाली किस्म है. इसके पौधों की लम्बाई 90 सेंटीमीटर के आसपास पाई जाती हैं. इसके पौधों पर सामान्य रूप से 4 से 6 शाखाएं निकलती है. इसकी फली में चार कतार में बीज निकलते हैं. जिनके अंदर तेल की मात्रा 48 प्रतिशत के आसपास पाई जाती है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 90 से 100 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 4 से 5 क्विंटल तक पाया जाता है.

आर.टी. 46

तिल की इस किस्म एक पौधे 100 से 125 सेंटीमीटर तक की ऊंचाई के पाए जाते हैं. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 70 से 80 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके पौधों पर 4 से 6 शाखाएं पाई जाती है. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 से 8 क्विंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के दानो में तेल की मात्रा 49 प्रतिशत तक पाई जाती है.

टी. 13

तिल की इस किस्म एक पौधे 100 से 125 सेंटीमीटर तक की ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिन पर फूल बीज रोपाई के लगभग एक महीने बाद ही आने शुरू हो जाते हैं. और पौधे 90 दिन के आसपास पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके दानो में तेल की मात्रा 48 से 49 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 5 से 7 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

आर. टी. 125

उन्नत किस्म का पौधा

तिल की ये एक जल्द पकाने वाली किस्म है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के बाद 80 दिन के आसपास पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों की सभी फलियाँ एक साथ पकती है. जिससे फसल के खराब होने की संभावना काफी कम हो जाती है. इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 6 से 8 क्विंटल तक पाई जाती है. इस किस्म के दानो में तेल की मात्रा 47 से 49 प्रतिशत तक पाई जाती है.

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तिल ये एक जल्दी पकने वाली किस्म है. जिसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 80 से 85 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 6 से 8 क्विंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के दानों में तेल की मात्रा 48 से 49 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म के पौधों पर फलियाँ एकल रूप में आती है.

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तिल की ये एक जल्दी पकने वाली किस्म है. जिसको अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के बाद 80 से 85 दिन में पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 8 से 9 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर पत्ती धब्बा और तना गलन जैसे रोग बहुत कम देखने को मिलते हैं.

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तिल की इस किस्म को चेतक के नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म को ज्यादातर उत्तर भारत के राज्यों ( राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार ) में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधों को पानी की ज्यादा जरूरत नही होती. इसके पौधे सूखे के प्रति सहनशील होते हैं. इसके पौधे बीज रोपाई के बाद 80 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 7 से 9 क्विंटल तक पाया जाता है. इसके दानो में तेल की मात्रा सबसे ज्यादा 50 प्रतिशत तक पाई जाती है.

इसके अलावा और भी कई तरह की किस्में मौजूद हैं. जिन्हें उत्पादन की दृष्टि से अलग अलग जगहों पर उगाया जाता है. जिनमें टी एम वी- 4, 5,  6, तरुण, वी आर आई- 1, गुजरात तिल 4, प्यायूर- 1, सोमा, पंजाब तिल 1, सूर्या, चिलक रामा, हरियाणा तिल 1, बी- 67, सी ओ- 1 और शेखर जैसी कई किस्में शामिल हैं.

खेत की तैयारी

तिल की खेती के लिए शुरुआत में खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर भूमि को खुला छोड़ दें. उसके बाद उसमें पुरानी गोबर की खाद उचित मात्रा में डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद बारिश के मौसम से पहले खेत की दो बार जुताई कर उसमें पाटा लगा दें. जिससे मौसम की पहली बारिश के बाद इसे आसानी से उगाया जा सके .

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

तिल के बीजों की रोपाई बाजरे और गेहूँ की तरह ही छिडकाव और ड्रिल के माध्यम से की जाती है. लेकिन ज्यादातर किसान भाई इसे छिडकाव विधि से ही करना पसंद करते हैं. एक हेक्टेयर खेती के लिए लगभग 3 से 4 किलो बीज की मात्रा उपयुक्त होती है. बीजों को खेत में लगाने से पहले उन्हें कार्बेन्डाजिम और थिरम की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए.

तिल की खेती

ड्रिल विधि के माध्यम से इसके बीजों की रोपाई पंक्तियों में की जाती है. इसके लिए प्रत्येक पंक्तियों के बीच लगभग एक फिट के आसपास दूरी होनी चाहिए. जबकि पंक्तियों में बीजों के बीच की दूरी लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर के आसपास होनी चाहिए. जबकि छिडकाव विधि से इसके बीजों की रोपाई के लिए बीजों की तैयार किये हुए खेतों में छिडक दिया जाता है. उसके बाद कल्टीवेटर के माध्यम से खेती की दो बार हल्की जुताई कर दें. जिससे तिल के बीज मिट्टी में अच्छे से मिल जाते हैं.

तिल के बीजों की रोपाई बारिश के मौसम की पहली बारिश के बाद ही कर देनी चाहिए. बारिश में मौसम में इसके बीजों की रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त टाइम मध्य जून के बाद का टाइम होता है. इस दौरान बारिश होने के साथ ही इनकी रोपाई कर देनी चाहिए.

पौधों की सिंचाई

तिल के पौधों को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नही होती. तिल के पौधे दो से तीन सिंचाई के बाद ही पककर तैयार हो जाते हैं. इसके पौधों की पहली सिंचाई बीज रोपाई के लगभग एक से डेढ़ महीने बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद दूसरी सिंचाई जब पौधे पर फली में दाने बनने लगे तब कर देनी चाहिए. इसके बाद बीजों के पकने के दौरान उनकी एक बार और सिंचाई कर देनी चाहिए. इससे फलियों में बीजों का आकार अच्छे से बनता है. और उत्पादन भी अधिक प्राप्त होता है.

उर्वरक की मात्रा

तिल की खेती के लिए उर्वरक की ज्यादा जरूरत नही होती. इसके लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त लगभग 10 से 12 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को खेत की पहली जुताई के बाद खेत में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिए. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में बीज रोपाई के बाद सिंचाई के साथ लगभग 25 किलो यूरिया प्रति एकड़ के हिसाब से खेतों में देना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

तिल के पौधों में खरपतवार नियंत्रण नीलाई गुड़ाई के माध्यम से करना चाहिए. इसके लिए बीजों की रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद उनकी हल्की नीलाई गुड़ाई कर देनी चाहिए. उसके बाद हो सके तो दूसरी गुड़ाई, पहली गुड़ाई के 15 दिन बाद कर दें. इसके अलावा रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए एलाक्लोर का बीज रोपाई के तुरंत बाद छिडकाव करना चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

तिल के पौधों में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी उचित टाइम रहते हुए रोकथाम कर फसल को होने वाले नुक्सान से बचाया जा सकता है.

फली छेदक

तिल के पौधों में फली छेदक रोग का प्रकोप पौधों पर फली बनने के बाद दिखाई देता है. इसके कीट की सुंडी पौधे की पत्तियों को खाने के बाद फलियों पर आक्रमण करती है. जो फलियों में छेद बनाकर फलियों को नष्ट कर देती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर क्यूनालफॉस की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

गाल मक्खी

तिल के पौधों में लगने वाला ये एक किट रोग है जो पौधों को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाता है. इस रोग के लगने पर पौधों की फलियाँ गाँठ के रूप में नजर आती है. और पौधों का विकास रुक जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

पत्ती छेदक रोग

तिल के पौधों पर लगने वाला ये रोग भी किट जनित रोग है. इस रोग के किट का लार्वा पौधों की पत्तियों को खाकर पौधे को नुक्सान पहुँचाता है. इस रोग के लगने पर पौधों का विकास रुक जाता है. जिसका असर उनकी पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर मोनोक्रोटोफास की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फिलोड़ी

रोग लगा पौधा

पौधों पर इस रोग का प्रकोप फूल बनने के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर फूल पत्तियों की तरह दिखाई देने लगते हैं और पौधे के शिखर पर एक गुच्छा बन जाता है. जिसमे काफी कम मात्रा में पौधे पर फलियाँ बनती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मैटासिस्टाक्स की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

जड़ और तना गलन

पौधों पर लगने वाले ये रोग फफूंद की वजह से फैलता है. पौधों पर ये रोग जल भराव की वजह से ज्यादा लगते हैं. इन रोग के लगने पर पौधे धीरे धीरे नष्ट हो जाते हैं. जिसका असर पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की जड़ो में बोर्डो मिश्रण का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा बीज को बोते वक्त उसे थिरम से उपचारित कर लेना चाहिए.

फसल की कटाई और कढ़ाई

तिल के पौधे बीज रोपाई के लगभग 80 से 100 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाए, तब उन्हें काट लेना चाहिए. तिल के पौधों को हरा ही काटा जाता है. क्योंकि सूखने के बाद इसकी फलियां फट जाती है. जिससे सूखने के बाद काटने से पैदावार की नुक्सान पहुँचता है.

इसके पौधों को काटकर उसे तेज़ धूप वाली जगहों पर सूखाया जाता है. उसके बाद जब पौधे अच्छे से सूख जाते तब उनसे झाड़कर दानो को अलग कर लिया जाता है. जिन्हें एकत्रित कर बाद में बाज़ार में बेच दिया जाता है.

पैदावार और लाभ

तिल की विभिन्न किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 8 क्विंटल तक पाई जाती है. तिल का बाज़ार में थोक भाव 8 हज़ार रूपये प्रति क्विंटल के आसपास पाया जाता है. जिस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर 50 हज़ार से ज्यादा की कमाई आसानी से कर लेता है.

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