फल

आम की खेती कैसे करें – पूरी जानकारी!

आम एक रसदार फल हैं. जिसको फलों का राजा भी कहा जाता है. विश्वभर में आम के उत्पादन की दृष्टि से भारत का पहला स्थान है. आम का फल अपने स्वाद, रंग और खुशबू की वजह से सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. आम के फल में विटामिन ए और सी सबसे ज्यादा मात्रा मे पाए जाते हैं. आम का इस्तेमाल अचार, जूस, जैम और जेली जैसी और भी कई तरह की चीज़ो में होता है .

आम की खेती

आम की खेती समुद्रतल से लगभग 600 मीटर ऊंचाई पर उष्ण और समशीतोष्ण जलवायु वाली जगहों पर की जाती है. इसके पौधे को सामान्य बारिश की आवश्यकता होती है. आम की खेती के लिए क्षारीय पी.एच. वाली जमीन उपयुक्त नही होती. इसकी खेती के लिए उचित जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. आम की पैदावार से किसान भाई अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं.

अगर आप भी आम की खेती कर अच्छी कमाई करना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती में बारें सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

आम की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. जबकि अधिक बलुई, पथरीली, क्षारीय और जल भराव वाली भूमि में इसकी खेती नही की जा सकती. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. क्योंकि अधिक क्षारीय भूमि में इसकी खेती करने पर इसकी पैदावार के साथ साथ फलों की गुणवत्ता में भी कमी देखने को मिलती है.

जलवायु और तापमान

आम की खेती के लिए उष्ण और समशीतोष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त होती है. भारत में आम की खेती गर्मियों के मौसम में की जाती है. पौधे पर फूल आने और फल बनने के दौरान शुष्क मौसम उपयोगी होता है. फूलों से फल बनने के बाद उनके पकने के वक्त होने वाली हल्की बारिश पौधे के लिए उपयोगी होती है. वायु में अधिक समय तक रहने वाली आद्रता इसकी खेती के लिए नुकसानदायक होती है.

आम के पौधे को शुरुआत में विकास करने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की आवश्यकता होती है. उसके बाद पौधे पर फूलों से फल बनने और उनके विकास करने के लिए 27 डिग्री के आसपास तापमान की जरुरत होती है.

उन्नत किस्में

आम की कई तरह की किस्में मौजूद हैं. इन सभी किस्मों को उनके स्वाद, रस और पकने के टाइम के आधार पर तैयार किया गया है.

देशी प्रजाति

बंबइया

आम की ये एक जल्द पकने वाली किस्म है. इस किस्म के आम पकने के बाद भी हरे दिखाई देते हैं. इसके फलों में गुदे की मात्रा ज्यादा और अधिक मिठास पाई जाती है. इस किस्म के फल मई फूल आने के बाद मई माह तक पककर तैयार हो जाते हैं.

तोतापरी

तोतापरी आम

तोतापरी आम को उसके आकार के हिसाब से पहचाना जा सकता है. इस किस्म के आम का आकार तोते की चोंच जैसा होती है. इस किस्म के फलों में मिठास कम पाई जाती है. जिस कारण इनका ज्यादा उपयोग अचार, जूस और पेय पदार्थों को बनाने के लिए किया जाता है.

लंगड़ा आम

आम की इस प्रजाति की उत्पत्ति के बारें में एक बहुत ही बड़ी पौराणिक कहानी मानी जाती है. इस किस्म के आम बनारस के आसपास ज्यादा पाए जाते हैं. और बनारस ही इस प्रजाति के आमों का जन्म स्थल है. इसके फलों का स्वाद बड़ा ही अनोखा है. जिस कारण भारत में इस किस्म के आम बहुत पसंद किये जाते हैं. इस किस्म के फल अंडाकार होते हैं. इसके पके हुए फल हरे और पीले रंग के होते हैं.

दशहरी

आम की इस किस्म को उत्तर प्रदेश में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे अधिक उपज देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के फल अधिक मीठे होते हैं. जो जून माह के शुरुआत में ही पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के फलों का रंग पीला होता है.

अल्फांसो

आम की इस किस्म को अलग अलग जगहों पर गुन्डू, खादर, बादामी, हापुस और कागदी के नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म के फलों का ज्यादा उत्पादन महाराष्ट्र में किया जाता है. इसके फलों का रंग पीला और नारंगी होता है. जो मई महीने में पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के फल तिरछे, अंडाकार और स्वाद में मीठे होते हैं. इस किस्म के फलों को ज्यादा टाइम तक संरक्षित कर रखा जा सकता है.

केसर

इस किस्म के आम को गुजरात में सबसे ज्यादा उगाया जाता है. इसके फलों का आकर लम्बा होता है. जिनके दोनों तरफ के सिरे लाल दिखाई देते हैं. लेकिन इनका स्वाद बहुत मीठा होता हैं. इस किस्म के आमों का भंडारण काफी वक्त तक किया जा सकता है. इस किस्म के आम मौसम की शुरुआत में ही पककर तैयार हो जाते हैं.

नीलम

इस किस्म के आमों का भंडारण भी अधिक समय तक किया जा सकता है. इस किस्म एक फल अंडाकार और सामान्य आकर का होता हैं. जिनका रंग गहरा पीला होता है. और इसके फलों का स्वाद बहुत मीठा होता हैं. इस किस्म के फल पकने में ज्यादा वक्त लेते हैं. इस कारण इसे पछेती किस्मों में शामिल किया गया है.

फजरी

आम की इस किस्म का उत्पादन मुख्य रूप से बंगाल और बिहार में किया जाता है. इस किस्म का फल बड़ा और अंडाकार होता है. इस किस्म के आम देरी से पककर तैयार होते हैं. पकने के बाद भी इनका रंग हल्का हरा दिखाई देता है. इस किस्म के आम अपने स्वाद के लिए सबसे ज्यादा पसंद किये जाते हैं. इसके हरे कच्चे आम ज्यादा खट्टे नही होते. और पकने के बाद भी इसके फल ज्यादा मीठे नहीं बनते.

बैंगन पल्ली

आम की इस किस्म का उत्पादन आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु में सबसे ज्यादा व्यापारिक रूप से किया जाता है. इस किस्म को सफेदी, चटपटा, बान शान और चपाती नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म का आम लम्बा तिरछा होता है. जो मध्यम समय में पककर तैयार होता है. इस किस्म के फल का रंग सुनहरी पीला होता है. जिनका सबसे ज्यादा उपयोग पेय पदार्थों को बनाने में किए जाता है.

मलगोवा

इस किस्म के आम को दक्षिण भारत में अधिक उगाया जाता है. आम की इस किस्म के फल देरी से पककर तैयार होता हैं. जिसका फल बड़ा, उठा हुआ और गोलाकार होता है. इसका गूदा पीला और स्वादिष्ट होता है. इस किस्म के फलों को अधिक समय तक संरक्षित नही किया जा सकता. इसके फलों का रंग पकने के बाद पीला दिखाई देता है.

वनराज

आम की इस किस्म को सबसे ज्यादा गुजरात में उगाया जाता है. इस किस्म के फल मध्यम आकार वाले होते हैं. जिनका उपरी भाग लाल और चित्तेदार दिखाई देता है. जबकि नीचे से हल्का हरा दिखाई देता है. इस किस्म के फलों का भण्डारण अधिक समय तक किया जा सकता है. इस किस्म के फल मध्यम मौसम में पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका उपयोग अचार और जूस बनाने में किया जाता है.

संकर प्रजाति

संकर प्रजाति के आम की किस्मों को देशी प्रजाति की किस्मों के साथ संकरण के माध्यम से तैयार किया गया है.

आम्रपाली

उन्नत किस्म

इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा दशहरी और नीलम किस्म के संकरण के माध्यम से तैयार किया गया है. इस किस्म के फल सामान्य आकर के होते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 200 से 250 किवंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म के फल स्वादिष्ट होते हैं. जो पकने पर पीले दिखाई देते हैं. इस किस्म का निर्माण सघन रोपाई के लिए किया गया है.

मल्लिका

इस किस्म को भी दशहरी और नीलम किस्मों के संकरण के माध्यम से तैयार किया गया है. आम की इस किस्म के फल बड़े आकार में पाए जाते हैं. जिनका रंग पीला गुलाबी होता है. इसके फलों में गुदे की मात्रा ज्यादा पाई जाती है. इस किस्म के फलों को अधिक समय तक संरक्षित कर रखा जा सकता है. इस किस्म का ज्यादा उपयोग व्यापारिक चीजों को बनाने में किया जाता है.

पूसा लालिमा

इस किस्म के फलों का आकार सामान्य से थोड़ा बड़ा होता है. जिनके छिलके का रंग लाल और गुदा नारंगी होता है. इस किस्म के फल मीठे और स्वादिष्ट होते हैं. इसके फल लम्बे और सामान्य आकार वाले होते हैं. इस किस्म के फलों की विदेशी बाज़ार में ज्यादा मांग है. और इनका भंडारण अधिक समय तक किया जा सकता है.

अम्बिका

इस किस्म को केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ द्वारा आम्रपाली और जनार्दन पसन्द के संकरण के द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म का फल मध्यम आकार का होता है. जिनका रंग पीला और फलों में गुदे की मात्रा सामान्य पाई जाती है. इस किस्म के फल देरी से पककर तैयार होते हैं.

अरुणिका

आम की इस किस्म को आम्रपाली और वनराज के संकरण के माध्यम से तैयार किया गया है. इस किस्म के फल आकार में छोटे होते हैं. जो हर साल अधिक पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के फलों का ज्यादा इस्तेमाल खाने में किए जाता है.

हाइब्रिड-108

आम की इस किस्म को आम्रपाली और जनार्दन पसन्द के संकरण के माध्यम से तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे आकार में छोटे दिखाई देते हैं. लेकिन इनके पौधों पर फल बड़ी मात्रा में लगते है. इस किस्म के फल का छिलका गहरे लाल रंग का होता है. जिसका गुदा बहुत स्वादिष्ट होता है.

अलफजरी

आम की इस किस्म को भी अल्फांसो और फजरी किस्म के संकरण के माध्यम से तैयार किया गया है. इसके पौधे पर फल देरी से पकते हैं. जिनकी बाहरी सतह चिकनी दिखाई देती है. इसके फलों का भंडारण अधिक समय तक किया जा सकता है. इस किस्म के फलों में गुठली ला आकार छोटा और गुदा की मात्रा अधिक पाई जाती है.

नीलफॉन्सो

आम की इस संकर किस्म को नीलम और अल्फान्सो के संकरण से तैयार किया गया है. जिसको कृषि अनुसंधान केन्द्र, गुजरात ने तैयार किया है. इस किस्म के पौधे छोटे आकार के होते हैं. जिन पर फल भी सामान्य रूप से लगते हैं. इसके फल जुलाई माह में पककर तैयार होते हैं. इस किस्म के फल रस के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं.

खेत की तैयारी

आम के पौधे एक बार लगाने के बाद लगभग 20 साल से भी ज्यादा टाइम तक पैदावार देते है. इसके पौधे खेत में तैयार किये गए गड्डों में लगाए जाते हैं. इसकी खेती के लिए शुरुआत में खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर उसे खुला छोड़ दें. उसके कुछ दिन बाद खेत में रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरी बना लें. मिट्टी को भुरभुरी बनाने के बाद खेत में पाटा लगा दें. इसे भूमि समतल दिखाई देने लगती है. मिट्टी के समतल होने पर जल भराव जैसी परेशानियों का सामना भी नही करना पड़ता.

खेत के समतल हो जाने के बाद लगभग 5 मीटर की दूरी छोड़ते हुए एक मीटर चौड़े व्यास और आधा से एक मीटर गहराई का गड्डा तैयार कर लें. गड्डों को खोदने के बाद उनमें उचित मात्रा में उर्वरक मिट्टी में मिलाकर उन्हें वापस गड्डों में भर देते हैं. मिट्टी को वापस भरने के बाद गड्डों में पानी भरकर उनकी सिंचाई कर देते हैं. जिससे पौध लगाने के वक्त तक मिट्टी अपघटित होकर कठोर हो जाए. इन गड्डों को पौध रोपाई से एक महीने पहले तैयार किया जाता है.

पौध तैयार करना

आम की पौध बीज और कलम दोनों माध्यम से तैयार की जाती है. लेकिन बीज से पौध तैयार करने पर पौधे 6 से 8 साल बाद पैदावार देना शुरू करते हैं. जबकि कलम के माध्यम से तैयार की गई पौध लगभग तीन साल बाद ही पैदावार देना शुरू कर देती है. नर्सरी में इन कलमों को पौध लगाने के कई महीने पहले तैयार किया जाता है. आम की पौध नर्सरी में भेट कलम, गूटी या ग्राफ्टिंग विधि के माध्यम से तैयार की जा सकती है.

नर्सरी में कलम बनाने की इन सभी विधियों बारें में अधिक जानकारी आप हमारे इस आर्टिकल से ले सकते हैं.

Read Also – कलम के माध्यम से पौध तैयार करने के तरीके

पौध बनाने के अलावा वर्तमान में सरकार द्वारा रजिस्टर्ड कई ऐसी नर्सरी भी जहां उत्तम किस्म के पौधे आसानी से मिल जाते हैं. इन नर्सरीयों से पौधे उचित रेट पर खरीदकर किसान भाई पौध तैयार करने में लगने वाले टाइम को बचा सकते हैं.

पौध रोपण का तरीका और टाइम

आम के पौधे की रोपाई

आम की पौध तैयार होने के बाद उसे खेत में लगाया जाता है. खेत में इन पौधों को तैयार किये हुए गड्डों में लगाया जाता है. गड्डों में पौध लगाने से पहले गड्डों के बीच में एक और छोटे आकार का गड्डा तैयार किया जाता है. उसके बाद तैयार किये गए इन छोटे गड्डे में पौध लगाईं जाती है. गड्डों में पौध लगाने से पहले इनको उपचारित कर लेना चाहिए. गड्डों को उपचारित करने के लिए गोमूत्र या बाविस्टिन का उपयोग करना चाहिए. पौधे को गड्डों में लगाने के बाद उसे चारों तरफ से अच्छे से मिट्टी से दबा देना चाहिए.

जहां सिंचाई की उचित व्यवस्था हो वहां आम के पौधे की रोपाई मार्च के बाद करते हैं. लेकिन जहां सिंचाई की उचित व्यवस्था ना हो वहां इसकी रोपाई बारिश के मौसम में की जाती है. इसके लिए जून और जुलाई का महीना सबसे उपयुक्त होता है. इस दौरान मौसम सुहाना बना रहता है. जिससे पौधों का अंकुरण भी अच्छे से होता है. और पौधा अच्छे से विकास भी करता है.

पौधों की सिंचाई

आम के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है. शुरुआत में साल भर में इसके पौधे को 12 से 15 सिंचाई की आवश्यकता होती है. इसके पौधे की पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरंत बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद पौधे के विकास करने तक नमी बनाये रखने के लिए पौधों को पानी देते रहना चाहिए. इसके अलावा पौधे को गर्मियों में सप्ताह में एक बार पानी देना चाहिए. और सर्दियों में 15 से 20 दिन के अंतराल में पानी देना चाहिए. उसके बाद जैसे जैसे पौधे की उम्र बढती जाती है वैसे वैसे ही पौधों की सिंचाई करने का वक्त भी बढ़ा देना चाहिए. जब पौधा 8 बाद पूर्ण रूप से बड़ा हो जाए तब उसे साल में दो से तीन सिंचाई की ही जरूरत होती है.

जब पौधे पर तीन साल बाद फूल और फल बनने शुरू हो तब पौधों को पानी नही देना चाहिए. क्योंकि इस दौरान पानी देने पर पौधे से फूल झड जाते है. और पैदावार भी कम प्राप्त होती है. फल बनने के बाद उनके विकास के लिए पौधों को उचित टाइम पर पानी देते रहना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा

आम के पौधे को शुरुआत में अच्छे से विकास करने के लिए उचित मात्रा में उर्वरक की आवश्यकता होती है. इसके लिए खेत में गड्डे तैयार करते वक्त प्रत्येक गड्डों में 25 किलो पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा 150 ग्राम एन.पी.के. की मात्रा को तीन बराबर भागों में बांटकर उसे साल में तीन बार दें. जब पौधा तीन साल का हो जाए और फल देना शुरू कर दें. तब उर्वरक की इस मात्रा में वृद्धि कर देनी चाहिए.
पौधों को दी जाने वाली रासायनिक उर्वरक की मात्रा को 10 से 12 साल के अंतराल में लगभग एक किलो तक बढ़ा देनी चाहिए. रासायनिक उर्वरक की इस एक किलो मात्रा को साल में चार बार देना चाहिए. इससे पौधा अच्छे से विकास करता है और फल भी अधिक मात्र में आते हैं.

पौधों का रखरखाव और कटाई छटाई

आम का पौधा जब शुरुआत में काफी छोटा होता है तब उसे ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता होती है. शुरुआत में पौधे को जंगली और आवारा पशुओं से बचाकर रखा जाता है. क्योंकि पशुओं के खाने से पौधा सम्पूर्ण नष्ट भी हो जाता है, या फिर उपर से खाने के बाद पौधे को फिर से विकास करने के लिए काफी वक्त लग सकता है. इन आवारा पशुओं से बचाव के लिए या तो खेत के चारों तरफ पक्की दीवार लगा दें, या फिर लोहे की जाली लगाकर खेत की सुरक्षा करनी चाहिए.

पशुओं के अलावा शुरुआत में पौधे को तेज़ धूप और सर्दियों में पड़ने वाले पाले से भी बचाकर रखा जाता है. पौधे को तेज़ धूप और पाले से बचाने के लिए उसे नियमित अंतराल पर पानी देते रहना चाहिए. इसके अलावा पौधे को शुरुआत में किसी ऐसी चीज़ से ढक देना चाहिए, ताकि पौधे को तेज़ सर्दी और गर्मी से बचाया जा सके.

पौधे की कटाई छटाई करते वक्त शुरुआत में एक से डेढ़ मीटर तक कोई भी शाखा का निर्माण ना होने दे. इससे पौधा का आकार अच्छे से बनता है. और तना भी मजबूत बनता है. इसके अलावा जब पौधा बड़ा हो जाए तब पौधे में दिखाई देने वाली सुखी और रोगग्रस्त शाखाओं को काटकर हटा देनी चाहिए. इससे पौधे पर नई शाखाओं का निर्माण होता है. जिससे पैदावार में भी वृद्धि देखने को मिलती है.

खरपतवार नियंत्रण

आम के पौधों में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक तरीके से नही करना चाहिए. आम की खेती में खरपतवार नियंत्रण पौधों की नीलाई गुड़ाई कर करना चाहिए. इसके पौधों की पहली गुड़ाई पौधा लगाने के एक महीने बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद शुरुआती साल में 8 से 10 गुड़ाई करने पर पर पौधा अच्छे से विकास करता है. और जल्द ही फल देने के लिए तैयार हो जाता है. उसके बाद जब पौधा पूरी तरह से विकसित ही जाए तब पौधे की साल में तीन से चार गुड़ाई काफी होती है. इसके अलावा पौधों के बीच बची बाकी की खाली भूमि में अगर कोई फसल नही उगा रखी हो तो बारिश के मौसम के तुरंत बाद जब जमीन सूखी हुई दिखाई दे तभी उसकी जुताई कर देनी चाहिए. इससे जन्म लेने वाली खरपतवार शुरुआत में ही नष्ट हो जाती है.

अतिरिक्त कमाई

आम के पौधे खेत में लगाने के तीन से चार साल बाद पैदावार देना शुरू करते हैं. इस दौरान किसान भाई पौधों के बीच खाली बची जमीन में सामान्य पानी की जरूरत वाली सब्जी या फिर मसाला फसल उगाकर अच्छी खासी कमाई कर सकता है. इससे किसान भाईयों को किसी प्रकार की कोई आर्थिक परेशानी का सामना भी नही करना पड़ता और खेत से उपज भी मिलती रहती है.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

आम के पौधे में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिससे इसकी पैदावार में फर्क देखने को मिलता है. इस कारण इसके पौधों की उचित देखभाल करते रहना चाहिए.

पाउडरी मिल्ड्यू

रोग ग्रस्त आम का पौधा

आम के पौधे पर ये रोग ज्यादातर मौसम परिवर्तन के वक्त देखने को मिलता है. पौधों पर ये रोग तापमान या आद्रता में वृद्धि होने पर लगता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर सफ़ेद रंग का पाउडर दिखाई देने लगता है. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर सल्फर या ट्राइडेमार्फ का दो से तीन छिडकाव 15 दिन के अंतराल में करना चाहिए.

मैंगो हॉपर

मैंगो हॉपर रोग का प्रभाव पौधे पर फरवरी या मार्च महीने में देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों पर काली फफूंद जमने लगती है. जिससे पौधे को पोषक तत्व उचित मात्रा में नही मिल पाते. फलस्वरूप पौधे से फूल और फल झड़ने लगते हैं. पौधों पर ये रोग एक किट की वजह से फैलता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे पर फॉस्फोमिडॉन की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

एन्थ्रेक्नोज

आम के पौधे पर इस रोग का प्रभाव उसकी नई पत्तियों, टहनियों, फूल और फलों पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे के इन सभी कोमल भागों पर सफ़ेद रंग के छोटे धब्बे बनने लगते हैं. कुछ दिनों बाद ये सभी धब्बे मिलकर एक बड़े धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं. और फलों पर भंडारण के वक्त काले भूरे धब्बे बन जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मानेब या ब्लाइटाक्स की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

तना बेधक

आम के पौधे में तना बेधक रोग का प्रभाव पौधे के विकसित होने के बाद कभी भी दिखाई दे सकता है. इस रोग के प्रभाव की वजह से सम्पूर्ण पौधा नष्ट हो जाता है. इस रोग के कीट पौधे के तने को अंदर से खाकर उसको नुक्सान पहुँचाते हैं. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियां पीली होकर पड़ने लगती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे के तने पर दिखाई देने वाले छिद्रों में चिकनी मिट्टी या कैरोसिन तेल में रुई भिगोकर भर देनी चाहिए. इसे इस रोग का किट सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है.

गमोसिस

आम के पौधे पर ये रोग पोषक तत्वों की कमी की वजह से देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की शाखाएं फट जाती है. जिनसे गोंद निकलती हुई दिखाई देती है. इस रोग का अधिक प्रभाव बढ़ने पर सम्पूर्ण पौधा सुख जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे को उचित मात्रा में उर्वरक देते रहना चाहिए. उर्वरक के रूप में पौधों की जड़ों में 250 ग्राम जिंक, 250 ग्राम कॉपर सल्फेट, 125 ग्राम बोरेक्स तथा 100 ग्राम बुझे चूने का मिश्रण सिंचाई के साथ देना चाहिए.

आंतरिक विगलन

आम के पौधे पर इस रोग का प्रभाव फलों पर देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे के निचले हिस्से पर सलेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. बाद में ये धब्बे बढ़कर गहरे भूरे रंग के बन जाते हैं. कुछ समय बाद इसके फल फटने लगते हैं. और उनसे पीले रंग के रस की बूंदें निकलती हुई दिखाई देने लगती है. इस रोग के लगने पर पौधे पर बोरेक्स की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

फलों की तुड़ाई

आम की पैदावार

आम के पौधे पर फल, फूल आने के लगभग 85 से 110 दिन बाद पककर तैयार हो जाते है. जब फलों का रंग उनकी किस्मों के आधार पर पीला दिखाई देने लगे तब उनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए. फलों की तुड़ाई बड़ी सावधानी से करनी चाहिए. फलों को तोड़ते वक्त उन्हें किसी तरह की कोई खरोंच नही आनी चाहिए. क्योंकि खरोंच आने से फल पर फफूंदी और सडन का रोग लग जाता है. जिससे फलों की भंडारण क्षमता कम हो जाती है. फलों की तुड़ाई के बाद उन्हें साफ़ कर पैंकिंग करनी चाहिए. फलों की सफाई के लिए उन्हें ठंडे पानी से धोकर छायादार जगह पर सुखा लेना चाहिए.

पैदावार और लाभ

आम के पूर्ण विकसित एक पौधे से एक बार में 100 से 150 किलो तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं. जबकि एक एकड़ में लगभग 400 पौधे लगाए जा सकते हैं. इन पौधों के पूर्ण विकसित होने के बाद इनका कुल उत्पादन 40000 से 60000  किलो तक हो सकता है. जबकि इनका बाज़ार में थोक भाव 20 से 50 रूपये प्रति किलो तक पाया जाता है. इस हिसाब से किसान भाई पूर्ण विकसित पौधों से एक बार में 8 से 10 लाख तक की कमाई आसानी से कर सकता है.

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