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तोरई की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

तोरई को लतादार सब्जियों में गिना जाता है. जिसकी खेती मुख्य रूप से नगदी फसल के रूप में की जाती है. इसको कई जगहों पर झिंग्गी, तोरी और तुराई के नाम से भी जाना जाता है. इसका पौधा बेल ( लता ) के रूप में फैलता है. जिस पर पीले रंग के फूल खिलते हैं. इसके फूलों में नर और मादा पुष्प अलग अलग वक्त पर खिलते हैं. इन पुष्पों पर लगने वाले फलों का ज्यादातर उपयोग सब्जी बनाने में किया जाता है.

तोरई की खेती

तोरई की खेती मुख्य रूप से तो बारिश के मौसम में की जाता है. लेकिन इसको खरीफ की फसल के साथ भी लगाया जा सकता हैं. इसके पौधे को विकास करने के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.

अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

तोरई की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से भरपूर उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक पैदावार लेने के लिए इसकी खेती उचित जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में करनी चाहिए. उदासीन ( सामान्य ) पी.एच. मान वाली भूमि में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है.

जलवायु और तापमान

तोरई  समशीतोष्ण जलवायु का पौधा माना जाता है. इसके पौधे शुष्क और आद्र मौसम में अच्छे से विकास करते हैं. भारत में इसकी खेती खरीफ और जायद के मौसम में की जाती है. इसके पौधे सर्दी के मौसम को सहन नही कर पाते. और गर्मी के मौसम में आसानी से विकास करते हैं. इसके पौधों को बारिश की जरूरत शुरुआत में ही होती है. क्योंकि बाद में पौधे पर फूल और फल बनने के दौरान होने वाली बारिश की वजह से इसके फूल और फल दोनों खराब हो जाते हैं. जिसका असर इसकी पैदावार पर देखने को मिलता है.

इसके पौधों को शुरुआत में अंकुरित होने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. उसके बाद गर्मियों के मौसम में इसका पौधा अधिकतम 35 डिग्री के आसपास तापमान को भी सहन कर सकता है.

उन्नत किस्में

तोरई की कई उन्नत किस्में हैं. जिन्हें उनके उत्पादन और फलों के बाहरी आवरण के आकार के आधार पर तैयार किया गया है.

घिया तोरई

इस किस्म के फल गहरे हरे रंग के होते हैं. जो किसी छोटी घिया की तरह दिखाई देती है. भारत में इस प्रजाति के पौधे अधिक मात्रा में उगाये जाते हैं. इस किस्म के फलों का छिलका पतला होता है. इसके कच्चे हरे फलों में विटामिन की मात्रा अधिक पाई जाती है. जिनका इस्तेमाल सब्जी के रूप में किया जाता है.

पूसा नसदार

इस किस्म के पौधों पर लगने वाले फलों पर उभरी हुई धारियां दिखाई देती है. इसके फलों का रंग हल्का पीला और हरा होता है. इस किस्म के पौधे खेत में बीज रोपाई के लगभग 80 दिन बाद ही पैदावार देना शुरू कर देते हैं. इस किस्म को जायद की फसल के रूप में उगाया जाता है.

सरपुतिया

तोरई की इस किस्म के फल पौधों पर गुच्छों में लगते हैं. जो आकार में छोटे दिखाई देता है. जो पौधे की रोपाई के लगभग दो महीने बाद ही तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के फलों पर भी उभरी हुई धारियां बनी होती है. इसके फलों का बाहरी छिलका मोटा और मजबूत होता है. इस किस्म के पौधे मैदानी भागों में अधिक उगाये जाते हैं.

पंजाब सदाबहार

तोरई की उन्नत किस्म

तोरई की इस किस्म के फल पतले, गहरे हरे रंग के होते हैं. जो धारीदार रूप में दिखाई देते हैं. जिनकी लम्बाई आधा फिट से भी ज्यादा पाई जाती है. इसके पौधों का आकार सामान्य पाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 70 दिन बाद पैदावार देना शुरू करते हैं.

पी के एम 1

इस किस्म के फल गहरे हरे रंग के होते हैं. जिन पर उभरी हुई कोणीय धारियां दिखाई देती है. इस किस्म के फल बीज रोपाई के लगभग 80 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका आकार सामान्य दिखाई देता है.

कोयम्बूर 2

इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 70 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के फल पतले और कम बीज वाले होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 250 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों की फसल अवधि को 110 दिन के आसपास माना गया है.

इनके अलावा और भी कई सारी किस्में मौजूद हैं. जिनको अधिक उत्पादन के लिए कई जगहों पर उगाया जाता है.

खेत की तैयारी

तोरई की खेती के लिए खेत को अच्छे से तैयार किया जाना चाहिए. इसके लिए शुरुआत में खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर तेज धूप लगने के लिए कुछ दिन तक खेत को खुला छोड़ दें. उसके बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पाटा लगाकर उसे समतल बना लें. खेत को समतल बनाने के बाद उसमें उचित दूरी रखते हुए धोरेनुमा क्यारी तैयार कर लें.

बीज की रोपाई का तरीका और टाइम

तोरई की खेती बीज रोपाई और पौध रोपाई दोनों माध्यम से की जाती है. लेकिन ज्यादातर किसान भाई इसे बीज के माध्यम से ही करना पसंद करते हैं. क्योंकि पौध के रूप में की जाने वाली फसल के लिए पौध तैयार करने में मेहनत और खर्चा अधिक आता है. इसकी पौध नर्सरी में लगभग एक महीने पहले प्रो-ट्रे में ही उगाई जाती है. जिस कारण इसका खर्च बढ़ जाता है.

इसके बीजों को खेत में उगाने से पहले थीरम या बाविस्टीन से उपचारित कर लेना चाहिए. ताकि पौधे को शुरुआत में होने वाले रोगों से बचाया जा सके. एक हेक्टेयर में इसकी रोपाई के लिए दो से तीन किलो बीज काफी होता है.

 

तोरई की पैदावार

इसके बीजों की रोपाई खेत में तैयार की गई धोरेनुमा क्यारियों में की जाती है. क्यारी में इसके बीजों को मेड के अंदर की तरफ डेढ़ से दो फिट की दूरी पर उगाते हैं. इसके पौधे जमीन की सतह पर फैलकर बढ़ते हैं. इस कारण क्यारिओं को बनाते वक्त क्यारियों के बीच लगभग 3 से 4 मीटर की दूरी बनाकर रखनी चाहिए. ताकि बेल आसानी से फैलकर अच्छे से विकास कर सके.

तोरई के बीजों की खेत में रोपाई बारिश और खरीफ के मौसम के आधार पर अलग अलग वक्त में की जाती है. बारिश के मौसम में फल लेने के लिए इसके बीजों की रोपाई जनवरी माह में की जाती है. जबकि खरीफ की फसल के रूप में इसकी पैदावार लेने के लिए इसकी रोपाई जून के महीने में की जाती है.

पौधों की सिंचाई

तोरई के पौधों को सिंचाई की जरूरत बीजों के अंकुरित होने और पौधों पर फल बनने के दौरान अधिक होती है. इस दौरान पौधों की तीन या चार दिन के अंतराल में हल्की हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए. गर्मियों के मौसम में पौधे के विकास के दौरान सप्ताह में एक बार पानी देना उचित होता है. और बारिश के मौसम में इसके पौधे को सिंचाई की जरूरत नही होती. लेकिन बारिश वक्त पर ना हो पाए तो पौधों की सिंचाई आवश्यकता के अनुसार करनी चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

तोरई के पौधों को भी बाकी बेल वाली की फसलों की तरह अधिक उर्वरक की आवश्यकता होती है. इसके लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त लगभग 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालनी चाहिए. गोबर की खाद की जगह जैविक खाद के रूप में किसान भाई कम्पोस्ट खाद का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में एन.पी.के. की 100 से 125 किलो मात्रा को खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिडक दें. उसके बाद पौधों के विकास के दौरान लगभग 15 किलो यूरिया की मात्रा को पौधों की तीसरी सिंचाई के साथ देना चाहिए. जिससे पौधे अच्छे से विकसित होते हैं.

खरपतवार नियंत्रण

तोरई की खेती में खरपतवार नियंत्रण नीलाई गुड़ाई के माध्यम से की जाती है. इसके पौधों की पहली गुड़ाई हाथ के माध्यम से 15 दिन बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद बाकी की गुड़ाई, पहली गुड़ाई के बाद लगभग 15 से 20 दिन के अंतराल में करनी चाहिए. जबकि रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण करने के लिए बासालीन की उचित मात्रा का छिड़काव बीज रोपाई से पहले जमीन में करना चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

तोरई के पौधों को कई तरह के रोग लगते हैं. जिनका टाइम रहते उपचार ना किया जाये तो ये पैदावार को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाते हैं.

लालड़ी

तोरई के पौधों पर इस रोग का असर पौधों के शुरूआती दिनों में अंकुरती होने के तुरंत बाद दिखाई देता है. इस रोग का किट उपर से पौधों की अंकुरित पत्तियों को खा जाता है. जबकि इसकी सुंडी पौधों की जड़ों को खाकर उन्हें नष्ट कर देती है. इस रोग के कीटों का रंग चमकीला लाल होता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के तेल या नीम के पानी का छिडकाव बीज के अंकुरण के साथ ही कर देना चाहिए.

फल मक्खी

फल मक्खी का रोग पौधों पर फल लगने के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग के कीट पौधों की पतियों और फलों पर अपने अंडे देते हैं. जिनसे जन्म लेने वाली सुंडी इसके फलों को नुकसान पहुँचाती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के काढ़े या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ उचित मात्रा में मिलाकर पौधों पर छिड़कना चाहिए.

चूर्णी फफूंदी

रोग लगा पौधा

तोरई के पौधों पर चूर्णी फफूंदी का रोग ऐरीसाइफी सिकोरेसिएरम नामक फफूंद की वजह से फैलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों का रंग सफ़ेद दिखाई देने लगता है. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देता है. और कुछ दिनों बाद पत्तियां पीली पड़कर सुख जाती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कार्बेन्डाजिम या एन्थ्रेक्नोज की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

पत्ती धब्बा

पौधों पर पत्ती धब्बा रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर भूरे पीले रंग के छोटे छोटे धब्बे दिखाई देते हैं. जिनकी रोकथाम नही करने पर इनका आकर और बढ़ जाता है. जिससे पत्तियों का रंग भूरा काला दिखाई देने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मन्कोजेब या जिनेब की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

मोजैक

तोरई के पौधे पर लगने वाला ये एक विषाणु जनित रोग है. इस रोग के लगने पर पत्तियों की बढावा रुक जाती है. जिससे पत्तियां मुड़ने लगती है. जिसका असर पौधे की पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम के तेल का छिडकाव करना चाहिए.

जड़ सड़न

तोरई के पौधों पर जड़ सडन का रोग पानी भराव या वायरस की वजह से लगता है. इस रोग के लगने पर पौधे का तना जमीन के पास से काला पड़कर सड़ने लगता है. जिससे पत्तियां मुरझाने लगती है. और कुछ दिन बाद पौधा सुखकर नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों की जड़ों में बाविस्टीन या मेन्कोजेब की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर पौधों पर छिड़कना चाहिए.

फलों की तुड़ाई

तोरई की अलग अलग किस्मों के फल बीज रोपाई के लगभग 70 से 80 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके फलों की तोड़ाई कच्चे रूप में ही कर लेनी चाहिए. कच्चे रूप में तोड़ाई करने पर ही इसका उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है. जबकि पकने पर इसके फलों का इस्तेमाल बीज बनाने में कर सकते हैं. इसके फलों की तुड़ाई सप्ताह में एक बार कर देनी चाहिए. फलों की तुड़ाई करते वक्त फलों को डंठल से कुछ दूरी रखते हुए तोड़ें. इससे फल ज्यादा समय तक ताज़ा रहते हैं.

पैदावार और लाभ

तोरई की अलग अलग किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 250 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. जबकि इसका बाज़ार भाव 10 रूपये प्रति किलो तक पाए जाते हैं. अगर किसान भाई की तोरई 5 रूपये किलो भी जाती है तो उसकी एक बार में एक हेक्टेयर से सवा लाख से भी ज्यादा की कमाई आसानी से हो जाती है.

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