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परवल की खेती कैसे करें – Pointed Gourd Farming in Hindi

परवल की खेती सब्जी फसल के रूप में की जाती है. परवल के पौधे की उत्पत्ति भारत में हुई थी. भारत में लोग इसे नगदी फसल के रूप में उगाते हैं. परवल के पौधे लता के रूप में फैलकर बड़े होते हैं. इसके फल कद्दू वर्गीय श्रेणी में आते हैं. परवल का फल पोष्टिक और स्वास्थ्य वर्धक होता है. इसके फलों में विटामिन, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन जैसे तत्व पाए जाते हैं. जो मानव शरीर के लिए लाभदायक होते हैं. परवल का उपयोग सब्जी, अचार और लड्डू बनाने में किया जाता है. भारत में इसकी खेती ओडिशा, बंगाल, बिहार, असम और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर की जाती है. परवल की खेती आर्थिक दृष्टि से किसानों के लिए बहुत लाभदायक है.

परवल की खेती

परवल की खेती के लिए शुष्क और आद्र मौसम की जरूरत होती है. परवल की खेती के लिए अधिक बारिश की जरूरत नही होती. इसकी खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. परवल की खेती बाकी सब्जी फसलों की तुलना में ज्यादा लाभ वाली होती है. क्योंकि इसका बाज़ार भाव अच्छा मिलता है. और उत्पादन भी अधिक प्राप्त होता है.

अगर आप भी इसकी खेती कर अच्छा लाभ कमाना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

परवल की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त होती है. जबकि इसकी अच्छी पैदावार लेने के लिए इसे बलुई दोमट मिट्टी में उगाना सबसे बेहतर होता है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.

जलवायु और तापमान

परवल की खेती के लिए गर्म और आद्र वाली जलवायु उपयुक्त मानी जाती है. परवल के अच्छे उत्पादन के लिए इसे गर्मी के मौसम में उगाया जाता है. बारिश और गर्मी का मौसम इसकी खेती के लिए सबसे अच्छा माना जाता है. लेकिन अधिक बारिश भी इसकी खेती के लिए उपयोगी नही होती. सर्दी के मौसम में इसकी खेती नही की जा सकती. क्योंकि सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसके पौधों को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाते हैं.

परवल की खेती में तापमान का भी ख़ास महत्व है. शुरुआत में इसके बीज, शल्क और जड़ों को अंकुरित होने के लिए 20 से 25 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती हैं. उसके बाद इसके पौधे अधिकतम 35 और न्यूनतम 10 डिग्री के आसपास तापमान पर आसानी से विकास कर लेते हैं. इससे कम या ज्यादा तापमान पौधों के विकास और पैदावार प्रभावित करता हैं.

उन्नत किस्में

परवल की काफी उन्नत किस्में हैं, जिन्हें फलों के रंग आकार और उत्पादन के आधार पर तैयार किया गया है.

काशी अलंकार

परवल की ये एक अधिक पैदावार देने वाली किस्म हैं. इस किस्म को मध्य और पूर्वी भारत में अधिक उगाया जाता हैं. इस किस्म के फलों का रंग हल्का हरा पाया जाता है. इस किस्म के फलों के बीज मुलायम होते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 200 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

स्वर्ण अलौकिक

परवल की इस किस्म के फलों का आकार अंडेनुमा और फलों का छिलका हल्के हरे रंग का होता है. इस किस्म के फलों में बीज कम मात्रा में पाए जाते हैं. और गुदा अधिक मात्रा में पाया जाता है. इस किस्म के फलों का इस्तेमाल मिठाई बनाने में अधिक किया जाता है. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 200 से 250 क्विंटल तक पाया जाता हैं.

स्वर्ण रेखा

परवल की इस किस्म के पौधों की प्रत्येक गांठो पर फल लगते हैं. इसके फलों का रंग गहरा हरा होता है. जिन पर सफ़ेद रंग की धारियां दिखाई देती हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 200 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के फलों का आकार लम्बा होता है.

काशी सुफल

परवल की ये भी एक अधिक पैदावार देने वाली किस्म हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 200 से 250 क्विंटल तक पाया जाता हैं. इसका उत्पादन उत्तर प्रदेश और बिहार में अधिक मात्रा में किया जाता है. इस किस्म के फलों का रंग हल्का हरा होता हैं, जिन पर सफ़ेद रंग की धारीयां दिखाई देती है. इस किस्म के फलों का इस्तेमाल मिठाई बनाने में अधिक किया जाता है.

डी.वी.आर.पी.जी 1

परवल की इस किस्म के पौधे अधिक उत्पादन देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के फलों का आकार लम्बा पाया जाता है. जिनके अंदर गुदे की मात्रा ज्यादा और बीज कम होते हैं. इस किस्म के फलों का बाहरी रंग हल्का हरा होता हैं. इसके फलों का ज्यादातर इस्तेमाल मिठाई बनाने में किया जाता हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 275 से 300 क्विंटल तक पाया जाता है.

सी.एच.ई.एस. संकर 1

परवल की उन्नत किस्म

परवल की इस किस्म को भी अधिक उत्पादन देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म फल ठोस और मोटे आकार के होते हैं. इसके फलों का बाहरी रंग हरा होता है और फलों पर हल्की धारियां बनी होता हैं. इस किस्म के फलों पर फल मक्खी का प्रकोप देखने को नही मिलता. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 280 से 320 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

राजेन्द्र परवल 1

परवल की ये एक क्षेत्रीय किस्म है. जिसकी खेती बिहार राज्य के आसपास वाले क्षेत्रों में अधिक मारा में की जाती है. इस किस्म का निर्माण राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, बिहार द्वारा किया गया था. इस किस्म के फल बड़े आकर के होते हैं. जो बहार से पट्टेदार हरे रंग के दिखाई देते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 150 क्विंटल के आसपास पाया जाता है.

फैजाबाद परवल 1

परवल की इस किस्म का निर्माण नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, फैज़ाबाद ने किया हैं. इस किस्म का उत्पादन बिहार और उत्तर प्रदेश में किया जाता है. इस किस्म के पौधों पर लगने वाले फलों का रंग आकर्षक हरा दिखाई देता है. जिसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 150 से 170 क्विंटल तक पाया जाता है.

इनके अलावा भी काफी किस्में हैं. जिन्हें क्षेत्रीय हिसाब से अलग अलग जगहों पर उगाया जाता है. इनमें गुल्ली, चेस्क सिलेक्शन 1, एफ. पी.1, डंडाली, एच. पी.1, 3, चेस्क हाइब्रिड 1, कल्यानी, छोटा हिली, नरेंद्र परवल 260,बिहार शरीफ, नरेंद्र परवल 601, निरिया और संतोखिया जैसी बहुत सारी किस्में मौजूद हैं.

खेत की तैयारी

परवल की खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा और साफ़ होना जरूरी है. क्योंकि इसकी बेल सतह पर फैलकर बड़ी होती हैं. इसके लिए खेत की तैयारी के वक्त शुरुआत में खेत में मौजूद पुरानी फसलों के सभी अवशेषों को नष्ट कर खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से जुताई कर दें. उसके बाद खेत को कुछ दिन खुला छोड़ दें. ताकि सूर्य की तेज़ धूप से मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट नष्ट हो जायें.

उसके बाद खेत में उचित मात्रा में जैविक खाद (गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट) डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की कल्टीवेटर के माध्यम से दो से तीन गहरी जुताई कर दें. उसके बाद खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. पलेव करने के बाद जब भूमि हल्की सुखी हुई दिखाई दें तब खेत की फिर से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लें. उसके बाद खेत में पाटा लगाकर भूमि को समतल बना लें ताकि बारिश के वक्त खेत में जल भराव जैसी समस्याओं का सामना ना करना पड़ें.

पौध तैयार करना

परवल की रोपाई बीज, जड़ और कटिंग के माध्यम से की जाती है. ज्यादातर किसान इसकी रोपाई कटिंग के माध्यम से ही करते हैं. जिसे शल्क कहा जाता है. परवल की पौध तैयार करते वक्त हमेशा ध्यान रखे की चिन्हित किये हुए मादा पौधे से ही तैयार करें. इसके लिए पौधों का चुनाव खेत में खड़ी फसल को देखकर ही कर लेना चाहिए.

बीज के माध्यम से पौध तैयार करते वक्त ध्यान रखे की इसके बीजों से उगने वाले पौधों में 80 से 85 प्रतिशत नर पौधे होते हैं. इसलिए मादा पौधे को पहले से चिन्हित कर उसकी कटिंग की रोपाई करें. अन्यथा पैदावार पर काफी फर्क पड़ता हैं. परवल की कटिंग को तैयार करते वक्त कटिंग की लम्बाई एक से डेढ़ मीटर रखते हैं. जिसके अंदर 8 से 10 गाठें पाई जाती हैं.

नर्सरी में पौध तैयार करने के दौरान इसकी पौध खेत में रोपाई से लगभग 25 से 30 दिन पहले तैयार की जाती हैं. जिसमें इसकी कटिंग को जैविक उर्वरक मिली मिट्टी में लगा देते हैं. नर्सरी में इसकी पौध पॉलीथीन में लगाकर तैयार करना सबसे अच्छा होता है. पॉलीथीन में पौध रोपाई के दौरान इसके दोनों सिरों को मिट्टी से बहार रखते हैं. वैसे किसान भाई इसे सीधा खेतों में भी लगा सकते हैं.

बीज की मात्रा और उपचार

परवल की पौध की जरूरत खेत में उसकी रोपाई के अनुसार होती है. इसकी पौध रोपाई के दौरान नर और मादा का अनुपात 1:10 का होना चाहिए. जो किसान भाई इसे एक गुणा डेढ़ मीटर की दूरी पर लगाता है. उसके लिए 4500 से 5000 पौधा की जरूरत होती है. और जो किसान भाई इसे एक गुणा दो मीटर की दूरी पर लगाता है, उन्हें 3500 से 4000 पौधों की जरूरत होती हैं. इसकी पौध को खेत और नर्सरी दोनों में उगाने से पहले कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए.

पौध रोपाई का तरीका और टाइम

समतल भूमि में परवल की खेती

परवल की खेती के लिए इसकी पौध को मेड और समतल भूमि दोनों जगहों पर उगाया जा सकता हैं. इसकी शल्क की रोपाई के दौरान इसके दोनों सिरों को मिट्टी में नही दबाते. समतल भूमि पर इसे धोरेनुमा क्यारियों में लगाया जाता है. इसके लिए दो धोरेनुमा क्यारियों के बीच 4 से 5 मीटर तक की दूरी होनी चाहिए. धोरेनुमा क्यारियों में इसकी शल्क को मेड पर अंदर की तरफ एक मीटर की दूरी रखते हुए दोनों तरफ लगाते हैं.

जबकि मेड पर रोपाई के दौरान इसकी शल्क को एक मीटर के आसपास दूरी रखते हुए लगाते हैं. और रोपाई करते वक्त मेड़ों के बीच डेढ़ से दो मीटर की दूरी उपयुक्त होती हैं. मेड पर रोपाई करने के दौरान इसके पौधों को सहारा देना पड़ता हैं. जिसके लिए खेत में बांस की लकड़ियों या लोहे के खम्भों के माध्यम से मचान तैयार की जाती हैं. जिन पर इसके पौधे फैलकर अपना विकास करते हैं. इस विधि से पौधों की रोपाई करने पर पैदावार अधिक प्राप्त होती हैं.

परवल के पौधों से उचित उत्पादन लेने के लिए इन्हें सही वक्त पर लगाना सबसे ज्यादा जरूरी होता है. क्योंकि अधिक देरी करने पर फलों में कई तरह के रोग लग जाते हैं. इसके पौधों को खेत में लगाने का सबसे उपयुक्त टाइम जून और अगस्त का महीना होता है. इस दौरान इसके पौधों को लगाकर अच्छा उत्पादन लिया जा सकता हैं. इसके अलावा कई जगहों पर इसे अक्टूबर और नवम्बर माह में भी उगा सकते हैं.

पौधों की सिंचाई

परवल के पौधों को सिंचाई की सामान्य जरूरत होती हैं. सर्दियों के मौसम में इसके पौधों को 12 से 15 दिन के अंतराल में पानी देना चाहिए. और बारिश के वक्त इसे पानी की जरूरत नही होती. लेकिन अगर बारिश सही समय पर ना हो और पौधों को पानी जरूरत हो तो पौधों को आवश्यकता के अनुसार पानी देना चाहिए. मेड पर लगाई गई फसलों में ड्रिप के माध्यम से सिंचाई करना लाभदायक होता है. इस दौरान पौधों को रोज़ दो घंटे पानी देने से पैदावार अच्छी मिलती हैं.

उर्वरक की मात्रा

परवल के पौधों को उर्वरक की जरूरत बाकी लतादार फसलों की तरह ही होती हैं. इसके लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त लगभग 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को खेत में डालकर उसे मिट्टी में मिला देते हैं. जबकि रासायनिक खाद के रूप में खेत में दो से तीन बोरे एन.पी.के. की मात्रा का छिडकाव खेत की आखिरी जुताई के वक्त कर देते हैं. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में ही लगभग 20 किलो यूरिया का छिडकाव पौधों के विकास, फूल और फल बनने के दौरान करने से पैदावार अधिक प्राप्त होती हैं.

खरपतवार नियंत्रण

परवल की खेती में खरपतवार नियंत्रण प्रकृतिक तरीके से किया जाता है. इसके लिए शुरुआत में पौधों या शल्क को खेत में लगाने के लगभग 25 से 30 दिन बाद खेत में मौजूद खरपतवार को हल्की गुड़ाई के माध्यम से निकालकर हटा देना चाहिए. इसके पौधों की लगभग तीन से चार गुड़ाई करना अच्छा होता है. इसके लिए पौधों की पहली गुड़ाई के बाद 20 से 22 दिन के अंतराल में बाकी की गुड़ाई करते रहना चाहिए.

पौधों की देखभाल

परवल के पौधों को देखभाल की जरूरत जब उनकी रोपाई मेड पर की जाती है तब होती है. मेड पर खेती के दौरान जब पौधे से बेल बनना शुरू हो जायें तब उन्हें सहारा देने की जरूरत होती है. इसके लिए बांस की लकड़ियों या लोहे के खम्भों के सहारे रस्सी या तार बांधकर उन्हें बढ़ने के लिए सहारा दिया जाता है. परवल के पौधे एक बार लगाने के बाद तीन से चार साल तक पैदावार दे सकते हैं. इसलिए एक फसल के बाद दूसरी फसल लेने के लिए इसके पौधों को जड़ के पास से एक फिट की दूरी छोड़ते हुए काटकर अलग कर देना चाहिए.

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

परवल के पौधों में कई रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी अगर उचित टाइम रहते देखभाल ना की जाए तो पौधों और पैदावार को काफी नुक्सान पहुँचता है.

लाल भृंग

परवल के पौधों में लगने वाला लाल भृंग एक कीट जनित रोग है. जो पौधों पर अंकुरण के बाद ही दिखाई देने लगता है. इस रोग के कीट पौधे की पत्तियों को खाकर उन्हें नुक्सान पहुँचाते हैं. जिससे पौधा जल्द ही नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर सुबह के समय राख का छिडकाव करना चाहिए.

फल मक्खी

परवल के पौधों पर फल मक्खी का प्रभाव पौधों पर फल बनने के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग के कीट परवल के फलों पर अपने अंडे देते हैं. जिनसे निकलने वाला लार्वा फलों के अंदर सुरंग बनाकर घुस जाता है और फलों को खराब कर देता है. जिससे फल समय से पहले ही गिरकर नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर इंडोसल्फान या मेलाथियान की उचित मात्रा का छिडकाव प्रभाव दिखाई देने के साथ ही कर देना चाहिए.

चूर्णिल आसिता

चूर्णिल आसिता जिसे चूर्णी फफूंद, भभुतिया और छाछीया नाम से जाना जाता है, लगभग सभी तरह की लातादार कद्दू वर्गीय फलों में देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर सफ़ेद रंग पाउडर दिखाई देने लगता है. जो रोग बढ़ने पर सम्पूर्ण पौधे पर फैल जाता है. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करना बंद कर देता है. और कुछ दिन में ही नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर कैराथेन,सल्फेक्स या टोपाज की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

फल सड़न

परवल में फल सड़न रोग

परवल की खेती में फल सड़न रोग का प्रभाव समतल भूमि में खेती के दौरान ज्यादा देखने को मिलता है. समतल भूमि में खेती के दौरान जब फल ज्यादा दिनों तक जमीन की सतह से एक तरफ से ही सटा रहता है तो फल सड़न का प्रभाव बढ़ जाता है. इस रोग के लगने पर फलों पर गहरा धब्बा बन जाता है. जिसके बाद फल बेल से अलग हो जाता है. इस रोग के लगने पर सड़े हुए फलों को एकत्रित कर खेत से बहार गहरा गड्डा बनाकर दबा दें. इसके अलावा इंडोफिल की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

डाउनी मिल्डयू

परवल के पौधों में मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्डयू) का रोग फफूंद की वजह से फैलता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं. जिनका आकार रोग का प्रभाव बढ़ने की वजह से और बढ़ जाता है. जिससे पौधे की पत्तियां समय से पहले ही गिर जाती है. और पौधे विकास करना बंद कर देता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मैंकोजेब या इंडोफिल एम.-45 की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

मोजैक

परवल के पौधों में लगने वाला मोजैक का रोग पौधों को काफी ज्यादा नुक्सान पहुँचाता है. इस रोग के लगने पर पौधों की पत्तियां सिकुड़कर छोटी हो जाती हैं. और नीचे की तरफ मुड़ी हुई दिखाई देती है. रोग के बढ़ने पर पौधों की पतीयों और तने का रंग पीला पड़ने लगता है. जबकि रोग ग्रस्त फल हल्का सफ़ेद दिखाई देने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए रोग ग्रस्त पौधों को खेत से उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए. इसके अलावा रोग की शुरुआत में रोगर दावा का छिडकाव पौधों पर करना लाभकारी होता है.

फलों की तुड़ाई

परवल के पौधों पर फल मार्च के बाद लगना शुरू हो जाते हैं. जो 10 से 12 दिन में तोड़ने लायक हो जाते हैं. शुरुआत में इसके पौधों पर कम मात्रा में फल पकते हैं. इसलिए सप्ताह में एक बार फलों की तुड़ाई करनी चाहिए. उसके बाद अप्रैल और मई में जब फलों की संख्या में वृद्धि हो जाए तब सप्ताह में दो बार उनकी तुड़ाई करना उचित होता है. फलों की तुड़ाई हमेशा सुबह जल्दी करनी चाहिए. जिससे फल अधिक समय तक ताजे दिखाई देते हैं.

पैदावार और लाभ

परवल के पौधे एक बार लगाने के बाद तीन साल तक पैदावार देते हैं. इसकी विभिन्न किस्मों के पौधों की प्रति हेक्टेयर औसतन पैदावार 200 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इसके पौधों को एक बार लगाने के बाद दूसरे और तीसरे साल में पौधों की देखभाल पर काफी कम खर्च आता है. जबकि पैदावार हर साल बढती है. परवल का थोक बाज़ार भाव 40 रूपये प्रति किलो के आसपास पाया जाता है. इस हिसाब से किसान भाइयों की एक बार में एक हेक्टेयर से आठ लाख तक की कमाई आसानी से हो जाती है.

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