उन्नत किस्में

मक्का की उन्नत किस्में और पैदावार

मक्का की खेती मोटे अनाज के तौर पर की जाती है. मक्के का इस्तेमाल खाने में इसके कच्चे भुट्टे को भुनकर और इसके दानो से आटा बनाकर किया जाता है. इसके अलावा इसके पौधों का इस्तेमाल पशुओं के हरे चारे के रूप में किया जाता है. मक्के को खाने के आधार पर सात प्रकार में बांटा गया है. जिसमें पॉप कॉर्न, स्वीट कॉर्न, फ्लिंट कॉर्न, वैक्सि कॉर्न, पॉड कॉर्न, सॉफ्ट कॉर्न और डेंट कॉर्न शामिल है. मक्के की खेती व्यापारिक तौर पर भी बड़े पैमाने पर की जाती है. जिसमें मक्के के दानो से पॉपकॉर्न, मुर्गियां का दाना, प्रोटिनेक्स, चॉकलेट पेंट्स, स्याही लोशन स्टार्च और कॉर्न सिरप बनाया जाता है.

मक्का की उन्नत किस्में

मक्का की खेती भारत में पूरे साल की जाती है. लेकिन मुख्य रूप से इसकी फसल खरीफ की फसलों के साथ जून से लेकर सितम्बर माह तक की जाती है. मक्के की खेती के लिए अधिक तापमान की जरूरत होती हैं. लेकिन अब कई ऐसी किस्में भी तैयार कर ली गई हैं, जिन्हें किसान भाई कम तापमान या रबी के मौसम में अगेती फसल के रूप में उगाकर अधिक उत्पादन ले सकता है.

आज हम आपको मक्का की उन सभी उन्नत किस्मों के बारें में बताने वाले हैं, जिनको उगाकर किसान भाई अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकता हैं.

कंचन

मक्का की ये एक संकुल किस्म है, जिसको अगेती पैदावार लेने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधों की लम्बाई अधिक पाई जाती है. जिन पर लगने वाले भुट्टे दानो से पूरी तरह भरे हुए होते हैं. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 75 से 80 दिन बाद पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 35 से 40 टन के बीच पाया जाता है. इस किस्म के भुट्टों का इस्तेमाल बेबी कॉर्न के रूप में भी कर सकते हैं.

मालवीय संकर मक्का-2

मक्का की इस किस्म को कम समय में अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार किया गया है. इसके पौधे रोपाई के लगभग 80 से 90 दिन बाद पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 40 से 45 क्विंटल के बीच पाया जाता है. मक्का की इस किस्म के पौधे शिशु मक्का की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं. इस किस्म के पौधों में कई तरह के जीवाणु जनित रोगों का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

एच एच एम – 1

मक्का की इस संकर किस्म को चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा खरीफ के मौसम में अगेती पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के 80 से 85 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके पौधे पर आने वाले भुट्टे लम्बे और पूरे दानो से भरे हुए होते हैं. इसके दानो का रंग पीला होता है. इस किस्म के पौधे पर भुट्टे मध्य भाग से शुरू होकर ऊपरी सिरे तक आते हैं. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 60 से 65 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर पत्ती झुलसा रोग का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

आजाद उत्तम

मक्का की इस किस्म को रबी के मौसम में उगाने के लिए तैयार किया है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 75 से 80 दिन बाद पैदावार देने के लिए तैयार हो जाते है. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 40 क्विंटल के तक पाया जाता है. इस किस्म के पौधे की लम्बाई 7 फिट के आसपास पाई जाती है. जिस पर भुट्टे मध्य भाग से लगने शुरू होते हैं.

प्रकाश

मक्का की ये एक संकर किस्म हैं जिसको खरीफ के मौसम में जल्दी पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे लम्बे और पत्तियां चौड़ी पाई जाती हैं. इसके पौधे पर भुट्टे जमीन की सतह से दो से ढाई फिट ऊँचाई से लगने शुरू होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 35 से 40 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 70 से 75 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिन पर कई तरह के कीट और जीवाणुओं का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

डेक्कन – 105

मक्का की इस किस्म को आचार्य एन जी रंगा कृषि विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने पछेती पैदावार देने के लिए तैयार किया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 90 से 100 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 70 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के भुट्टे पीले रंग के दानो से भरे होते हैं.

एच एम – 4

मक्का की इस किस्म को चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा बेबी कॉर्न और दाने दोनों के रूप में पैदावार लेने के लिए तैयार किया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 45 से 50 दिन बाद बेबी कॉर्न की तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. मक्का की बेबी कॉर्न की खेती के रूप में ये एक बहुत उत्तम किस्म हैं. जिसको पूरे साल भर किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है. जबकि पैदावार लेने के रूप में इसे खरीफ के मौसम में उगाना अच्छा माना जाता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 80 से 90 दिन के बीच पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 65 से 70 क्विंटल तक प्राप्त किया जा सकता है. इसके भुट्टे मोटे और लम्बे पाए जाते हैं. जिनके दानो का रंग नारंगी और आकार मोटा दिखाई देता है.

एच एम – 5

मक्का की ये एक संकर किस्म है, जिसको खरीफ के मौसम में अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई के होते हैं. जिनका तना बहुत मजबूत और भुट्टे बहुत अधिक मोटे पाए जाते हैं. इसके पौधों में भुट्टे जमीन की सतह से दो से तीन फिट की ऊंचाई से शुरू होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 70 से 75 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 85 से 90 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके दाने सफ़ेद रंग के और ऊपर से चपटे दिखाई देते हैं. इस किस्म के पौधों में पत्ती झुलसा रोग काफी कम देखने को मिलता है.

एच एच एम – 2

मक्का की ये भी एक संकर किस्म है, जिसको चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा खरीफ के समय में उगाने के लिए तैयार किया गया है. इसके भुट्टे लम्बे और पूरे दानो से भरे हुए होते हैं. जिसके दानो का रंग सफ़ेद दिखाई देता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 85 से 90 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 60 से 65 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में पत्ती झुलसा रोग का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

गंगा 11

मक्का की इस किस्म को खरीफ और रबी दोनोँ मौसम में उगाने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 100 से 105 दिन के बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. इसके दानो का रंग पीला पाया जाता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 60 से 70 क्विंटल के बीच पाया जाता है.

सरताज

मक्का की ये एक संकर किस्म है. जिसके पौधे सामान्य लम्बाई के पाए जाते हैं. इसके पौधों का तना मोटा और मजबूत होता है. जिस पर भुट्टे मध्य भाग से लगना शुरू होते हैं. जिनका आकार शंकु के रूप में दिखाई देता है. इसके पौधे हरे चारे के रूप में उपयुक्त होते है. क्योंकि इसके पौधे काफी समय तक हरे भरे दिखाई देते हैं. इस किस्म के पौधे सूखे को सहन कर सकते हैं. इसके पौधे रोपाई के लगभग 80 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 50 से 60 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों में सडन और पत्ती झुलसा का रोग काफी कम देखने को मिलता है.

पूसा विवेक क्यू पी एम 9

मक्का की ये एक संकर किस्म है. जिसको सम्पूर्ण भारत में उगाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 80 से 90 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे पर कई तरह के जुवाणु जनित रोगों का प्रभाव बहुत कम देखने को मिलता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 55 से 60 क्विंटल के बीच पाया जाता है.

पूसा एच एम 9

मक्का की ये भी एक संकर किस्म है. जिसको दक्षिण भारत के राज्यों में कम समय में अधिक उत्पादन देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 85 से 90 दिन में पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 50 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधे सामान्य लम्बाई के और अधिक मजबूत होते हैं. जिन पर भुट्टे मध्य भाग से आने शुरू होते हैं.

एच क्यू पी एम – 5

मक्का की इस किस्म को रबी और खरीफ दोनों मौसम में उगाने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे पछेती पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. खरीफ के मौसम में इसके पौधे 80 से 90 दिन बाद और रबी के मौसम में 170 180 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधे मजबूत और सामान्य लम्बाई के होते हैं. जिनमें गिरने की समस्या देखने को नही मिलती. इस किस्म के पौधों पर लगने वाले भुट्टे सामान्य मोटाई वाले और लम्बे पाए जाते हैं. जिसके दानो का रंग गहरा पीला दिखाई देता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन रबी के मौसम में 80 से 90 और खरीफ के मौसम में 70 से 75 क्विंटल के बीच पाया जाता है.

एच एम – 11

मक्का की इस किस्म को चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा मध्यम समय में पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 85 से 90 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 60 से 70 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधे अधिक लम्बाई वाले और मजबूत होते हैं. जिन पर भुट्टे जमीन की सतह से तीन फिट की ऊंचाई से लगने शुरू होते हैं.

जे के एम एच – 175

मक्के की इस किस्म को खरीफ के मौसम में जल्दी पैदावार देने के लिए जे. के. सीड्स द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 80 से 90 दिन बाद ही पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों की लम्बाई सामान्य पाई जाती हैं. इसके दानो का रंग पीला और नारंगी दिखाई देता है. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 50 क्विंटल के आसपास पाया जाता हैं.

के एम एच – 3426

इस किस्म के पौधों को कावेरी सीड कंपनी द्वारा मध्यम समय में पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म का सबसे ज्यादा उत्पादन दक्षिण भारत में अधिक किया जाता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 90 से 95 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 60 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर भुट्टे उनके मध्य भाग से शुरू होते हैं. जिन पर पीले रंग के दाने पाए जाते हैं.

एच क्यू पी एम – 4

मक्के की ये एक उच्च गुणवत्ता वाली किस्म है जिसको चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा तैयार किया गया है. इसके पौधे रोपाई के लगभग 90 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 70 से 75 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों की ऊंचाई अधिक पाई जाती है. इसके भुट्टे मध्यम मोटाई और अधिक लम्बाई के होते हैं. जिन पर नारंगी रंग के मोटे और उभरे हुए दाने पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधों में कई तरह कीट और जीवाणु जनित रोग देखने को नही मिलते.

एच एम – 10

मक्का की इस किस्म को रबी और खरीफ दोनो मौसम में उगा सकते हैं. लेकिन जल्दी पैदावार लेने के लिए इन्हें खरीफ के मौसम में उगाया जाना अच्छा होता है. इसके पौधे पतले मजबूत और माध्यम ऊंचाई वाले होते हैं.  इस किस्म के पौधे पर लगने वाले भुट्टे लम्बे पाए जाते हैं. खरीफ के मौसम में इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 85 से 90 दिन और रबी के मौसम में 170 दिन बाद पककर तैयार ही जाते हैं. जिनका खरीफ और रबी के मौसम में प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन क्रमशः 70 और 90 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

डी के एच – 9705

मक्का की इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 90 दिन के आसपास पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 70 से 75 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिन पर भुट्टे पौधे के मध्य भाग से लगना शुरू होते हैं. इस किस्म के पौधों पर पत्ती झुलसा जैसे जीवाणु जनित रोगों का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

डेक्कन – 101

मक्का की इस किस्म का निर्माण आचार्य एन जी रंगा कृषि विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने खरीफ के मौसम में देरी से पैदावार देने के लिए किया है. इस किस्म के पौधे अधिक ऊंचाई के पाए जाते हैं. जीन पर भुट्टे उनकी मध्य ऊंचाई से लगने शुरू होते हैं. इसके भुट्टों की लम्बाई सामान्य पाई जाती है. इसके भुट्टों में दाने पीले रंग के पाए जाते हैं. जो आकार में चपेट होते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 100 दिन बाद पैदावार देना शुरू करते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 70 क्विंटल से ज्यादा पाया जाता है.

पी – 3441

मक्का की इस किस्म को खरीफ के मौसम में मध्य समय में पैदावार देने के लिए पायोनियर सीड्स द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 85 दिन के आसपास पककर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 55 से 60 क्विंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर पाए जाने वाले भुट्टे सामान्य लम्बाई के होते है. जिन पर नारंगी रंग के दाने पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधों में कई तरह के जीवाणु जनित रोगों का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

त्रीशुलता

मक्के की इस किस्म को पछेती रोपाई के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिन पर भुट्टे पौधे के मध्य भाग से लगना शुरू होते हैं. जिनकी लम्बाई सामान्य पाई जाती है. इसके भुट्टों में पीले और नारंगी दाने पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के लगभग 105 दिन के आसपास कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 65 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म को ज्यादातर दक्षिण भारत में उगाया जाता है.

इनके अलावा और भी कुछ किस्में हैं. जिन्हें किसान भाई क्षेत्रीय हिसाब से अलग अलग समय पर अधिक उत्पादन लेने के लिए उगाते हैं. जिनमें फर्रुखाबाद लोकल, देवकी, किसान, विजय, अमर, प्रगति, उत्तम, हिम 123, विवेक संकर 9, वी.एल. 42 और वी.एल. अम्बर जैसी कई किस्में शामिल हैं.

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